पर्यावरण (Environment) हमारे चारों ओर फैला वह तंत्र है जिसमें जैविक और अजैविक घटक सम्मिलित होते हैं। मानवीय गतिविधियों के कारण पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, जिससे प्रदूषण (Pollution), जलवायु परिवर्तन, ओजोन परत का क्षरण, जल का प्रदूषण, ठोस अपशिष्ट और रेडियोधर्मी कचरे जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। ये सभी पर्यावरणीय मुद्दे (Environmental Issues) हैं, जिनका समाधान आवश्यक है। इस अध्याय में हम वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ओजोन क्षरण, जलवायु परिवर्तन (ग्रीनहाउस प्रभाव), ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, रेडियोधर्मी अपशिष्ट और इनके नियंत्रण के उपायों का अध्ययन करेंगे।
वायु में हानिकारक गैसों और कणिकाओं के मिल जाने से वायु प्रदूषण होता है। वायु प्रदूषकों के मुख्य स्रोत: औद्योगिक इकाइयाँ, वाहन, जीवाश्म ईंधनों का दहन। प्रमुख वायु प्रदूषक: कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), कणिका पदार्थ (Particulate matter - PM 2.5, PM 10)।
वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जाते हैं: - विद्युत अवक्षेपक (Electrostatic Precipitator): ताप विद्युत संयंत्रों में उपयोग होने वाला उपकरण जो धुएँ में मौजूद 99% कणिका पदार्थ को हटा देता है। - फैब्रिक फिल्टर (Fabric Filters): धूल के कणों को रोकने के लिए। - स्क्रबर (Scrubbers): गैसीय प्रदूषकों (जैसे SO2) को हटाने के लिए। इसमें चूने या क्षारीय विलयन से गैस का उपचार होता है। - साइक्लोन सेपरेटर (Cyclone Separator): बड़े कणों को अलग करता है। - ऑटोमोबाइल के लिए कैटेलिटिक कनवर्टर (Catalytic Converter): वाहनों से निकलने वाले NOx, CO और हाइड्रोकार्बन को कम करता है। - अनलेडेड पेट्रोल (Unleaded petrol): सीसा (Lead) मुक्त पेट्रोल का उपयोग।
ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect) पृथ्वी के वायुमंडल में स्थित कुछ गैसों के कारण होता है, जो सूर्य से आने वाले प्रकाश को ग्रहण कर पृथ्वी के तापमान को बढ़ाते हैं। ये गैसें ग्रीनहाउस गैसें (Greenhouse gases) कहलाती हैं, जैसे कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मीथेन (CH4), नाइट्रस ऑक्साइड (N2O), जलवाष्प (H2O) और CFC। ग्रीनहाउस गैसों में सबसे प्रमुख CO2 है, जो जीवाश्म ईंधनों के दहन से बढ़ती है।
ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती सांद्रता के कारण पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है, जिसे ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) कहते हैं। इसके परिणामस्वरूप: - ध्रुवीय बर्फ पिघल रही है, जिससे समुद्री जलस्तर बढ़ रहा है। - तटीय क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है। - मौसम के पैटर्न में परिवर्तन हो रहा है। - प्रजातियों के आवास स्थानांतरित हो रहे हैं।
ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए सन् 1997 में जापान के क्योटो में एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता हुआ, जिसे क्योटो प्रोटोकॉल (Kyoto Protocol) कहते हैं। इसका उद्देश्य औद्योगिक देशों में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना है। सन् 2016 में पेरिस समझौता (Paris Agreement) भी हुआ।
ओजोन (Ozone - O3) पृथ्वी के वायुमंडल के स्ट्रैटोस्फीयर में पाई जाने वाली गैस है, जो सूर्य के हानिकारक पराबैंगनी (UV) विकिरण से हमारी रक्षा करती है। परंतु CFC (क्लोरोफ्लोरोकार्बन) जैसे पदार्थ ओजोन परत को नष्ट कर रहे हैं। CFC का उपयोग रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर और फोम बनाने में होता है।
ओजोन क्षरण से UV-B विकिरण पृथ्वी तक पहुँचता है, जो त्वचा कैंसर, आँखों की बीमारियाँ (मोतियाबिंद) और प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर कर सकता है। अंटार्कटिका के ऊपर पाए जाने वाले ओजोन छिद्र (Ozone hole) की खोज सन् 1985 में हुई। ओजोन क्षरण को रोकने के लिए सन् 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol) पर हस्ताक्षर किए गए, जिसके अंतर्गत CFC जैसे ओजोन-क्षयकारी पदार्थों पर प्रतिबंध लगाया गया।
जल में हानिकारक पदार्थों के मिलने से जल प्रदूषण होता है। जल प्रदूषण के मुख्य स्रोत: औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि में उर्वरक-कीटनाशक, घरेलू सीवेज। जल प्रदूषण से जलीय जीवन प्रभावित होता है और मानव में रोग फैलते हैं।
जब जल निकायों में पोषक तत्वों (फॉस्फोरस, नाइट्रोजन) की अधिकता हो जाती है, तो शैवालों का अनियंत्रित विकास (Algal bloom) होता है। इससे ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, जिसे यूट्रोफिकेशन (Eutrophication) कहते हैं। यह जलीय जीवों की मृत्यु का कारण बनता है। कुछ शैवाल (जैसे नील-हरे शैवाल) विषैले विष (Toxins) स्रावित करते हैं।
ठोस अपशिष्ट (Solid Waste) में घरेलू कचरा, औद्योगिक कचरा, प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक कचरा शामिल हैं। ठोस अपशिष्ट के नियंत्रण के उपाय: - पुनर्चक्रण (Recycling): कागज, काँच, धातु, प्लास्टिक का पुनः उपयोग। - कंपोस्टिंग (Composting): जैविक कचरे से खाद बनाना। - भस्मीकरण (Incineration): कचरे को जलाकर नष्ट करना। - लैंडफिल (Landfill): कचरे को विशेष स्थानों पर दबाना।
इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों (मोबाइल, कंप्यूटर) के कचरे को इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट (E-waste) कहते हैं। इनमें सीसा, पारा, कैडमियम जैसे विषैले धातु होते हैं, जिन्हें सावधानीपूर्वक नष्ट करना आवश्यक है। E-waste का पुनर्चक्रण और सुरक्षित निपटान आवश्यक है।
परमाणु ऊर्जा संयंत्रों और चिकित्सा उपयोगों से रेडियोधर्मी अपशिष्ट उत्पन्न होता है। रेडियोधर्मी पदार्थ अत्यंत हानिकारक होते हैं, क्योंकि इनमें उत्सर्जित विकिरण कोशिकाओं को नष्ट करके कैंसर और आनुवंशिक उत्परिवर्तन उत्पन्न कर सकता है। रेडियोधर्मी अपशिष्ट को अत्यधिक सुरक्षित कंटेनरों में संग्रहीत करके गहरे भूमिगत स्थानों में दफनाया जाता है।
अवांछित ध्वनि से होने वाला प्रदूषण ध्वनि प्रदूषण कहलाता है। ध्वनि प्रदूषण के स्रोत: वाहन, उद्योग, संगीत कार्यक्रम, विमान। ध्वनि का मापन डेसीबल (Decibel - dB) में किया जाता है। अधिक ध्वनि प्रदूषण से सुनने की क्षमता में कमी, रक्तचाप में वृद्धि और तनाव हो सकता है।
| प्रदूषक | स्रोत |
|---|---|
| कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) | वाहन, अधूरा दहन |
| सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) | कोयला दहन |
| नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) | वाहन |
| कणिका पदार्थ (PM) | धुआँ, औद्योगिक इकाइयाँ |
| उपकरण | कार्य |
|---|---|
| विद्युत अवक्षेपक | कणिका पदार्थ हटाना |
| स्क्रबर | गैसीय प्रदूषक (SO2) हटाना |
| कैटेलिटिक कनवर्टर | वाहन गैसों को कम करना |
| समझौता | वर्ष | उद्देश्य |
|---|---|---|
| मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल | 1987 | CFC पर प्रतिबंध |
| क्योटो प्रोटोकॉल | 1997 | ग्रीनहाउस गैसों में कमी |
| पेरिस समझौता | 2016 | जलवायु परिवर्तन |
पर्यावरणीय मुद्दे मानव जीवन और पारितंत्र के अस्तित्व को प्रभावित करते हैं। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ओजोन क्षरण, ग्लोबल वार्मिंग, ठोस और रेडियोधर्मी अपशिष्ट जैसी समस्याओं का समाधान आवश्यक है। प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों, अंतर्राष्ट्रीय समझौतों (मॉन्ट्रियल, क्योटो, पेरिस) और जागरूकता के माध्यम से इन मुद्दों से निपटा जा सकता है। नवीकरणीय ऊर्जा, पुनर्चक्रण और सतत विकास के सिद्धांतों को अपनाकर हम पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं। इस प्रकार, पर्यावरणीय मुद्दों का अध्ययन हमें सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करता है।