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1. परिचय

पुष्पी पादप (Angiosperms) पृथ्वी पर सबसे अधिक विकसित और प्रचुर संख्या में पाए जाने वाले पौधे हैं। इनमें लैंगिक जनन फूलों के माध्यम से होता है। फूल ही पुष्पी पादपों का जनन अंग है। पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन में युग्मकजनन (Gametogenesis), परागण (Pollination), निषेचन (Fertilization) तथा बीज और फल का विकास जैसी अनेक प्रक्रियाएँ सम्मिलित होती हैं। इस अध्याय में हम फूल की संरचना, परागकण का विकास, बीजाण्ड का विकास, परागण, दोहरा निषेचन तथा बीज और फल के विकास का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह प्रक्रिया अन्य जीवों से भिन्न है क्योंकि इसमें दोहरा निषेचन (Double Fertilization) नामक अनूठी घटना होती है, जो केवल पुष्पी पादपों में पाई जाती है।

2. फूल की संरचना (Structure of a Flower)

फूल पुष्पी पादपों का जनन अंग है। एक विशिष्ट फूल में निम्नलिखित मुख्य भाग होते हैं: - बाह्यदलपुंज (Calyx): बाह्यदलों (sepals) का समूह, जो फूल की कली अवस्था में सुरक्षा प्रदान करता है। - दलपुंज (Corolla): दलों (petals) का समूह, जो प्रायः रंगीन होता है और परागण में सहायक कीटों को आकर्षित करता है। - पुंकेसर (Androecium): नर जनन अंग। प्रत्येक पुंकेसर में परागकोष (Anther) और वृंत (Filament) होते हैं। परागकोष से परागकण (Pollen grains) उत्पन्न होते हैं। - स्त्रीकेसर (Gynoecium): मादा जनन अंग। इसमें वर्तिकाग्र (Stigma), वर्तिका (Style) और अंडाशय (Ovary) होते हैं। अंडाशय में बीजाण्ड (Ovules) पाए जाते हैं।

जिस फूल में पुंकेसर और स्त्रीकेसर दोनों होते हैं, वह द्विलिंगी फूल (Bisexual flower) कहलाता है, जैसे गुड़हल और सरसों। जिस फूल में केवल एक ही प्रकार का जनन अंग होता है, वह एकलिंगी फूल (Unisexual flower) कहलाता है, जैसे पपीता और मक्का। जब किसी पौधे पर नर और मादा दोनों प्रकार के फूल होते हैं, तो उसे एकलिंगाश्रयी (Monoecious) पौधा कहते हैं, जैसे मक्का और कद्दू। जब नर और मादा फूल अलग-अलग पौधों पर होते हैं, तो उसे द्विलिंगाश्रयी (Dioecious) पौधा कहते हैं, जैसे पपीता और खजूर।

3. परागकण का विकास (Development of Pollen Grain / Microsporogenesis)

परागकोष (Anther) में चार परागकोषों की थैलियाँ (pollen sacs) होती हैं। परागकोष की थैलियों में उपस्थित अगुणित (haploid) कोशिकाओं का जनक माइक्रोस्पोर मातृ कोशिकाएँ (Microspore Mother Cells) कहलाती हैं। ये कोशिकाएँ अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) द्वारा चार अगुणित माइक्रोस्पोर बनाती हैं। इन्हें सूक्ष्मबीजाणु (Microspores) कहते हैं। प्रत्येक माइक्रोस्पोर आगे चलकर एक परागकण (Pollen grain) में विकसित होता है। इस पूरी प्रक्रिया को सूक्ष्मबीजाणुजनन (Microsporogenesis) कहते हैं। एक माइक्रोस्पोर मातृ कोशिका से चार परागकण बनते हैं, जो प्रारंभ में टेट्राड (Tetrad) के रूप में एक साथ रहते हैं।

परागकण एक विकसित माइक्रोगैमेटोफाइट (microgametophyte) होता है। परिपक्व परागकण में दो कोशिकाएँ होती हैं: बड़ी कायिक कोशिका (Vegetative cell) और छोटी जनन कोशिका (Generative cell)। जनन कोशिका आगे चलकर विभाजित होकर दो नर युग्मक बनाती है। परागकण के बाहरी आवरण को एक्ज़ाइन (Exine) और आंतरिक आवरण को इंटाइन (Intine) कहते हैं। एक्ज़ाइन स्पोरोपोलेनिन नामक अत्यंत कठोर पदार्थ का बना होता है, जो उच्च तापमान, अम्ल और क्षार के प्रति प्रतिरोधी होता है। एक्ज़ाइन पर कुछ छिद्र होते हैं जिन्हें जनन रंध्र (Germ pores) कहते हैं। परागकणों से कई लोगों को एलर्जी (जैसे हे फीवर) होती है।

4. बीजाण्ड का विकास (Development of Ovule / Megasporogenesis)

बीजाण्ड (Ovule) अंडाशय के भीतर स्थित होता है। बीजाण्ड के मध्य में एक कोशिका होती है जिसे नालिका केन्द्रक (Nucellus) कहते हैं। नालिका केन्द्रक के अंदर एक विशेष कोशिका होती है जिसे मेगास्पोर मातृ कोशिका (Megaspore Mother Cell) कहते हैं। यह कोशिका अर्धसूत्री विभाजन द्वारा चार मेगास्पोर बनाती है। इनमें से केवल एक मेगास्पोर क्रियाशील (functional) रहता है और शेष तीन नष्ट हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को मेगास्पोरजनन (Megasporogenesis) कहते हैं।

क्रियाशील मेगास्पोर का केन्द्रक लगातार तीन बार समसूत्री विभाजन (Mitosis) करता है जिससे आठ केन्द्रक बनते हैं। इन आठ केन्द्रकों के आधार पर बनी कोशिका को बीजाण्डकोश (Embryo sac) कहते हैं। इस प्रकार परिपक्व बीजाण्डकोश सात कोशिकाओं वाला और आठ केन्द्रकों वाला (7-celled, 8-nucleate) होता है। बीजाण्डकोश के मध्य में दो ध्रुवीय केन्द्रक (Polar nuclei) होते हैं। बीजाण्डकोश के द्वार (Micropyle) के पास तीन कोशिकाएँ होती हैं: एक अंडाणु (Egg cell) और दो सहायक कोशिकाएँ (Synergids)। विपरीत छोर पर तीन प्रतिमुख कोशिकाएँ (Antipodal cells) होती हैं। बीजाण्ड का वह स्थान जहाँ से यह अंडाशय से जुड़ा होता है, बीजाण्ड नाल (Funicle) कहलाता है, और इसका मुक्त छोर द्वार (Micropyle) कहलाता है।

5. परागण (Pollination)

परागकणों का परागकोष से वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण परागण (Pollination) कहलाता है। परागण के तीन प्रकार हैं: 1. स्वपरागण (Autogamy): जब परागकण एक ही फूल के वर्तिकाग्र पर स्थानांतरित होते हैं, जैसे गेहूँ, चावल। इसके लिए परागकण और वर्तिकाग्र का एक साथ परिपक्व होना आवश्यक है। 2. परपरागण (Geitonogamy): जब परागकण एक ही पौधे के दूसरे फूल के वर्तिकाग्र पर स्थानांतरित होते हैं। आनुवंशिक रूप से यह स्वपरागण जैसा ही होता है, क्योंकि दोनों फूल एक ही पौधे के होते हैं। 3. परपरागण (Xenogamy): जब परागकण किसी दूसरे पौधे के फूल के वर्तिकाग्र पर स्थानांतरित होते हैं। यह आनुवंशिक रूप से सबसे उत्तम होता है, क्योंकि इसमें विभिन्न पौधों के युग्मकों का संयोजन होता है।

परागण के लिए विभिन्न प्रकार के परागणक (Pollinators) सहायता करते हैं, जैसे कीट (Entomophily), वायु (Anemophily), जल (Hydrophily), पक्षी (Ornithophily) और चमगादड़ (Chiropterophily)। वायु परागण वाले पौधों के परागकण हल्के, चिकने और अधिक संख्या में होते हैं, जैसे मक्का और घास। कीट परागण वाले फूल बड़े, रंगीन और सुगंधित होते हैं तथा उनमें मधुरस (Nectar) होता है। जल परागण केवल कुछ जलीय पौधों में पाया जाता है, जैसे वेलिसनेरिया (Vallisneria) और ज़ोस्टेरा। वेलिसनेरिया में नर परागकण जल की सतह पर तैरते हुए मादा फूल तक पहुँचते हैं।

5.1 स्व-असंगतता (Self-Incompatibility)

कुछ पौधों में स्व-असंगतता (Self-incompatibility) पाई जाती है, जिसमें एक ही पौधे के परागकण वर्तिकाग्र पर गिरने के बाद भी निषेचन नहीं कर पाते। यह एक आनुवंशिक तंत्र है जो स्वपरागण को रोककर परपरागण को बढ़ावा देता है, जिससे आनुवंशिक विविधता बढ़ती है। स्व-असंगतता पेटूनिया, तम्बाकू और ब्रैसिका में पाई जाती है।

6. निषेचन (Fertilization)

परागकण वर्तिकाग्र पर पहुँचकर अंकुरित होता है और परागनलिका (Pollen tube) बनाता है। परागनलिका परागकण के छिद्र (germ pore) से बाहर निकलती है और वर्तिका के माध्यम से बीजाण्ड की ओर बढ़ती है। परागनलिका में दो नर युग्मक गति करते हैं। परागनलिका बीजाण्ड के द्वार (micropyle) से प्रवेश करके बीजाण्डकोश तक पहुँचती है।

बीजाण्डकोश में निम्नलिखित घटनाएँ होती हैं: - दोहरा निषेचन (Double Fertilization): एक नर युग्मक अंडाणु (Egg cell) के साथ संलयन करता है, जिससे युग्मनज (Zygote) बनता है। दूसरा नर युग्मक दो ध्रुवीय केन्द्रकों (Polar nuclei) के साथ संलयन करता है, जिससे त्रिगुणित (triploid) प्राथमिक भ्रूणपोष केन्द्रक (Primary Endosperm Nucleus) बनता है। यह दो संलयनों वाली प्रक्रिया केवल पुष्पी पादपों में पाई जाती है, इसलिए इसे दोहरा निषेचन (Double Fertilization) कहते हैं। - इस प्रक्रिया में एक साथ दो संलयन होते हैं, इसलिए इसे ट्रिपल फ्यूज़न (Triple fusion) भी कहते हैं जब नर युग्मक दो ध्रुवीय केन्द्रकों से मिलता है।

निषेचन के बाद युग्मनज भ्रूण में विकसित होता है और प्राथमिक भ्रूणपोष केन्द्रक से भ्रूणपोष (Endosperm) बनता है। भ्रूणपोष भ्रूण को पोषण प्रदान करता है। इस प्रकार निषेचन के बाद बीजाण्ड से बीज (Seed) तथा अंडाशय से फल (Fruit) का विकास होता है।

7. बीज और फल का विकास (Development of Seed and Fruit)

निषेचन के बाद बीजाण्ड से बीज का निर्माण होता है। बीज में भ्रूण (Embryo), भ्रूणपोष (Endosperm) और बीजचोल (Seed coat) होते हैं। भ्रूण में भ्रूणपोष (radicle), प्रांकुर (plumule), बीजपत्र (cotyledons) होते हैं। जिन पौधों में बीजों में भ्रूणपोष पाया जाता है, उन्हें सभ्रूणपोषी बीज (Endospermic seeds) कहते हैं, जैसे मक्का और नारियल। जिनमें भ्रूणपोष अनुपस्थित या बहुत कम होता है, वे अभ्रूणपोषी बीज (Non-endospermic seeds) कहलाते हैं, जैसे मटर और सेम।

निषेचन के बाद अंडाशय की दीवार फलभित्ति (Pericarp) में विकसित होती है, और अंडाशय से फल का निर्माण होता है। सरल फल (Simple fruit) एक अंडाशय से बनता है, जैसे आम और अमरूद। संयुक्त फल (Aggregate fruit) एक फूल के अनेक अंडाशयों से बनता है, जैसे स्ट्रॉबेरी। जब पूरा पुष्पक्रम फल में बदल जाता है तो उसे बहुफल (Multiple fruit) कहते हैं, जैसे अनानास और शहतूत। अनेक फलों में बीज बिना निषेचन के भी विकसित हो सकते हैं, जैसे केला और अंगूर, इस घटना को अनिषेची फलन (Parthenocarpy) कहते हैं।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: परागण के प्रकार

परागण प्रकार विवरण उदाहरण
स्वपरागण (Autogamy) एक ही फूल में गेहूँ, चावल
परपरागण (Geitonogamy) एक ही पौधे के दो फूल आनुवंशिक रूप से स्वपरागण जैसा
परपरागण (Xenogamy) दो भिन्न पौधों के फूल सबसे उत्तम, विविधता बढ़ाता है

तालिका 2: बीजाण्डकोश की संरचना

भाग स्थिति विशेषता
अंडाणु (Egg cell) द्वार के पास मादा युग्मक
सहायक कोशिकाएँ (Synergids) द्वार के पास अंडाणु के साथ (2)
ध्रुवीय केन्द्रक (Polar nuclei) मध्य दोहरे निषेचन में भाग लेते हैं
प्रतिमुख कोशिकाएँ (Antipodals) विपरीत छोर तीन कोशिकाएँ

तालिका 3: परागकण के आवरण

आवरण नाम विशेषता
बाहरी एक्ज़ाइन (Exine) स्पोरोपोलेनिन से बना, कठोर
आंतरिक इंटाइन (Intine) पतला, सेल्यूलोज-पेक्टिन

माइंड मैप

graph TD A["पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन"] --> B["परागकण विकास"] A --> C["बीजाण्ड विकास"] A --> D["परागण"] A --> E["निषेचन"] A --> F["बीज-फल विकास"] B --> B1["सूक्ष्मबीजाणुजनन"] B --> B2["कायिक व जनन कोशिका"] C --> C1["मेगास्पोरजनन"] C --> C2["बीजाण्डकोश (7 कोशिका, 8 केन्द्रक)"] D --> D1["स्वपरागण"] D --> D2["परपरागण-गीटोनोगैमी"] D --> D3["परपरागण-जेनोसी"] E --> E1["दोहरा निषेचन"] E --> E2["युग्मनज + भ्रूणपोष"] F --> F1["बीज"] F --> F2["फल"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

आरेख 1: फूल के भाग

फूल के मुख्य भाग दल (Petals) बाह्यदल परागकोष पुंकेसर वर्तिकाग्र वर्तिका अंडाशय स्त्रीकेसर: वर्तिकाग्र + वर्तिका + अंडाशय Golden Rule: फूल का स्त्रीकेसर ही मादा जनन अंग है जिसमें बीजाण्ड और बीजाण्डकोश पाए जाते हैं। बीजाण्ड से बीज तथा अंडाशय से फल बनता है।

आरेख 2: दोहरा निषेचन

दोहरा निषेचन (Double Fertilization) बीजाण्डकोश (7 कोशिका, 8 केन्द्रक) अंडाणु सहायक ध्रुवीय 2 प्रतिमुख नर युग्मक (2) परागनलिका नर युग्मक + अंडाणु युग्मनज (2n) नर युग्मक + 2 ध्रुवीय केन्द्रक प्राथमिक भ्रूणपोष केन्द्रक (3n) स्वर्ण नियम: दोहरा निषेचन केवल पुष्पी पादपों में होता है। एक संलयन से युग्मनज (2n) और दूसरे से भ्रूणपोष (3n) बनता है।

सामान्य गलतियाँ

  1. विद्यार्थी प्रायः स्वपरागण (Autogamy) और परपरागण (Geitonogamy) में भ्रमित होते हैं। Autogamy एक ही फूल में होता है, जबकि Geitonogamy एक ही पौधे के अलग-अलग फूलों में होता है।
  2. माइक्रोस्पोर मातृ कोशिका से बनने वाले परागकणों की संख्या (चार) को अक्सर गलत लिखा जाता है।
  3. परिपक्व बीजाण्डकोश में आठ केन्द्रक होते हैं जबकि कोशिकाओं की संख्या सात होती है; इस अंतर को याद रखना आवश्यक है।
  4. ध्रुवीय केन्द्रकों की संख्या दो और प्रतिमुख कोशिकाओं की संख्या तीन होती है, इसे विद्यार्थी उलट लिख देते हैं।
  5. दोहरा निषेचन में नर युग्मक का अंडाणु से संलयन युग्मनज बनाता है (2n), इसे भ्रूणपोष निर्माण से जोड़ने की गलती होती है।
  6. जल परागण (Hydrophily) को सामान्य परागण विधि मान लेना गलत है; यह केवल वेलिसनेरिया और ज़ोस्टेरा जैसे कुछ जलीय पौधों में पाया जाता है।
  7. अनिषेची फलन (Parthenocarpy) में बीज नहीं बनते, जैसे केला; इसे सामान्य फल विकास समझने की भूल होती है।
  8. एक्ज़ाइन की रचना स्पोरोपोलेनिन से होती है, न कि सेल्यूलोज से; यही कारण है कि यह अत्यंत कठोर होता है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. परागण के तीन प्रकारों की तालिका बनाकर उनके उदाहरण याद रखें, क्योंकि यह प्रश्न प्रायः परीक्षा में पूछा जाता है।
  2. बीजाण्डकोश का वर्णन करते समय सात कोशिका, आठ केन्द्रक का आरेख अवश्य बनाएं, इससे पूर्ण अंक मिलते हैं।
  3. दोहरा निषेचन समझाते समय दोनों संलयनों (युग्मनज 2n और भ्रूणपोष 3n) का स्पष्ट उल्लेख करें।
  4. माइक्रोस्पोरजनन और मेगास्पोरजनन की तुलना करके पढ़ें: दोनों में अर्धसूत्री विभाजन होता है।
  5. स्व-असंगतता का महत्व समझें: यह परपरागण को बढ़ावा देकर विविधता बढ़ाती है।
  6. बीजों के प्रकार (सभ्रूणपोषी और अभ्रूणपोषी) के उदाहरण याद रखें।
  7. अनिषेची फलन, बहुफल, संयुक्त फल के उदाहरणों की सूची बनाएं।
  8. परागणकों के प्रकार (कीट, वायु, जल, पक्षी, चमगादड़) के अंग्रेजी नाम (Entomophily, Anemophily आदि) याद रखें।

निष्कर्ष

पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन एक जटिल और अनूठी प्रक्रिया है। इसमें परागकोष से परागकण तथा अंडाशय में बीजाण्ड का विकास होता है। परागकणों का स्थानांतरण परागण द्वारा होता है, जो कीट, वायु, जल या पक्षियों की सहायता से हो सकता है। निषेचन के दौरान होने वाला दोहरा निषेचन पुष्पी पादपों की विशेषता है, जिसमें एक नर युग्मक अंडाणु से और दूसरा ध्रुवीय केन्द्रकों से संलयन करता है। इसके फलस्वरूप युग्मनज और भ्रूणपोष का निर्माण होता है। अंततः बीजाण्ड से बीज और अंडाशय से फल का विकास होता है। इन सभी प्रक्रियाओं का अध्ययन हमें पुष्पी पादपों के जीवन चक्र और उनके अस्तित्व की सफल रणनीतियों को समझने में सहायता करता है।