मानव में जनन एक जटिल और समन्वित प्रक्रिया है, जिसमें नर और मादा जनन तंत्र, युग्मकजनन, निषेचन, गर्भावस्था, भ्रूण विकास, प्रसव तथा स्तनपान जैसी अनेक घटनाएँ सम्मिलित होती हैं। मानव जनन प्रणाली का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी का निर्माण करना तथा प्रजाति की निरंतरता सुनिश्चित करना है। यह अध्याय मानव नर और मादा जनन तंत्र की संरचना, शुक्राणुजनन, अंडजनन, मासिक धर्म चक्र, निषेचन, गर्भावस्था और प्रसव की प्रक्रियाओं का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है। मानव में जनन के लिए यौवनावस्था (Puberty) से ही जनन अंग पूर्ण विकसित हो जाते हैं और तब से लेकर एक निश्चित आयु तक जनन की क्षमता बनी रहती है।
नर जनन तंत्र में निम्नलिखित अंग होते हैं: - वृषण (Testes): शुक्राणुओं और टेस्टोस्टेरोन हार्मोन के निर्माण का मुख्य स्थान। वृषण उदरगुहा के बाहर अंडकोश (Scrotum) नामक थैली में स्थित होते हैं, जिसका तापमान शरीर के तापमान से लगभग 2-2.5°C कम होता है। यह कम तापमान शुक्राणु निर्माण के लिए आवश्यक है। वृषण में अनेक सूक्ष्म नलिकाएँ होती हैं जिन्हें शुक्रजनक नलिकाएँ (Seminiferous tubules) कहते हैं। इन्हीं नलिकाओं में शुक्राणुओं का निर्माण होता है। शुक्रजनक नलिकाओं के बीच अंतरालीय कोशिकाएँ (Interstitial cells या Leydig cells) पाई जाती हैं, जो टेस्टोस्टेरोन हार्मोन स्रावित करती हैं। - वीर्यवाहिनी (Vas deferens): वृषण से शुक्राणुओं को वीर्य के मार्ग में पहुँचाने वाली नलिका। - शुक्राशय (Seminal vesicle), प्रोस्टेट ग्रंथि (Prostate gland) और बल्बोयूरेथ्रल ग्रंथियाँ (Bulbourethral glands): ये ग्रंथियाँ शुक्राणुओं के पोषण और परिवहन के लिए विभिन्न स्राव उत्पन्न करती हैं। शुक्राणु और इन ग्रंथियों के स्रावों के मिश्रण को वीर्य (Semen) कहते हैं। प्रोस्टेट ग्रंथि का स्राव वीर्य को तरल बनाता है और इसमें कैल्शियम, शर्करा आदि होते हैं। शुक्राशय वीर्य में फ्रक्टोज़ और प्रोस्टाग्लैंडिन प्रदान करता है। - मूत्रमार्ग (Urethra): पुरुषों में मूत्रमार्ग मूत्र और वीर्य दोनों का मार्ग होता है, इसलिए इसे साझा मार्ग कहा जाता है। - शिश्न (Penis): यह नर का बाह्य जनन अंग है, जो संभोग के दौरान शुक्राणु स्थानांतरण में सहायक होता है।
एक परिपक्व शुक्राणु लगभग 60 माइक्रोमीटर लंबा होता है और इसमें निम्नलिखित भाग होते हैं: - शीर्ष (Head): इसमें अगुणित केन्द्रक और एक्रोसोम (Acrosome) होता है। एक्रोसोम में पाचक एंजाइम होते हैं जो अंडाणु के आवरण को भेदने में सहायता करते हैं। - मध्यखंड (Middle piece): इसमें अनेक माइटोकॉन्ड्रिया होते हैं जो गति के लिए ऊर्जा (ATP) प्रदान करते हैं। - पुच्छ (Tail): यह गति के लिए जिम्मेदार होता है।
मादा जनन तंत्र में निम्नलिखित अंग होते हैं: - अंडाशय (Ovaries): मादा में दो अंडाशय होते हैं, जो अंडाणु (Ova) तथा एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन का निर्माण करते हैं। अंडाशय उदरगुहा में गर्भाशय के दोनों ओर स्थित होते हैं। - अंडवाहिनी (Fallopian tubes / Oviducts): ये अंडाशय से गर्भाशय तक जाने वाली नलिकाएँ हैं। अंडवाहिनी के तीन भाग होते हैं: इन्फंडिबुलम (Infundibulum), एम्पुला (Ampulla) और इस्थमस (Isthmus)। इन्फंडिबुलम के मुक्त छोर पर फ़िम्ब्री (Fimbriae) नामक उंगली जैसे उभार होते हैं जो अंडाणु को ग्रहण करते हैं। निषेचन प्रायः अंडवाहिनी के एम्पुला भाग में होता है। - गर्भाशय (Uterus): यह बराबर बारहमासी मांसपेशीय अंग है, जिसमें भ्रूण का प्रत्यारोपण (Implantation) और विकास होता है। गर्भाशय की दीवार तीन परतों से बनी होती है: बाहरी परिगर्भाशय (Perimetrium), मध्य पेशीय गर्भाशयपेशी (Myometrium) और आंतरिक अंतर्गर्भाशय (Endometrium)। अंतर्गर्भाशय में भ्रूण का प्रत्यारोपण होता है। गर्भाशय का निचला संकीर्ण भाग गर्भाशयग्रीवा (Cervix) कहलाता है। - योनि (Vagina): यह एक नली जैसा अंग है जो शुक्राणुओं को ग्रहण करता है तथा बच्चे के जन्म (प्रसव) का मार्ग है। योनि में कुछ अम्लीय स्राव होता है जो रोगाणुओं से सुरक्षा प्रदान करता है। - बाह्य जननांग: इसमें वल्वा (Vulva), भगोष्ठ (Labia), मदनाभ (Clitoris) आदि शामिल हैं। योनि के बाहरी द्वार को हाइमन (Hymen) आवृत करता है।
स्त्रियों में प्रायः 28 दिनों का मासिक धर्म चक्र होता है। यह चक्र चार चरणों में विभाजित होता है: - मासिक स्राव चरण (Menstrual Phase): पहले 3-5 दिनों में अंतर्गर्भाशय की टूटी हुई परत मासिक रक्त और स्राव के रूप में बाहर निकलती है। - फॉलिक्यूलर चरण (Follicular Phase): 5वें से 13वें दिन तक अंडाशय में अंडाणु विकसित होता है और अंतर्गर्भाशय मोटा होता है। इस चरण में FSH का स्तर बढ़ता है और एस्ट्रोजन का स्राव बढ़ता है। - अंडोत्सर्ग (Ovulation): 14वें दिन (चक्र के मध्य) परिपक्व अंडाणु अंडाशय से बाहर निकलता है। यह LH हार्मोन के चरम स्तर के कारण होता है। - पीत पिंड चरण (Luteal Phase): अंडोत्सर्ग के बाद पीत पिंड (Corpus luteum) प्रोजेस्टेरोन स्रावित करता है, जो अंतर्गर्भाशय को गर्भधारण के लिए तैयार करता है। यदि निषेचन नहीं होता, तो पीत पिंड क्षय हो जाता है और नया चक्र प्रारंभ होता है।
मासिक धर्म चक्र का नियंत्रण हाइपोथैलेमस, पिट्यूटरी ग्रंथि और अंडाशय के हार्मोन द्वारा होता है। मुख्य हार्मोन हैं: GnRH (गोनैडोट्रोपिन रिलीज़िंग हार्मोन), FSH, LH, एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन।
युग्मकों के निर्माण की प्रक्रिया को युग्मकजनन कहते हैं। नर में इसे शुक्राणुजनन (Spermatogenesis) और मादा में अंडजनन (Oogenesis) कहते हैं।
शुक्राणुजनन वृषण की शुक्रजनक नलिकाओं में होता है। इसमें निम्नलिखित चरण होते हैं: - प्रारंभिक द्विगुणित जनन कोशिकाएँ (Spermatogonia) कई बार समसूत्री विभाजन करके अधिक कोशिकाएँ बनाती हैं। इनमें से कुछ कोशिकाएँ वृद्धि करके प्राथमिक शुक्राणुक (Primary Spermatocyte) बन जाती हैं। - प्राथमिक शुक्राणुक अर्धसूत्री विभाजन I द्वारा दो अगुणित द्वितीयक शुक्राणुक (Secondary Spermatocytes) बनाता है। - प्रत्येक द्वितीयक शुक्राणुक अर्धसूत्री विभाजन II द्वारा दो शुक्राणुजन (Spermatids) बनाता है। - शुक्राणुजन कायिक रूपांतरण (Spermiogenesis) द्वारा परिपक्व शुक्राणुओं में बदल जाते हैं। - इस प्रकार एक प्राथमिक शुक्राणुक से चार अगुणित शुक्राणु बनते हैं।
अंडजनन अंडाशय में होता है। इसमें निम्नलिखित चरण होते हैं: - अंडाशय में उपस्थित प्रारंभिक जनन कोशिकाएँ (Oogonia) समसूत्री विभाजन द्वारा प्राथमिक अंडक (Primary Oocyte) बनाती हैं। प्राथमिक अंडक का निर्माण जन्म से पहले ही हो जाता है। - प्राथमिक अंडक यौवनावस्था तक प्रोफेज़ I अवस्था में रुका रहता है। - अंडोत्सर्ग के पूर्व प्राथमिक अंडक अर्धसूत्री विभाजन I पूर्ण करता है, जिससे एक बड़ी कोशिका द्वितीयक अंडक (Secondary Oocyte) और एक छोटी कोशिका प्रथम ध्रुव काय (First polar body) बनती है। - द्वितीयक अंडक अंडोत्सर्ग के दौरान अंडाशय से बाहर निकलता है और मेटाफ़ेज़ II में रुक जाता है। - निषेचन के बाद ही यह अर्धसूत्री विभाजन II पूर्ण करके परिपक्व अंडाणु बनाता है। - इस प्रकार एक प्राथमिक अंडक से केवल एक परिपक्व अंडाणु बनता है, शेष तीन अगुणित कोशिकाएँ ध्रुव काय (Polar bodies) होती हैं जो नष्ट हो जाती हैं।
संभोग के दौरान शुक्राणु योनि में स्थानांतरित होते हैं। शुक्राणु गर्भाशय और अंडवाहिनी में गति करते हैं और अंडवाहिनी के एम्पुला भाग में परिपक्व अंडाणु से मिलते हैं। शुक्राणु के अंडाणु से मिलने की घटना निषेचन कहलाती है। निषेचन के समय केवल एक शुक्राणु अंडाणु में प्रवेश करता है, क्योंकि प्रवेश के बाद अंडाणु की झिल्ली अन्य शुक्राणुओं के लिए अभेद्य हो जाती है। इस घटना को युग्मक रोध (Block to polyspermy) कहते हैं।
निषेचन के बाद युग्मनज (Zygote) बनता है। युग्मनज अंडवाहिनी में होते हुए समसूत्री विभाजन (क्लीवेज) द्वारा विभाजित होकर ब्लास्टोमीयर्स बनाता है। अंडवाहिनी के क्रमाकुंचन के कारण यह गर्भाशय की ओर बढ़ता है। लगभग 8-16 कोशिका अवस्था को मोरुला (Morula) कहते हैं। मोरुला आगे बढ़कर ब्लास्टोसिस्ट (Blastocyst) में बदल जाता है, जिसमें बाहरी ट्रोफोब्लास्ट परत और आंतरिक कोशिका समूह होता है। ब्लास्टोसिस्ट का प्रत्यारोपण अंतर्गर्भाशय (Endometrium) में होता है, जिसे प्रत्यारोपण (Implantation) कहते हैं। प्रत्यारोपण के बाद गर्भावस्था प्रारंभ होती है।
गर्भावस्था के दौरान भ्रूण का विकास गर्भाशय में होता है। गर्भावस्था में नाल (Placenta) का विकास होता है, जो भ्रूण को पोषक तत्व, ऑक्सीजन प्रदान करता है तथा अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालता है। नाल विलाई (Chorionic villi) और अंतर्गर्भाशय के ऊतकों के संलयन से बनती है। नाल ह्यूमन कोरियोनिक गोनैडोट्रोपिन (hCG), ह्यूमन प्लेसेंटल लैक्टोजेन (hPL), एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन भी स्रावित करती है। गर्भावस्था की अवधि लगभग 280 दिन (लगभग 9 माह) की होती है।
भ्रूण के विकास के पूर्ण होने पर गर्भाशय के संकुचन से शिशु का जन्म होता है, इस प्रक्रिया को प्रसव (Parturition) कहते हैं। प्रसव के समय गर्भाशय की दीवार में तीव्र लयबद्ध संकुचन होते हैं जिन्हें प्रसव वेदनाएँ (Labour pains) कहते हैं। प्रसव की प्रक्रिया हार्मोन ऑक्सीटोसिन द्वारा नियंत्रित होती है, जो पिट्यूटरी ग्रंथि से स्रावित होता है। ऑक्सीटोसिन गर्भाशय की पेशियों में संकुचन उत्पन्न करता है और प्रसव में सहायता करता है। इसी प्रक्रिया में प्रोस्टाग्लैंडिन भी भाग लेते हैं।
शिशु के जन्म के बाद स्तन ग्रंथियों से दूध स्रावित होता है, जिसे स्तनपान (Lactation) कहते हैं। स्तन ग्रंथियों में स्थित कोशिकाएँ शिशु के लिए दूध का स्राव करती हैं। शिशु के स्तन चूसने से ऑक्सीटोसिन का स्राव बढ़ता है जो दूध के निष्कासन में सहायता करता है। स्तनपान शिशु के लिए अत्यंत लाभदायक है, क्योंकि माँ का दूध शिशु के लिए संपूर्ण पोषण प्रदान करता है और इसमें एंटीबॉडी होती हैं जो शिशु को रोगों से बचाती हैं। जन्म के तुरंत बाद स्रावित होने वाला पहला दूध कोलोस्ट्रम (Colostrum) कहलाता है, जो एंटीबॉडी से भरपूर होता है।
| अंग | कार्य |
|---|---|
| वृषण (Testis) | शुक्राणु और टेस्टोस्टेरोन का निर्माण |
| अंडकोश (Scrotum) | वृषण का तापमान नियंत्रण |
| वीर्यवाहिनी (Vas deferens) | शुक्राणु का परिवहन |
| शुक्राशय, प्रोस्टेट ग्रंथि | वीर्य द्रव का स्राव |
| मूत्रमार्ग (Urethra) | मूत्र और वीर्य का साझा मार्ग |
| चरण | दिन | मुख्य घटना |
|---|---|---|
| मासिक स्राव | 1-5 | अंतर्गर्भाशय परत का त्याग |
| फॉलिक्यूलर | 5-13 | अंडाणु विकास, एस्ट्रोजन बढ़ना |
| अंडोत्सर्ग | 14 | LH चरम, अंडाणु का निष्कासन |
| पीत पिंड | 15-28 | प्रोजेस्टेरोन, गर्भधारण की तैयारी |
| विशेषता | शुक्राणुजनन | अंडजनन |
|---|---|---|
| स्थान | वृषण | अंडाशय |
| उत्पाद | 4 शुक्राणु | 1 अंडाणु + 3 ध्रुव काय |
| प्रारंभ | यौवनावस्था से | जन्म से पहले (रुककर) |
मानव जनन एक व्यवस्थित और हार्मोन नियंत्रित प्रक्रिया है। नर और मादा जनन तंत्र के अंग युग्मकों का निर्माण करते हैं, जिनके मिलने से निषेचन और नई पीढ़ी का निर्माण होता है। शुक्राणुजनन और अंडजनन के माध्यम से अगुणित युग्मक बनते हैं, तथा मासिक धर्म चक्र मादा में गर्भधारण की तैयारी करता है। निषेचन के बाद युग्मनज का विकास, प्रत्यारोपण, गर्भावस्था और अंततः प्रसव तथा स्तनपान द्वारा नवजात शिशु का पोषण होता है। इस अध्याय का अध्ययन हमें मानव की जनन प्रक्रिया और उसके हार्मोनल नियंत्रण की गहरी समझ प्रदान करता है, जो चिकित्सा विज्ञान के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।