विकास (Evolution) जीवन के इतिहास में होने वाले क्रमिक परिवर्तनों की प्रक्रिया है, जिसके द्वारा आधुनिक जीवों की उत्पत्ति उनके पूर्वजों से हुई। विकास का आधुनिक सिद्धांत चार्ल्स डार्विन द्वारा प्रतिपादित प्राकृतिक चयन के सिद्धांत (Theory of Natural Selection) पर आधारित है। इससे पहले लैमार्क ने अर्जित लक्षणों के वंशागति का सिद्धांत प्रस्तुत किया था। डार्विन का सिद्धांत सन् 1859 में 'ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़' (On the Origin of Species) नामक पुस्तक में प्रकाशित हुआ। विकास के अध्ययन से हमें पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति, जीवों की विविधता और जीवाश्मों के माध्यम से जीवन के इतिहास को समझने में सहायता मिलती है। यह अध्याय विकास के सिद्धांतों, जीवन की उत्पत्ति, जीवाश्म साक्ष्य और मानव विकास पर केंद्रित है।
पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के संबंध में अनेक सिद्धांत हैं। प्रारंभ में अधिकांश वैज्ञानिकों का मानना था कि जीवन सहज उत्पत्ति (Abiogenesis/Spontaneous generation) से हुआ। इस सिद्धांत का खंडन फ्रांसेस्को रेडी, स्पैलंज़ानी और लुई पाश्चर के प्रयोगों से हुआ। लुई पाश्चर ने स्वान-नेक फ्लास्क प्रयोग द्वारा यह सिद्ध किया कि जीवन केवल पहले से विद्यमान जीवन से ही उत्पन्न होता है (Biogenesis)।
ओपेरिन और हाल्डेन ने सुझाव दिया कि प्रथम जीवन रूपों की उत्पत्ति अजैविक (abiotic) अणुओं से हुई होगी। इस परिकल्पना के अनुसार, आदि पृथ्वी के वातावरण में मीथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन और जलवाष्प थे। यूवी विकिरण और विद्युत तड़ित की ऊर्जा से इन गैसों से सरल कार्बनिक अणु बने, जो महासागरों में एकत्रित हुए। इस क्रम को अजैविक संश्लेषण (Abiotic synthesis) कहते हैं।
सन् 1953 में स्टेनली मिलर और हेरॉल्ड उरे ने ओपेरिन-हाल्डेन परिकल्पना को प्रयोगशाला में परखा। उन्होंने मीथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन और जलवाष्प का मिश्रण बनाकर उसमें विद्युत तड़ित (स्पार्क) छोड़ा, जिससे अमीनो अम्ल जैसे कार्बनिक यौगिक प्राप्त हुए। इस प्रयोग ने अजैविक संश्लेषण की संभावना को सिद्ध किया।
जीन बैप्टिस्ट लैमार्क ने अर्जित लक्षणों के वंशागति (Inheritance of Acquired Characters) का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसके अनुसार: - जीव अपने पर्यावरण के अनुकूल बनने के लिए नए अंग विकसित करते हैं। - जो अंग अधिक उपयोग किए जाते हैं वे विकसित होते हैं, और जो उपयोग नहीं होते वे क्षय हो जाते हैं। - ये अर्जित लक्षण अगली पीढ़ी में स्थानांतरित हो जाते हैं।
उदाहरण के लिए, जिराफ की लंबी गर्दन की व्याख्या लैमार्क ने इस प्रकार की कि जिराफ अपनी गर्दन को लगातार खींचता रहा जिससे उसकी गर्दन लंबी हुई। परंतु इस सिद्धांत की आलोचना हुई क्योंकि अर्जित लक्षण सदैव वंशागत नहीं होते।
चार्ल्स डार्विन ने प्राकृतिक चयन (Natural Selection) का सिद्धांत प्रस्तुत किया। डार्विन ने HMS बीगल जहाज पर यात्रा करते हुए गैलापागोस द्वीप समूह का अध्ययन किया, जहाँ उन्होंने फिंच पक्षियों की विभिन्न प्रजातियाँ देखीं। डार्विन के सिद्धांत के मुख्य बिंदु: - अत्यधिक जनन (Overproduction): जीव अपनी क्षमता से अधिक संतति उत्पन्न करते हैं। - संघर्ष (Struggle for Existence): सीमित संसाधनों के लिए जीवों के बीच संघर्ष होता है। - जनसंख्या में विभिन्नता (Variation): एक प्रजाति के सदस्यों में आनुवंशिक भिन्नताएँ होती हैं। - योग्यतम की उत्तरजीविता (Survival of the Fittest): जो जीव पर्यावरण से सर्वाधिक अनुकूल होते हैं, वे जीवित रहते हैं। - प्राकृतिक चयन (Natural Selection): प्रकृति उन लक्षणों का चयन करती है जो जीवों को अनुकूल बनाते हैं।
डार्विन के अनुसार, इन्हीं प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप नई प्रजातियाँ (Speciation) बनती हैं। डार्विन का सिद्धांत विभिन्नताओं के स्रोत की स्पष्ट व्याख्या नहीं कर सका, परंतु आधुनिक आनुवंशिकी ने इसे पूर्ण किया।
आधुनिक विकासवादी जीवविज्ञान डार्विन के प्राकृतिक चयन को आनुवंशिकी के साथ जोड़ता है। इसे आधुनिक संश्लेषणवाद (Modern Synthetic Theory) या नव-डार्विनवाद (Neo-Darwinism) कहते हैं। इसके अनुसार विकास के निम्नलिखित स्रोत हैं: - आनुवंशिक विभिन्नता (उत्परिवर्तन और पुनर्योजन) - प्राकृतिक चयन - आनुवंशिक विस्थापन (Genetic Drift) - जीन प्रवाह (Gene Flow) - प्रजनन पृथक्करण (Reproductive Isolation)
विकास के प्रमुख साक्ष्य निम्नलिखित हैं: - जीवाश्म साक्ष्य (Fossil Evidence): जीवाश्म पृथ्वी की चट्टानों में संरक्षित पुराने जीवों के अवशेष हैं। जीवाश्मों के अध्ययन (Paleontology) से क्रमिक विकास का पता चलता है। उदाहरण: अर्चियोप्टेरिक्स (Archaeopteryx) सरीसृप और पक्षी के बीच का संक्रमणकालीन जीवाश्म है। - तुलनात्मक शारीरिकी (Comparative Anatomy): समरूप अंग (Homologous organs) और समवृत्ति अंग (Analogous organs) का अध्ययन। समरूप अंगों की उत्पत्ति एक ही संरचना से होती है परंतु कार्य भिन्न होते हैं, जैसे मेंढक का अग्रपाद, छिपकली का अग्रपाद, मनुष्य का हाथ और पक्षी का पंख। ये सामान्य पूर्वज का साक्ष्य देते हैं। समवृत्ति अंगों की उत्पत्ति भिन्न-भिन्न संरचनाओं से होती है परंतु कार्य समान होते हैं, जैसे कीट का पंख और पक्षी का पंख। - जैव रासायनिक साक्ष्य (Biochemical Evidence): सभी जीवों में समान जैव रसायन (जैसे DNA, RNA, प्रोटीन) पाए जाते हैं, जो सामान्य पूर्वज का प्रमाण देते हैं। - भ्रूणीय साक्ष्य (Embryological Evidence): विभिन्न कशेरुकी जीवों के भ्रूणों में समानता पाई जाती है। - अनुकूली विकिरण (Adaptive Radiation): एक ही पूर्वज से अलग-अलग वातावरण में अनेक प्रजातियों का विकास, जैसे डार्विन की फिंच चिड़ियाँ और ऑस्ट्रेलिया में मार्सुपियल स्तनधारी।
नई प्रजातियों के निर्माण की प्रक्रिया को प्रजाति निर्माण (Speciation) कहते हैं। यह तब होता है जब किसी जनसंख्या में आनुवंशिक विभिन्नता और प्रजनन पृथक्करण (Reproductive Isolation) उत्पन्न हो जाता है। प्रजाति निर्माण के कारक: आनुवंशिक विस्थापन, जीन प्रवाह में कमी, प्राकृतिक चयन और प्रजनन पृथक्करण। जब कोई जनसंख्या भौगोलिक रूप से पृथक हो जाती है (जैसे नदी, पहाड़), तो उसमें समय के साथ आनुवंशिक विभिन्नताएँ एकत्रित होकर नई प्रजाति का निर्माण करती हैं। डार्विन की फिंच चिड़ियाँ प्रजाति निर्माण का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
मानव का विकास लगभग 40-50 लाख वर्ष पहले अफ्रीका में हुआ। मानव के विकास में निम्नलिखित चरण शामिल हैं: - ड्राईओपिथेकस (Dryopithecus): लगभग 15 मिलियन वर्ष पहले, वानर जैसा प्राणी, जो मानव और वानर के सामान्य पूर्वज माने जाते हैं। - रामापिथेकस (Ramapithecus): लगभग 12-15 मिलियन वर्ष पहले, जो आधुनिक मानव की ओर एक महत्वपूर्ण कड़ी है। - ऑस्ट्रेलोपिथेकस (Australopithecus): लगभग 4 मिलियन वर्ष पहले, द्विपाद (bipedal) मानव पूर्वज, जो पत्थर के औजारों का उपयोग करते थे। - होमो हैबिलिस (Homo habilis): लगभग 2 मिलियन वर्ष पहले, जिन्हें 'सक्षम मानव' (Handy Man) कहा जाता है, पहली बार औजार बनाए। - होमो इरेक्टस (Homo erectus): लगभग 1.5 मिलियन वर्ष पहले, सीधे खड़े चलने वाला पूर्वज, जिन्होंने आग का उपयोग करना सीखा। - होमो सेपियन्स (Homo sapiens): आधुनिक मानव, जिसका विकास लगभग 100,000 वर्ष पहले अफ्रीका में हुआ।
मानव विकास का अध्ययन कंकाल संबंधी साक्ष्य, डीएनए विश्लेषण और माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए के अध्ययन से किया जाता है। अफ्रीका से मानव का प्रवास होकर पूरे विश्व में फैलाव हुआ।
| सिद्धांत | प्रतिपादक | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|
| अर्जित लक्षणों की वंशागति | लैमार्क | उपयोग/अनुपयोग का नियम |
| प्राकृतिक चयन | डार्विन | योग्यतम की उत्तरजीविता |
| आधुनिक संश्लेषणवाद | आनुवंशिकी + डार्विनवाद | विभिन्नता + चयन |
| प्रकार | उत्पत्ति | कार्य | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| समरूप अंग | समान (सामान्य पूर्वज) | भिन्न | मानव हाथ, पक्षी पंख |
| समवृत्ति अंग | भिन्न | समान | कीट पंख, पक्षी पंख |
| प्राणी | लगभग समय | विशेषता |
|---|---|---|
| ड्राईओपिथेकस | 15 मिलियन वर्ष | वानर जैसा |
| ऑस्ट्रेलोपिथेकस | 4 मिलियन वर्ष | द्विपाद |
| होमो हैबिलिस | 2 मिलियन वर्ष | औजार निर्माण |
| होमो इरेक्टस | 1.5 मिलियन वर्ष | आग का उपयोग |
| होमो सेपियन्स | 1 लाख वर्ष | आधुनिक मानव |
विकास जीवन की निरंतर बदलती प्रक्रिया है, जो अजैविक अणुओं से जीवन की उत्पत्ति से प्रारंभ होकर आधुनिक जीवों तक चलती है। डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत ने विकास की व्याख्या में क्रांतिकारी योगदान दिया, जिसे आधुनिक आनुवंशिकी ने आगे परिष्कृत किया। जीवाश्म, समरूप-समवृत्ति अंग और जैव रासायनिक समानताएँ विकास के ठोस साक्ष्य प्रदान करते हैं। प्रजाति निर्माण के माध्यम से जैव विविधता उत्पन्न होती है। मानव विकास का अध्ययन दर्शाता है कि आधुनिक मानव (होमो सेपियन्स) का विकास अफ्रीका में हुआ और वहाँ से पूरे विश्व में फैला। इस प्रकार विकास का अध्ययन जीवों की उत्पत्ति, विविधता और उनके संबंधों की समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।