जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) वह तकनीक है जो जीवित जीवों, जैविक प्रणालियों और उनके उत्पादों का उपयोग करके मानव कल्याण के लिए उत्पादों और प्रक्रियाओं को विकसित करती है। यूरोपीय महासंघ (European Federation of Biotechnology) के अनुसार, "जैव प्रौद्योगिकी रसायन विज्ञान, सूक्ष्म जीव विज्ञान, आनुवंशिकी और जैव रसायन जैसे विज्ञानों का एकीकृत उपयोग है, जिसका उद्देश्य उद्योग, पर्यावरण और स्वास्थ्य में जीवों के उपयोग से उत्पादों और सेवाओं का विकास करना है।"
जैव प्रौद्योगिकी के दो मूलभूत सिद्धांत हैं: 1. आनुवंशिक अभियांत्रिकी (Genetic Engineering): किसी जीव के आनुवंशिक पदार्थ (DNA) में वांछित जीन का स्थानांतरण या संशोधन। 2. जैव रासायनिक अभियांत्रिकी (Biochemical Engineering): सूक्ष्म जीवों, पौधों और कोशिकाओं की क्रियाओं द्वारा वांछित उत्पादों का निर्माण।
पुनः संयोजक DNA तकनीक वह तकनीक है जिसके द्वारा विभिन्न जीवों के DNA खंडों को मिलाकर पुनः संयोजक DNA (rDNA) बनाया जाता है। यह तकनीक निम्नलिखित उपकरणों और एंजाइमों पर आधारित है:
प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज़ (Restriction Endonucleases) वे एंजाइम हैं जो DNA की निश्चित विशिष्ट स्थितियों (recognitions sequences) पर काटते हैं। ये मुख्य रूप से जीवाणुओं से प्राप्त होते हैं। पहला प्रतिबंधन एंजाइम हिंड II (Hind II) था। सबसे अधिक प्रयुक्त प्रतिबंधन एंजाइम ईकोRI (EcoRI) है, जो GAA TTC अनुक्रम को पहचानता है और G और A के बीच काटता है।
प्रतिबंधन एंजाइम DNA को काटकर चिपचिपे सिरे (Sticky ends) या समतल सिरे (Blunt ends) बना सकते हैं। ईकोRI DNA को इस प्रकार काटता है कि चिपचिपे सिरे बनते हैं, जिनमें छोटी असमान श्रृंखला लटकती है। चिपचिपे सिरे वांछित जीन (foreign DNA) को वेक्टर (Vector) से जोड़ने में सहायक होते हैं।
वेक्टर वह DNA अणु है जो वांछित जीन को एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक पहुँचाता है। प्रमुख वेक्टर हैं: - प्लास्मिड (Plasmids): जीवाणुओं में पाए जाने वाले छोटे वृत्ताकार DNA अणु, जो गुणसूत्र से स्वतंत्र रूप से प्रतिकृति करते हैं। जैसे pBR322, pUC19। - बैक्टीरियोफेज (Bacteriophages): जीवाणुओं को संक्रमित करने वाले वायरस। - कॉस्मिड (Cosmids), यीस्ट आर्टिफिशियल क्रोमोसोम (YAC) और बैक्टीरियल आर्टिफिशियल क्रोमोसोम (BAC)।
एक अच्छे वेक्टर में निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं: - मूल बिंदु (Origin of replication - ori): जिससे DNA की प्रतिकृति होती है। - चयनात्मक मार्कर (Selectable marker): जैसे एम्पीसिलिन प्रतिरोध जीन, जिससे रूपांतरित कोशिकाओं की पहचान होती है। - क्लोनिंग स्थल (Cloning sites): जहाँ वांछित जीन को जोड़ा जाता है।
DNA लाइगेज़ एंजाइम DNA के टुकड़ों को आपस में जोड़ता है। पुनः संयोजक DNA बनाने में यह एंजाइम वांछित जीन और वेक्टर के बीच फॉस्फोडाइस्टर बंध बनाता है।
वांछित जीन (Foreign DNA) को लक्ष्य कोशिका में पहुँचाने की प्रक्रिया को रूपांतरण (Transformation) कहते हैं। जीवाणु कोशिकाओं में DNA लेने की क्षमता को बढ़ाने के लिए कुछ रसायनों (जैसे कैल्शियम क्लोराइड) और तापमान शॉक (Heat shock) का उपयोग किया जाता है। इन कोशिकाओं को सक्षम कोशिकाएँ (Competent cells) कहते हैं। दूसरी विधि है माइक्रोइंजेक्शन (Microinjection) और जीन बंदूक (Gene gun/Biolistics), जिसमें DNA को सूक्ष्म कणों पर लेप करके लक्ष्य कोशिका में दागा जाता है।
पुनः संयोजक DNA तकनीक के मुख्य चरण: 1. वांछित जीन (DNA) का पृथक्करण: दाता जीव से वांछित DNA को अलग करना। 2. वांछित DNA और वेक्टर की कटाई: प्रतिबंधन एंजाइमों द्वारा दोनों को काटना। 3. पुनः संयोजक DNA का निर्माण: DNA लाइगेज़ द्वारा वांछित जीन को वेक्टर में जोड़ना। 4. मेजबान कोशिका में स्थानांतरण (Transformation): पुनः संयोजक DNA को मेजबान कोशिका (जैसे E. coli) में पहुँचाना। 5. चयन और स्क्रीनिंग: चयनात्मक मार्करों द्वारा वांछित जीन वाली कोशिकाओं की पहचान करना। 6. क्लोनिंग और अभिव्यक्ति: वांछित जीन के कई प्रतियाँ (क्लोन) बनाकर उत्पाद का निर्माण।
PCR तकनीक का उपयोग DNA के एक विशिष्ट खंड की असंख्य प्रतियाँ बनाने के लिए किया जाता है। इस तकनीक की खोज कैरी मुलिस (Kary Mullis) ने की। PCR में निम्नलिखित अवयव होते हैं: - DNA टेम्पलेट (वांछित DNA) - प्राइमर (Primers) - दो छोटे सिंथेटिक DNA खंड - डीऑक्सीराइबोन्यूक्लियोटाइड (dNTPs) - DNA पॉलीमरेज़ एंजाइम (तापस्थायी - Thermostable, जैसे टाक पॉलीमरेज़)
PCR के चरण: 1. विकृतीकरण (Denaturation): DNA को लगभग 95°C पर गर्म करके दो श्रृंखलाओं में अलग किया जाता है। 2. एनीलिंग (Annealing): प्राइमर को टेम्पलेट से जोड़ा जाता है (लगभग 55°C)। 3. विस्तारण (Extension): DNA पॉलीमरेज़ द्वारा नए न्यूक्लियोटाइड जोड़कर नई श्रृंखला बनाई जाती है (लगभग 72°C)।
प्रत्येक चक्र में DNA की संख्या दोगुनी हो जाती है। PCR का उपयोग फोरेंसिक विज्ञान, आनुवंशिक रोग निदान, DNA फिंगरप्रिंटिंग और आनुवंशिक अध्ययन में होता है।
जेल इलेक्ट्रोफोरेसिस एक ऐसी तकनीक है जिसके द्वारा DNA के टुकड़ों को उनके आकार के आधार पर अलग किया जाता है। DNA में ऋणात्मक आवेश होता है, इसलिए विद्युत क्षेत्र में यह धनात्मक ध्रुव (एनोड) की ओर गति करता है। छोटे DNA टुकड़े तेज़ी से चलते हैं, जबकि बड़े टुकड़े धीमे चलते हैं। अगारोज़ (Agarose) जेल में DNA के टुकड़े अलग-अलग दूरी पर बैंड बनाते हैं। एथिडियम ब्रोमाइड (Ethidium bromide) से रंगने पर ये बैंड UV प्रकाश में दिखाई देते हैं। इसके बाद DNA के टुकड़ों को जेल से अलग किया जाता है (Elution)।
जैव प्रौद्योगिकी की प्रक्रियाओं में विभिन्न एंजाइमों का उपयोग होता है: - प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज़: DNA को विशिष्ट स्थल पर काटने के लिए। - DNA लाइगेज़: DNA खंडों को जोड़ने के लिए। - रिवर्स ट्रांस्क्रिप्टेज़ (Reverse Transcriptase): RNA से DNA बनाने के लिए (cDNA संश्लेषण)। यह रेट्रोवायरस (जैसे HIV) में पाया जाता है। - टाक पॉलीमरेज़ (Taq polymerase): PCR में उपयोग, जो उच्च तापमान पर सक्रिय रहता है। - टर्मिनल ट्रांसफरेज़ (Terminal transferase): DNA के सिरों पर न्यूक्लियोटाइड जोड़ने के लिए।
| चरण | प्रक्रिया |
|---|---|
| पृथक्करण | वांछित DNA को अलग करना |
| कटाई | प्रतिबंधन एंजाइम से काटना |
| संयोजन | DNA लाइगेज़ से जोड़ना |
| स्थानांतरण | मेजबान कोशिका में डालना |
| चयन | मार्कर द्वारा पहचान |
| चरण | तापमान | घटना |
|---|---|---|
| विकृतीकरण | ~95°C | DNA श्रृंखलाएँ अलग |
| एनीलिंग | ~55°C | प्राइमर जुड़ते हैं |
| विस्तारण | ~72°C | नई श्रृंखला बनती है |
| उपकरण | कार्य |
|---|---|
| प्रतिबंधन एंजाइम | DNA काटना |
| DNA लाइगेज़ | DNA जोड़ना |
| रिवर्स ट्रांस्क्रिप्टेज़ | RNA से DNA |
| टाक पॉलीमरेज़ | PCR में DNA संश्लेषण |
जैव प्रौद्योगिकी आनुवंशिक अभियांत्रिकी और जैव रासायनिक अभियांत्रिकी के सिद्धांतों पर आधारित है। पुनः संयोजक DNA तकनीक में प्रतिबंधन एंजाइम, DNA लाइगेज़, वेक्टर (प्लास्मिड) और मेजबान कोशिकाओं का उपयोग किया जाता है। PCR तकनीक DNA की असंख्य प्रतियाँ बनाकर आनुवंशिक अध्ययन और फोरेंसिक विज्ञान में क्रांति लाई है। जेल इलेक्ट्रोफोरेसिस DNA टुकड़ों को उनके आकार के आधार पर अलग करता है। इन तकनीकों का उपयोग ट्रांसजेनिक जीवों के निर्माण, रोग निदान, DNA फिंगरप्रिंटिंग और औद्योगिक उत्पादन में होता है। जैव प्रौद्योगिकी के सिद्धांतों और प्रक्रमों की यह समझ आधुनिक जीव विज्ञान की प्रगति का आधार है।