वंशागति (Inheritance) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा आनुवंशिक गुण एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में स्थानांतरित होते हैं। इस विषय का वैज्ञानिक अध्ययन मुख्यतः ग्रेगर जॉन मेंडल (Gregor Johann Mendel) द्वारा प्रारंभ हुआ, जिन्हें आनुवंशिकी का जनक (Father of Genetics) कहा जाता है। मेंडल ने सन् 1856 से 1863 तक बगीचे के मटर के पौधे (Pisum sativum) पर प्रयोग करके वंशागति के मूलभूत नियमों को प्रतिपादित किया। विविधता (Variation) से तात्पर्य जीवों में पाई जाने वाली आनुवंशिक भिन्नताओं से है। ये भिन्नताएँ जनन के दौरान उत्पन्न होती हैं। मेंडल के कार्य को सन् 1900 तक मान्यता नहीं मिली, जब तीन वैज्ञानिकों (डी व्रीज़, कोरेन्स और शर्मक) ने स्वतंत्र रूप से उसी परिणाम को पुनः खोजा।
मेंडल ने अपने प्रयोगों के लिए मटर के पौधे को क्यों चुना? इसके निम्नलिखित कारण हैं: - मटर का पौधा बहुत कम समय में उगकर फूल देता है, जिससे एक ही वर्ष में अनेक पीढ़ियों का अध्ययन संभव होता है। - इसमें स्पष्ट और अविरल (contrasting) लक्षण होते हैं, जैसे ऊँचाई (ऊँचा/बौना), बीज का आकार (गोल/झुर्रीदार), बीज का रंग (पीला/हरा)। - मटर स्वपरागण (self-pollination) करने वाला पौधा है, जिससे शुद्ध (pure) वंशक्रम प्राप्त होते हैं। इसमें परपरागण भी आसानी से कराया जा सकता है।
मेंडल ने अपने प्रयोगों में सात अविरल लक्षणों का चयन किया। इन्हें मोनोहाइब्रिड (एकल लक्षण) और डायहाइब्रिड (दो लक्षण) क्रॉसों के माध्यम से अध्ययन किया गया।
मेंडल ने ऊँचे और बौने मटर के पौधों का क्रॉस किया। प्रथम पुश्ती (F1 पीढ़ी) में सभी पौधे ऊँचे थे। जब F1 पीढ़ी के पौधों का स्वपरागण कराया गया, तो F2 पीढ़ी में ऊँचे और बौने पौधों का अनुपात 3:1 था। इससे मेंडल ने निष्कर्ष निकाला कि किसी लक्षण का प्रत्येक जीन दो रूपों (एलील) में मौजूद होता है। ऊँचाई को नियंत्रित करने वाले एलील 'T' (प्रभावी) और 't' (अप्रभावी) मानें तो F1 पीढ़ी के सभी पौधे 'Tt' (संकर) थे और सभी ऊँचे, क्योंकि T प्रभावी है। F2 पीढ़ी में 'TT', 'Tt', 'tT' और 'tt' का अनुपात 1:2:1 तथा फेनोटाइपिक अनुपात 3:1 (ऊँचे : बौने) प्राप्त हुआ।
इस नियम के अनुसार, "किसी भी जीन के एलील (युग्मकजनन के दौरान) अलग-अलग युग्मकों में पृथक हो जाते हैं, ताकि प्रत्येक युग्मक में केवल एक एलील रहे।" इसका अर्थ है कि युग्मकजनन के समय प्रत्येक जीन की एक एलील कोशिका के दो रूपों में से एक ही रूप युग्मक में पहुँचता है। इसे ही पृथक्करण का नियम (Law of Segregation) या विभिन्नता का नियम कहते हैं। यही नियम मेंडल का पहला नियम है।
इस नियम के अनुसार, "एक लक्षण को नियंत्रित करने वाले जीन के एलील दूसरे लक्षण के जीन के एलील से स्वतंत्र रूप से वितरित होते हैं।" इसे डायहाइब्रिड क्रॉस के माध्यम से समझाया जा सकता है। जब मेंडल ने गोल पीले बीज वाले और झुर्रीदार हरे बीज वाले मटर के पौधों का क्रॉस किया, तो F1 पीढ़ी में सभी बीज गोल पीले थे। F2 पीढ़ी में फेनोटाइपिक अनुपात 9:3:3:1 प्राप्त हुआ (गोल पीले : गोल हरे : झुर्रीदार पीले : झुर्रीदार हरे)। यह अनुपात स्वतंत्र अपव्यूहन को सिद्ध करता है।
इस नियम के अनुसार, "किसी जीन के दो एलीलों में से एक एलील (प्रभावी) दूसरे एलील (अप्रभावी) के प्रभाव को दबा देता है।" यही कारण है कि F1 पीढ़ी में केवल प्रभावी लक्षण ही दिखाई देता है। प्रभावी एलील की उपस्थिति में अप्रभावी लक्षण प्रकट नहीं होता।
कुछ लक्षणों में जीन के दो से अधिक एलील होते हैं, जिन्हें बहुएलीली लक्षण कहते हैं। उदाहरण: मानव में ABO रक्त समूह। यह जीन के तीन एलील IA, IB और i द्वारा नियंत्रित होता है। इन तीन एलीलों के संयोजन से छह जीनोटाइप और चार फेनोटाइप बनते हैं: A, B, AB और O। रक्त समूह O के लिए जीनोटाइप ii होता है। AB रक्त समूह में IA और IB सहप्रभावी होते हैं। i एलील IA और IB दोनों के प्रति अप्रभावी होता है। इस प्रकार IAIA या IAi से A समूह, IBIB या IBi से B समूह, IAIB से AB समूह और ii से O समूह बनता है।
मनुष्यों में लिंग निर्धारण X और Y गुणसूत्रों द्वारा होता है। मनुष्य में 46 गुणसूत्र (23 युग्म) होते हैं, जिनमें 22 युग्म ऑटोसोम और 1 युग्म लिंग गुणसूत्र होते हैं। मादा में दो X गुणसूत्र (XX) होते हैं, जबकि नर में एक X और एक Y गुणसूत्र (XY) होते हैं। मादा के सभी अंडाणुओं में X गुणसूत्र होता है, जबकि नर के शुक्राणुओं में से आधे में X और आधे में Y गुणसूत्र होता है। यदि X युक्त शुक्राणु अंडाणु से निषेचित होता है, तो संतति मादा (XX) होगी; और यदि Y युक्त शुक्राणु निषेचित होता है, तो संतति नर (XY) होगी। अतः संतति का लिंग पिता के शुक्राणु के गुणसूत्र प्रकार पर निर्भर करता है।
मनुष्यों में रक्त स्रावी विकार (Haemophilia), वर्णान्धता (Colour blindness) जैसे अनेक विकार X गुणसूत्र पर स्थित अप्रभावी जीनों के कारण होते हैं। इन्हें X-संबंधित विकार कहते हैं। वर्णान्धता और हीमोफीलिया पुरुषों में अधिक पाए जाते हैं, क्योंकि पुरुष में केवल एक X गुणसूत्र होता है, और यदि उसमें अप्रभावी जीन हो तो रोग प्रकट हो जाता है।
विविधता जीवों में आनुवंशिक भिन्नता उत्पन्न करती है। इसके प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं: - पारगमन (Crossing over): अर्धसूत्री विभाजन के दौरान समजात गुणसूत्रों के बीच खंडों का आदान-प्रदान। - स्वतंत्र अपव्यूहन (Independent Assortment): गुणसूत्रों का युग्मकों में स्वतंत्र वितरण। - निषेचन (Fertilization): युग्मकों का यादृच्छिक संयोजन। - उत्परिवर्तन (Mutation): DNA अनुक्रम में परिवर्तन। - जीन प्रवाह (Gene Flow) और जनन में परिवर्तन।
| नियम | विवरण | F2 अनुपात |
|---|---|---|
| प्रभाविता का नियम | प्रभावी एलील अप्रभावी को दबाता है | 3:1 |
| विभिन्नता का नियम | एलील युग्मकों में पृथक होते हैं | 3:1 |
| स्वतंत्र अपव्यूहन | विभिन्न लक्षणों के जीन स्वतंत्र रूप से वितरित | 9:3:3:1 |
| लक्षण | प्रभावी | अप्रभावी |
|---|---|---|
| बीज का आकार | गोल | झुर्रीदार |
| बीज का रंग | पीला | हरा |
| फूल का रंग | बैंगनी | सफेद |
| फली का आकार | चिकनी | सिकुड़ी |
| फली का रंग | हरा | पीला |
| फूल की स्थिति | अक्षीय | शीर्षस्थ |
| तने की ऊँचाई | ऊँचा | बौना |
| रक्त समूह | जीनोटाइप |
|---|---|
| A | IAIA या IAi |
| B | IBIB या IBi |
| AB | IAIB |
| O | ii |
वंशागति तथा विविधता आनुवंशिकी का आधार है। मेंडल ने मटर पर किए गए प्रयोगों से वंशागति के तीन नियम प्रतिपादित किए, जिनमें प्रभाविता, विभिन्नता और स्वतंत्र अपव्यूहन शामिल हैं। इन नियमों के आधार पर ही आधुनिक आनुवंशिकी का विकास हुआ। अपूर्ण प्रभाविता, सहप्रभाविता और बहुएलीली लक्षणों (जैसे ABO रक्त समूह) के अध्ययन ने मेंडल के नियमों में परिष्कार किया। लिंग निर्धारण X और Y गुणसूत्रों द्वारा होता है। विविधता के स्रोत जैसे पारगमन, स्वतंत्र अपव्यूहन और उत्परिवर्तन जीवों में आनुवंशिक भिन्नता उत्पन्न करते हैं, जो विकास की प्रक्रिया में सहायक होते हैं। इस अध्याय का ज्ञान आनुवंशिक विकारों की समझ और चिकित्सा विज्ञान की उन्नति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।