पारिस्थितिकी (Ecology) जीवों और उनके पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्ययन है। पर्यावरण का अध्ययन करने के लिए इसे अलग-अलग स्तरों पर किया जाता है: जीव (Organism), समष्टि (Population), समुदाय (Community), पारितंत्र (Ecosystem) और जीवमंडल (Biosphere)। इस अध्याय में हम जीव और समष्टि स्तर पर पारिस्थितिकी का अध्ययन करेंगे। जीव अपने पर्यावरण के साथ विभिन्न तरीकों से संबंध बनाता है, जिनमें अनुकूलन, जलवायु, मृदा और जैविक कारक शामिल हैं। समष्टि स्तर पर हम जनसंख्या वृद्धि, घनत्व, आयु वितरण, जन्म दर, मृत्यु दर और जनसंख्या वृद्धि के मॉडलों का अध्ययन करेंगे।
जीवों का पर्यावरण अनेक कारकों से बना होता है, जिन्हें पर्यावरणीय कारक या पारिस्थितिकीय कारक कहते हैं। ये कारक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं:
तापमान सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिकीय कारक है, जो जीवों के वितरण, विकास और चयापचय को प्रभावित करता है। तापमान के आधार पर जीवों को वर्गीकृत किया जाता है: - एकतापी (Stenothermal): वे जीव जो कम तापमान सीमा में ही रह सकते हैं। - बहुतापी (Eurythermal): वे जीव जो विस्तृत तापमान सीमा में रह सकते हैं।
जल जीवन के लिए अनिवार्य है। जल की उपलब्धता के आधार पर पौधों को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जाता है: - जलजीवी (Hydrophytes): जल में रहने वाले पौधे। - शुष्कभूमी (Xerophytes): शुष्क क्षेत्रों में रहने वाले पौधे (जैसे कैक्टस)। - मध्यमभूमी (Mesophytes): मध्यम नमी वाले क्षेत्रों में रहने वाले पौधे।
प्रकाश सूर्य से प्राप्त होता है और प्रकाश संश्लेषण, विकास, प्रजनन और पशु व्यवहार को प्रभावित करता है। पादपों में प्रकाश की आवश्यकता के अनुसार छाया-प्रिय और प्रकाश-प्रिय पौधे होते हैं। पशुओं में दिनचर्या (और रात्रिचर) व्यवहार प्रकाश पर निर्भर होता है।
मृदा पौधों को खनिज, पोषक तत्व और पानी प्रदान करती है। मृदा के भौतिक गुण (बनावट, संरचना) और रासायनिक गुण (pH, लवणता) पौधों के वितरण को प्रभावित करते हैं। मृदा में कार्बनिक पदार्थ (Humus) की मात्रा उर्वरता निर्धारित करती है।
जीवों में अपने पर्यावरण के अनुकूल ढलने की क्षमता को अनुकूलन (Adaptation) कहते हैं। अनुकूलन शारीरिक, व्यवहारिक या क्रियात्मक हो सकते हैं: - शारीरिक अनुकूलन (Structural adaptations): शरीर की संरचना में परिवर्तन, जैसे कैक्टस में पत्तियों का काँटों में बदल जाना। - क्रियात्मक अनुकूलन (Physiological adaptations): चयापचय संबंधी परिवर्तन, जैसे हाइबरनेशन (शीतनिद्रा) और एस्टीवेशन (ग्रीष्म निद्रा)। - व्यवहारिक अनुकूलन (Behavioural adaptations): व्यवहार में परिवर्तन, जैसे प्रवास (Migration)।
रेगिस्तानी जानवरों (जैसे ऊँट) और पौधों में जल-संरक्षण के अनुकूलन पाए जाते हैं। ऊँट अपने शरीर में बहुत कम पानी का उपयोग करता है। कैक्टस जैसे शुष्कभूमी पौधों में वाष्पोत्सर्जन बहुत कम होता है।
शुष्क क्षेत्रों के पौधे (जैसे अनानास) में CAM (Crassulacean Acid Metabolism) प्रकाश संश्लेषण होता है, जिसमें रात में CO2 का अवशोषण होता है और दिन में प्रकाश संश्लेषण होता है, जिससे जल की हानि घटती है।
किसी निश्चित समय और स्थान पर एक ही प्रजाति के जीवों का समूह समष्टि (Population) कहलाता है। समष्टि की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं: - आकार (Size) और घनत्व (Density): प्रति इकाई क्षेत्रफल या आयतन में जीवों की संख्या। - जन्म दर (Natality): समष्टि में नए जीवों के जन्म की दर। - मृत्यु दर (Mortality): समष्टि में मृत्यु की दर। - उत्प्रवासन (Emigration): जीवों का बाहर जाना। - अप्रवासन (Immigration): जीवों का भीतर आना। - आयु वितरण (Age distribution): समष्टि में विभिन्न आयु समूहों के जीवों का वितरण। - वृद्धि दर (Growth rate): समष्टि की जनसंख्या में वृद्धि की दर।
समष्टि के घनत्व को निम्नलिखित सूत्र द्वारा दर्शाया जाता है: $$N_{t+1} = N_t + B - D + I - E$$
यहाँ N = जनसंख्या, B = जन्म, D = मृत्यु, I = अप्रवासन, E = उत्प्रवासन।
जनसंख्या वृद्धि के दो मुख्य मॉडल हैं:
जब संसाधन असीमित होते हैं, तो जनसंख्या घातीय रूप से बढ़ती है। इसे वर्नाहुस्ट-पियरल लॉजिस्टिक मॉडल का एक हिस्सा माना जाता है। घातीय वृद्धि का समीकरण: $$\frac{dN}{dt} = rN$$
यहाँ r = आंतरिक वृद्धि दर (Intrinsic rate of natural increase), N = जनसंख्या आकार। घातीय वृद्धि में जनसंख्या का ग्राफ J-आकार का होता है।
प्राकृतिक परिस्थितियों में संसाधन सीमित होते हैं, इसलिए जनसंख्या एक निश्चित सीमा से अधिक नहीं बढ़ पाती। इस अधिकतम सीमा को पर्यावरणीय धारण क्षमता (Carrying capacity - K) कहते हैं। लॉजिस्टिक वृद्धि का समीकरण: $$\frac{dN}{dt} = rN\left(\frac{K-N}{K}\right)$$
लॉजिस्टिक वृद्धि में जनसंख्या का ग्राफ S-आकार (Sigmoid) का होता है। यह वृद्धि प्रारंभ में धीमी, फिर तेज़ और अंत में स्थिर होती है।
विभिन्न प्रजातियों के जीवों के बीच होने वाले संबंधों को अंतरविशिष्ट अंतर्क्रियाएँ कहते हैं। ये अंतर्क्रियाएँ चार प्रकार के होते हैं (+, -, 0 द्वारा दर्शाए गए):
| अंतर्क्रिया | प्रजाति A | प्रजाति B | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| परभक्षण (Predation) | + | - | शेर और हिरण |
| प्रतिस्पर्धा (Competition) | - | - | दो पादप प्रजातियाँ |
| परजीविता (Parasitism) | + | - | मलेरिया परजीवी और मानव |
| सहभोजिता (Commensalism) | + | 0 | एपिफाइट पौधे |
| सहजीवन (Mutualism) | + | + | लाइकेन |
परभक्षण में एक जीव (परभक्षी) दूसरे जीव (शिकार) को खाता है। परभक्षण जनसंख्या नियंत्रण का महत्वपूर्ण तरीका है। उदाहरण: शेर-हिरण, तितली-कैटरपिलर। परभक्षण से शिकार प्रजाति की जनसंख्या अनियंत्रित नहीं हो पाती।
प्रतिस्पर्धा तब होती है जब दो प्रजातियाँ एक ही संसाधन (भोजन, स्थान, प्रकाश) के लिए होड़ करती हैं। गौज़ और फ्लोरिडा के कछुओं के अध्ययन (G.F. Gause) से प्रतिस्पर्धी बहिष्कार नियम (Competitive Exclusion Principle) प्रतिपादित हुआ, जिसके अनुसार दो प्रजातियाँ एक ही सीमित संसाधन के लिए प्रतिस्पर्धा करते हुए एक ही स्थान पर लंबे समय तक नहीं रह सकतीं।
परजीविता में एक जीव (परजीवी) दूसरे जीव (पोषक/होस्ट) पर या उसके भीतर रहकर पोषण लेता है, जिससे पोषक को हानि होती है। परजीवी आमतौर पर पोषक से छोटे होते हैं। उदाहरण: मलेरिया परजीवी (प्लाज़्मोडियम) मानव में, कस्कुटा (अमरबेल) परजीवी पौधा, ताज़े जल की मछली पर लर्निया (जलीय कृमि)। कुछ परजीवी ब्रोड पैरासिटिज़्म करते हैं, जैसे कोयल अपने अंडे अन्य पक्षियों के घोंसले में रखती है।
सहभोजिता में एक जीव को लाभ होता है और दूसरे को न लाभ न हानि। उदाहरण: एपिफाइट पौधे (जैसे ऑर्किड) बड़े वृक्षों पर उगते हैं, जहाँ से उन्हें केवल स्थान मिलता है, वृक्ष को कोई हानि नहीं। गुल्मिल्ला मछली और शार्क का संबंध भी सहभोजिता है।
सहजीवन में दोनों जीवों को लाभ होता है। उदाहरण: लाइकेन (कवक और शैवाल), कवक और पौधों की जड़ों का माइकोराइज़ा संबंध, मधुमक्खियों और फूलों का संबंध।
| कारक | प्रकार | उदाहरण |
|---|---|---|
| तापमान | अजैविक | ऋतुएँ |
| जल | अजैविक | वर्षा |
| मृदा | अजैविक | खनिज |
| अन्य जीव | जैविक | परभक्षण, प्रतिस्पर्धा |
| मॉडल | समीकरण | ग्राफ |
|---|---|---|
| घातीय वृद्धि | dN/dt = rN | J-आकार |
| लॉजिस्टिक वृद्धि | dN/dt = rN((K-N)/K) | S-आकार |
| अंतर्क्रिया | चिह्न | उदाहरण |
|---|---|---|
| परभक्षण | +, - | शेर-हिरण |
| प्रतिस्पर्धा | -, - | दो प्रजातियाँ |
| परजीविता | +, - | प्लाज़्मोडियम-मानव |
| सहभोजिता | +, 0 | एपिफाइट-वृक्ष |
| सहजीवन | +, + | लाइकेन |
पारिस्थितिकी के अध्ययन में जीव और समष्टि दो महत्वपूर्ण स्तर हैं। जीव अपने अजैविक और जैविक पर्यावरण से प्रभावित होता है, और अनुकूलन द्वारा प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रहता है। समष्टि स्तर पर जनसंख्या के आकार, घनत्व, जन्म दर, मृत्यु दर और वृद्धि के मॉडलों का अध्ययन होता है। जनसंख्या वृद्धि प्राकृतिक रूप से लॉजिस्टिक (S-आकार) होती है, जो धारण क्षमता द्वारा सीमित होती है। विभिन्न प्रजातियों के बीच परभक्षण, प्रतिस्पर्धा, परजीविता, सहभोजिता और सहजीवन जैसी अंतर्क्रियाएँ पारितंत्र को संतुलित रखती हैं। इस अध्याय का अध्ययन हमें प्रकृति में जीवों के संबंधों और पारिस्थितिक संतुलन की समझ प्रदान करता है।