पारितंत्र (Ecosystem) एक निश्चित क्षेत्र के जैविक (जीवित) और अजैविक (निर्जीव) घटकों की वह इकाई है जिसमें ऊर्जा का प्रवाह और पदार्थों का चक्रण होता है। पारितंत्र शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम ए.जी. टेन्सले (A.G. Tansley) ने किया। पारितंत्र के दो मुख्य घटक होते हैं: जैविक घटक (Biotic components) और अजैविक घटक (Abiotic components)। पारितंत्र के कार्य ऊर्जा प्रवाह, पोषक चक्र (Nutrient cycling) और पारिस्थितिकीय अनुक्रमण (Ecological succession) द्वारा संचालित होते हैं। इस अध्याय में हम पारितंत्र की संरचना, ऊर्जा प्रवाह, खाद्य शृंखला, खाद्य जाल, पारिस्थितिकीय पिरामिड, पोषक चक्र और अनुक्रमण का अध्ययन करेंगे।
पारितंत्र के दो मुख्य घटक हैं:
इनमें भौतिक और रासायनिक कारक शामिल हैं: - भौतिक कारक: प्रकाश, तापमान, आर्द्रता, वर्षा, वायु। - रासायनिक कारक: कार्बन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, फॉस्फोरस, मृदा की pH और खनिज लवण।
इन्हें निम्नलिखित तीन समूहों में बाँटा जाता है: - उत्पादक (Producers): स्वपोषी जीव जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा स्वयं का भोजन बनाते हैं, जैसे हरे पौधे, शैवाल, सायनोबैक्टीरिया। - उपभोक्ता (Consumers): विषमपोषी जीव जो उत्पादकों या अन्य उपभोक्ताओं का भोजन करते हैं। इनमें प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी), द्वितीयक उपभोक्ता (मांसाहारी) और तृतीयक उपभोक्ता (शीर्ष मांसाहारी) शामिल हैं। - अपघटक (Decomposers): जीव जो मृत जीवों और कार्बनिक पदार्थों को विघटित करते हैं, जैसे जीवाणु, कवक, केंचुआ। अपघटक पारितंत्र में पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करते हैं।
पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय (unidirectional) होता है, जो सूर्य से प्रारंभ होकर उत्पादकों से उपभोक्ताओं तक जाता है। ऊर्जा का प्रवाह ट्राफिक स्तरों (Trophic levels) के माध्यम से होता है। ट्राफिक स्तर खाद्य शृंखला में प्रत्येक पोषण स्तर होता है, जैसे प्रथम ट्राफिक स्तर = उत्पादक, द्वितीय = प्राथमिक उपभोक्ता आदि।
पारिस्थितिकीविद लिंडेमैन (Lindeman) के 10% नियम के अनुसार, ऊर्जा का केवल लगभग 10% ही एक ट्राफिक स्तर से अगले ट्राफिक स्तर तक स्थानांतरित होता है, शेष लगभग 90% ऊर्जा चयापचय, श्वसन और अपशिष्ट के रूप में नष्ट हो जाती है।
खाद्य शृंखला में जीवों का वह क्रम होता है जिसमें प्रत्येक जीव अपने पूर्ववर्ती जीव को खाता है। उदाहरण: - स्थलीय खाद्य शृंखला: घास → चूहा → साँप → बाज - जलीय खाद्य शृंखला: फाइटोप्लांकटन → ज़ूप्लांकटन → छोटी मछली → बड़ी मछली
खाद्य शृंखला दो प्रकार की होती है: - चराई खाद्य शृंखला (Grazing food chain): जो हरे पौधों से प्रारंभ होती है। - अपघटन खाद्य शृंखला (Detritus food chain): जो मृत कार्बनिक पदार्थ से प्रारंभ होती है।
पारितंत्र में अनेक खाद्य शृंखलाएँ आपस में जुड़ी होती हैं, जो खाद्य जाल (Food web) बनाती हैं। खाद्य जाल में एक जीव अनेक ट्राफिक स्तरों पर भोजन कर सकता है, जिससे पारितंत्र अधिक स्थिर रहता है।
पारिस्थितिकीय पिरामिड ट्राफिक स्तरों के आधार पर बनाए जाते हैं। इनके तीन प्रकार हैं: - संख्या का पिरामिड (Pyramid of Numbers): प्रत्येक ट्राफिक स्तर में जीवों की संख्या को दर्शाता है। घास पारितंत्र में यह ऊर्ध्वाधर (upright) होता है, जबकि पेड़ों पर कीटों के पारितंत्र में उल्टा (inverted) होता है। - जैव द्रव्यमान का पिरामिड (Pyramid of Biomass): प्रत्येक ट्राफिक स्तर के कुल जैव द्रव्यमान को दर्शाता है। स्थलीय पारितंत्र में ऊर्ध्वाधर, जबकि समुद्री पारितंत्र में उल्टा होता है। - ऊर्जा का पिरामिड (Pyramid of Energy): ऊर्जा की मात्रा को दर्शाता है। यह सदैव ऊर्ध्वाधर (upright) होता है, क्योंकि ऊर्जा प्रत्येक ट्राफिक स्तर पर घटती जाती है।
पारितंत्र में पोषक तत्व जैविक और अजैविक घटकों के बीच चक्रित होते हैं। इन्हें जैव-भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical cycles) कहते हैं। दो प्रमुख चक्र हैं: - गैसीय चक्र (Gaseous cycles): कार्बन चक्र, नाइट्रोजन चक्र, जल चक्र, ऑक्सीजन चक्र। इनमें पोषक तत्व वायुमंडल में विद्यमान होते हैं। - अवसादी चक्र (Sedimentary cycles): फॉस्फोरस चक्र, सल्फर चक्र। इनमें पोषक तत्व मृदा और चट्टानों में विद्यमान होते हैं।
कार्बन पारितंत्र में CO2 के रूप में वायुमंडल में उपस्थित होता है। पौधे प्रकाश संश्लेषण में CO2 ग्रहण करते हैं। जीवों के श्वसन और अपघटन से CO2 वायुमंडल में वापस आती है। जीवाश्म ईंधनों (कोयला, पेट्रोलियम) का दहन भी CO2 छोड़ता है।
वायुमंडल में नाइट्रोजन (N2) का लगभग 78% उपस्थित होता है। नाइट्रोजन चक्र के चरण: - नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen fixation): राइज़ोबियम, एज़ोटोबैक्टर, सायनोबैक्टीरिया वायुमंडलीय N2 को अमोनिया में बदलते हैं। - नाइट्रीकरण (Nitrification): नाइट्रोसोमोनास अमोनिया को नाइट्राइट में और नाइट्रोबैक्टर नाइट्राइट को नाइट्रेट में बदलते हैं। - अमोनीकरण (Ammonification): मृत जीवों और अपशिष्ट से अमोनिया का निर्माण। - विनाइट्रीकरण (Denitrification): विनाइट्रीफाइंग जीवाणु (जैसे स्यूडोमोनास) नाइट्रेट को वायुमंडलीय नाइट्रोजन में बदलते हैं।
किसी क्षेत्र में जैव समुदायों का क्रमिक परिवर्तन पारिस्थितिकीय अनुक्रमण (Ecological Succession) कहलाता है। अनुक्रमण के दो प्रकार हैं: - प्राथमिक अनुक्रमण (Primary succession): उन क्षेत्रों में होता है जहाँ पहले कोई जीवन नहीं था, जैसे नई बनी चट्टानों, लावा प्रवाह, रेत के टीलों पर। इसका पहला जीव है क्रस्टोज़ लाइकेन। इसमें बहुत लंबा समय लगता है। - द्वितीयक अनुक्रमण (Secondary succession): उन क्षेत्रों में होता है जहाँ पहले से समुदाय मौजूद था परंतु अग्नि, बाढ़ आदि से नष्ट हो गया। इसमें कम समय लगता है।
अनुक्रमण का अंतिम स्थिर चरण क्लाइमेक्स समुदाय (Climax community) कहलाता है। स्थलीय अनुक्रमण में क्रम: चट्टान → लाइकेन → मॉस → घास → झाड़ी → वृक्ष। जल में अनुक्रमण: प्लांकटन → मुक्त तैरते पौधे → जड़ वाले जलमग्न पौधे → नमी-प्रिय वृक्ष → वन।
| पिरामिड | प्रकार | स्थिति |
|---|---|---|
| संख्या का | घास में ऊर्ध्वाधर, पेड़-कीट में उल्टा | परिवर्तनशील |
| जैव द्रव्यमान का | स्थलीय ऊर्ध्वाधर, समुद्री उल्टा | परिवर्तनशील |
| ऊर्जा का | सदैव ऊर्ध्वाधर | सदैव |
| चक्र | प्रकार | उदाहरण |
|---|---|---|
| गैसीय | वायुमंडल में | कार्बन, नाइट्रोजन |
| अवसादी | मृदा/चट्टानों में | फॉस्फोरस, सल्फर |
| चरण | प्रक्रिया |
|---|---|
| नाइट्रोजन स्थिरीकरण | N2 → अमोनिया |
| नाइट्रीकरण | अमोनिया → नाइट्राइट → नाइट्रेट |
| अमोनीकरण | कार्बनिक → अमोनिया |
| विनाइट्रीकरण | नाइट्रेट → N2 |
पारितंत्र जैविक और अजैविक घटकों का वह तंत्र है जिसमें ऊर्जा और पदार्थों का प्रवाह संतुलित रहता है। ऊर्जा का प्रवाह सूर्य से उत्पादकों और उपभोक्ताओं तक एकदिशीय रूप से होता है, जिसमें प्रत्येक ट्राफिक स्तर पर लगभग 10% ऊर्जा ही आगे जाती है। खाद्य शृंखलाएँ और खाद्य जाल जीवों के पोषण संबंधों को दर्शाते हैं। पारिस्थितिकीय पिरामिड ऊर्जा, जैव द्रव्यमान और संख्या के वितरण को व्यक्त करते हैं। पोषक चक्र (कार्बन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस) पदार्थों का पुनर्चक्रण करते हैं। पारिस्थितिकीय अनुक्रमण से क्षेत्रों में समुदायों का क्रमिक विकास होता है। इस प्रकार, पारितंत्र का अध्ययन हमें प्रकृति के संतुलन और स्थिरता को समझने में सहायता करता है।