वंशागति का आणविक आधार (Molecular Basis of Inheritance) यह समझाता है कि आनुवंशिक सूचना किस रूप में संग्रहीत, स्थानांतरित और अभिव्यक्त होती है। आनुवंशिक पदार्थ के रूप में DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल) की पहचान सन् 1928 के फ्रेडरिक ग्रिफ़िथ के प्रयोग से प्रारंभ हुई, जिन्होंने जीवाणु न्यूमोकोकस पर परिवर्तन (Transformation) के प्रयोग किए। बाद में 1944 में एवरी, मैकलियॉड और मैककार्टी ने सिद्ध किया कि परिवर्तन का कारक DNA है। सन् 1953 में जेम्स वॉटसन और फ्रांसिस क्रिक ने DNA की द्विकुंडलित (Double Helix) संरचना का प्रस्ताव रखा। इसके बाद अनुवांशिक सूचना के संग्रहण, प्रतिकृति, प्रतिलेखन और अनुवाद की प्रक्रियाओं का विस्तृत अध्ययन हुआ।
DNA एक लंबा बहुलक (Polymer) है जो न्यूक्लियोटाइड (Nucleotides) नामक मोनोमरों से मिलकर बना होता है। प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड तीन घटकों से बना होता है: नाइट्रोजनयुक्त क्षारक (Nitrogenous base), पेन्टोज़ शर्करा (डीऑक्सीराइबोज़) और फॉस्फेट समूह। DNA में चार प्रकार के क्षारक होते हैं: एडेनिन (A), गुआनिन (G), साइटोसिन (C) और थाइमिन (T)। एडेनिन और गुआनिन प्यूरीन होते हैं, जबकि साइटोसिन और थाइमिन पाइरीमिडीन होते हैं।
वॉटसन-क्रिक मॉडल के अनुसार, DNA दो पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं से बना होता है जो एक सीढ़ी की भाँति कुंडलित होकर द्विकुंडलित (Double Helix) बनाती हैं। इन दोनों श्रृंखलाओं में हाइड्रोजन बंध द्वारा क्षारक जुड़े होते हैं। क्षारक युग्मन (Base pairing) का नियम: एडेनिन (A) सदैव थाइमिन (T) से दो हाइड्रोजन बंधों द्वारा और गुआनिन (G) सदैव साइटोसिन (C) से तीन हाइड्रोजन बंधों द्वारा जुड़ा होता है। इस युग्मन के कारण DNA की दोनों श्रृंखलाएँ परस्पर पूरक (Complementary) होती हैं। दोनों श्रृंखलाएँ प्रतिसमानांतर (Antiparallel) होती हैं, अर्थात एक श्रृंखला 5'-3' दिशा में तथा दूसरी 3'-5' दिशा में होती है।
DNA के प्रत्येक घुमाव (Turn) में 10 क्षारक युग्म होते हैं। DNA अणु का व्यास लगभग 20 Å (2 नैनोमीटर) होता है। एक चक्कर की लंबाई लगभग 34 Å होती है। DNA में नकारात्मक आवेश होता है क्योंकि फॉस्फेट समूह में ऋणात्मक आवेश होते हैं। कोशिका में DNA हिस्टोन प्रोटीन से बंधा होता है। DNA की लंबाई को अलग-अलग जीवों में न्यूक्लियोटाइड की संख्या के रूप में मापा जाता है। मानव में प्रति कोशिका DNA की कुल लंबाई लगभग 6.6 × 10^9 bp (base pairs) होती है।
DNA प्रतिकृति वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा DNA का अपना ही प्रति निर्माण होता है। यह कोशिका विभाजन से पहले होती है, ताकि प्रत्येक संतति कोशिका को पूरा आनुवंशिक पदार्थ प्राप्त हो। DNA प्रतिकृति का मॉडल अर्धरूढ़िवादी (Semiconservative) होता है, जिसे मेसेलसन और स्टाहल ने E. coli पर प्रयोग करके सिद्ध किया। इसके अनुसार, प्रतिकृति के बाद प्रत्येक DNA अणु में एक पुरानी श्रृंखला और एक नई श्रृंखला होती है।
प्रतिकृति की प्रक्रिया: - DNA प्रतिकृति मूल बिंदु (Origin of replication) से प्रारंभ होती है। - एंजाइम हेलिकेज़ (Helicase) हाइड्रोजन बंधों को तोड़कर DNA की दोनों श्रृंखलाओं को अलग करता है। - एंजाइम DNA पॉलीमरेज़ (DNA Polymerase) नए न्यूक्लियोटाइड को पूरक श्रृंखला के अनुसार जोड़ता है। यह केवल 5'-3' दिशा में न्यूक्लियोटाइड जोड़ सकता है। - अग्रवर्ती श्रृंखला (Leading strand) निरंतर 5'-3' दिशा में संश्लेषित होती है, जबकि पश्चवर्ती श्रृंखला (Lagging strand) ओकाज़ाकी खंड (Okazaki fragments) के रूप में असंतत रूप से संश्लेषित होती है। - एंजाइम DNA लाइगेज़ (DNA Ligase) ओकाज़ाकी खंडों को जोड़ता है।
प्रतिलेखन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा DNA के एक खंड (जीन) से mRNA (मैसेंजर RNA) का निर्माण होता है। यह प्रक्रिया एंजाइम RNA पॉलीमरेज़ (RNA Polymerase) द्वारा नियंत्रित होती है। प्रतिलेखन के तीन चरण होते हैं: आरंभ (Initiation), दीर्घीकरण (Elongation) और समाप्ति (Termination)।
प्रतिलेखन में DNA की केवल एक श्रृंखला (टेम्पलेट श्रृंखला) का उपयोग होता है। जीन की दो श्रृंखलाओं में से एक को कोडन श्रृंखला (Coding strand) और दूसरी को टेम्पलेट श्रृंखला (Template strand) कहा जाता है। RNA में थाइमिन (T) के स्थान पर यूरेसिल (U) होता है। इसलिए RNA न्यूक्लियोटाइड A, U, G, C होते हैं।
अनुवाद वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा mRNA के क्रम का उपयोग प्रोटीन बनाने के लिए किया जाता है। यह प्रक्रिया राइबोसोम पर होती है। mRNA पर प्रत्येक तीन न्यूक्लियोटाइड (कोडोन) एक विशेष अमीनो अम्ल को निर्धारित करता है। tRNA (ट्रांसफर RNA) कोडोन के एंटीकोडोन से मिलकर अमीनो अम्ल लाता है। कोडोन का कोड कार्य निम्नलिखित होता है:
अनुवाद के चरण: आरंभ, दीर्घीकरण और समाप्ति। अनुवाद के दौरान राइबोसोम mRNA के 5' से 3' दिशा में गति करता है और पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला N-टर्मिनस से C-टर्मिनस की ओर बढ़ती है। तीन अमीनो अम्ल मिलाकर एक ट्रिपलेट कोडोन (जेनेटिक कोड) बनता है। जेनेटिक कोड सार्वभौमिक (Universal) और अर्थपूर्ण होता है।
जेनेटिक कोड के निम्नलिखित महत्वपूर्ण गुण हैं: - कोड ट्रिपलेट होता है, अर्थात तीन न्यूक्लियोटाइड मिलकर एक अमीनो अम्ल को कोड करते हैं। - कोड असंक्रामक (Non-overlapping) होता है, अर्थात प्रत्येक कोडोन की रीडिंग एक साथ होती है। - कोड अर्थपूर्ण (Degenerate) होता है, अर्थात एक ही अमीनो अम्ल को अनेक कोडोन कोड कर सकते हैं। - कोड सार्वभौमिक (Universal) होता है, अर्थात सभी जीवों में एक ही कोड कार्य करता है। - AUG आरंभ कोडोन है, जबकि UAA, UAG, UGA समाप्ति कोडोन हैं। - आनुवंशिक कोड को सन् 1966 में हार गोबिंद खुराना, मार्शल नीरनबर्ग और रॉबर्ट हॉली के प्रयोगों से समझा गया। इसके लिए खुराना और नीरनबर्ग को नोबेल पुरस्कार मिला।
जीनों की अभिव्यक्ति का विनियमन यूकेरियोट्स और प्रोकैरियोट्स में भिन्न होता है। प्रोकैरियोट्स में लैक ओपेरोन (Lac Operon) इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसे फ्रेंकोइस जैकब और जैक्स मोनोड ने प्रस्तावित किया। लैक ओपेरोन में तीन संरचनात्मक जीन होते हैं: z (बीटा-गैलेक्टोसिडेज़), y (पर्मिएज़) और a (ट्रांसएसिटाइलेज़)। इनके अलावा प्रमोटर (Promoter), ऑपरेटर (Operator) और नियामक जीन (Regulator gene) होते हैं।
मानव जीनोम परियोजना सन् 1990 में प्रारंभ हुई और सन् 2003 में पूर्ण हुई। यह एक अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक प्रयास था जिसका उद्देश्य मानव के संपूर्ण आनुवंशिक अनुक्रम (जीनोम) का निर्धारण करना था। मानव जीनोम में लगभग 3.1 × 10^9 bp (आधार युग्म) होते हैं। मानव जीनोम परियोजना के मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित हैं: - मानव जीनोम में लगभग 20,000-25,000 जीन होते हैं। - मानव जीनोम का केवल लगभग 2% ही प्रोटीन को कोड करता है, शेष गैर-कोडिंग DNA है। - अनेक जीन अनेक प्रोटीन बना सकते हैं (Alternate splicing)। - मानव DNA का लगभक 99.9% सभी व्यक्तियों में समान होता है, केवल 0.1% भिन्न होता है।
इस परियोजना में प्रयुक्त विधियाँ: EST (Expressed Sequence Tags), STS (Sequence Tagged Sites), DNA अनुक्रमण तकनीक। संस्थान: राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (NIH) यूएसए, वेलकम ट्रस्ट (यूके)।
| विशेषता | DNA | RNA |
|---|---|---|
| शर्करा | डीऑक्सीराइबोज़ | राइबोज़ |
| क्षारक | A, T, G, C | A, U, G, C |
| श्रृंखला | द्विकुंडलित | एकल |
| कार्य | आनुवंशिक सूचना | प्रोटीन संश्लेषण में सहायक |
| कोडोन | कार्य |
|---|---|
| AUG | आरंभ कोडोन (मेथियोनीन) |
| UAA | समाप्ति कोडोन |
| UAG | समाप्ति कोडोन |
| UGA | समाप्ति कोडोन |
| एंजाइम | कार्य |
|---|---|
| हेलिकेज़ | DNA श्रृंखलाओं का अलग होना |
| DNA पॉलीमरेज़ | न्यूक्लियोटाइड जोड़ना |
| DNA लाइगेज़ | ओकाज़ाकी खंड जोड़ना |
| RNA पॉलीमरेज़ | mRNA का निर्माण |
वंशागति का आणविक आधार DNA के गुणों और प्रक्रियाओं पर आधारित है। DNA की द्विकुंडलित संरचना, क्षारक युग्मन का नियम और अर्धरूढ़िवादी प्रतिकृति आनुवंशिक सूचना के संरक्षण और संचरण को सुनिश्चित करते हैं। प्रतिलेखन और अनुवाद द्वारा आनुवंशिक सूचना प्रोटीन में परिवर्तित होती है। जीन विनियमन (लैक ओपेरोन) यह बताता है कि कोशिका किस प्रकार जीनों की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करती है। मानव जीनोम परियोजना ने मानव आनुवंशिक संरचना की जटिलता को उजागर किया। इन सभी अवधारणाओं का ज्ञान आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी, आनुवंशिक रोगों के उपचार और DNA फॉरेंसिक विज्ञान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।