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1. परिचय

उपसहसंयोजन यौगिक (Coordination Compounds) वे यौगिक होते हैं जिनमें केंद्रीय धातु परमाणु या आयन से एक निश्चित संख्या में लिगैंड (आयनों या अणुओं) के दानदाता परमाणु (donor atoms) उपसहसंयोजन आबंध द्वारा जुड़े होते हैं। इन्हें जटिल यौगिक (Complex Compounds) भी कहते हैं। उदाहरण: $K_4[Fe(CN)_6]$ (पोटैशियम हेक्सासायनाइडोफेरेट(II)), $[Co(NH_3)_6]Cl_3$, $[Ni(CO)_4]$। यह अध्याय उपसहसंयोजन यौगिकों की संरचना, नामकरण, वर्नर का सिद्धांत, संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT), क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT), समावयवता, चुंबकीय गुण तथा इनके अनुप्रयोगों का अध्ययन कराता है। रसायन, जीव विज्ञान (क्लोरोफिल, हीमोग्लोबिन, विटामिन B₁₂) और औद्योगिक क्षेत्रों में इनका महत्व अत्यधिक है।

2. मूल पद (Terminology)

3. लिगैंड के प्रकार (Types of Ligands)

दन्तुरता के आधार पर

  1. मोनोडेंटेट (Monodentate): एक दानदाता परमाणु। जैसे NH₃, H₂O, Cl⁻, CN⁻।
  2. डाइडेंटेट (Didentate): दो दानदाता परमाणु। जैसे एथिलीनडाइअमीन (en), ऑक्सैलेट (ox²⁻), ग्लाइसिनेट।
  3. पॉलीडेंटेट (Polydentate): कई दानदाता परमाणु। जैसे EDTA (हेक्साडेंटेट, छह दानदाता)।

आवेश के आधार पर

विशेष लिगैंड

महत्वपूर्ण लिगैंड सूची

लिगैंड नाम दन्तुरता
Cl⁻ क्लोरो मोनो
CN⁻ सायनाइडो मोनो
NH3 अम्मीनी मोनो
H2O एक्वा मोनो
CO कार्बोनिल मोनो
NO2⁻ नाइट्राइटो/नाइट्रो मोनो
en एथिलीनडाइअमीन डाइ
ox²⁻ ऑक्सैलेटो डाइ
EDTA⁴⁻ एथिलीनडाइअमीनटेट्राऐसीटेटो हेक्सा

4. उपसहसंयोजन यौगिकों का नामकरण (Nomenclature)

नामकरण के नियम

  1. धनायन का नाम पहले, फिर ऋणायन का।
  2. उपसहसंयोजन स्पीशीज़ में पहले लिगैंडों के नाम (वर्णानुक्रम में), फिर धातु का नाम।
  3. ऋणावेशित लिगैंड के नाम में अंत '-o' जुड़ता है (क्लोराइड → क्लोरो, साइनाइड → सायनाइडो, ऑक्साइड → ऑक्सो, हाइड्रॉक्साइड → हाइड्रॉक्सो)।
  4. उदासीन लिगैंड के नाम अपरिवर्तित रहते हैं (NH₃ → अम्मीनी, H₂O → एक्वा, CO → कार्बोनिल, NO → नाइट्रोसिल)।
  5. पॉलीडेंटेट लिगैंडों के नाम कोष्ठक में — bis, tris, tetrakis से।
  6. धातु का नाम — यदि स्पीशीज़ ऋणायन है तो धातु के नाम में '-एट' (ऐट) जोड़ते हैं (फेरेट, क्यूप्रेट, निकोलेट)।
  7. केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था रोमन संख्या में कोष्ठक में।

उदाहरण

5. वर्नर का सिद्धांत (Werner's Theory)

वर्नर ने दो प्रकार के संयोजकताएँ बताईं: 1. प्राथमिक संयोजकता (Primary Valency): आयनीकरण के लिए, जो आयनों द्वारा संतुष्ट होती है (ऑक्सीकरण अवस्था के बराबर)। 2. द्वितीयक संयोजकता (Secondary Valency): उपसहसंयोजन संख्या के बराबर, जो लिगैंड द्वारा संतुष्ट होती है।

इस सिद्धांत के अनुसार [Co(NH₃)₆]Cl₃ में प्राथमिक संयोजकता 3 और द्वितीयक 6 है। वर्नर को उपसहसंयोजन यौगिकों के सिद्धांत के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।

6. संयोजकता आबंध सिद्धांत (Valence Bond Theory)

पॉलिंग द्वारा प्रस्तुत VBT के अनुसार: 1. केंद्रीय धातु और लिगैंड के बीच उपसहसंयोजन आबंध निर्माण के लिए धातु रिक्त ऑर्बिटल उपलब्ध कराता है और लिगैंड इलेक्ट्रॉन युग्म दान करता है। 2. ऑर्बिटलों का संकरण होता है। 3. बंध की प्रकृति आंतरिक-कक्षीय (inner orbital) या बाह्य-कक्षीय (outer orbital) होती है।

उदाहरण

सामान्य नियम

प्रबल लिगैंड (CO, CN⁻, en) आंतरिक-कक्षीय (प्रतिचुंबकीय) तथा दुर्बल लिगैंड (Cl⁻, H₂O, F⁻) बाह्य-कक्षीय (अनुचुंबकीय) कॉम्प्लेक्स बनाते हैं।

7. क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (Crystal Field Theory)

इस सिद्धांत के अनुसार लिगैंडों को बिंदु आवेश माना जाता है। ऑक्टाहेड्रल क्षेत्र में d-ऑर्बिटल दो समूहों में विभक्त होते हैं: - $t_{2g}$ (d_xy, d_yz, d_zx): निम्न ऊर्जा - $e_g$ (d_x²-y², d_z²): उच्च ऊर्जा

क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा (Δ₀): दोनों स्तरों के बीच ऊर्जा अंतर।

स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी (Spectrochemical Series)

लिगैंडों की क्षेत्र सामर्थ्य का क्रम: $$I^- < Br^- < S^{2-} < Cl^- < NO_3^- < F^- < OH^- < H_2O < NCS^- < NH_3 < en < CN^- < CO$$

लिगैंड क्षेत्र का प्रभाव

8. समावयवता (Isomerism)

संरचनात्मक समावयवता

  1. आयनीकरण समावयवता: बाह्य आयन का समन्वयन गोले में स्थानांतरण। जैसे [Co(NH₃)₅Br]SO₄ तथा [Co(NH₃)₅SO₄]Br।
  2. लिंकेज समावयवता: सम्युक्त लिगैंड के विभिन्न परमाणु धातु से जुड़ें। जैसे [Co(NH₃)₅(NO₂)]²⁺ (नाइट्रो) तथा [Co(NH₃)₅(ONO)]²⁺ (नाइट्राइटो)।
  3. समन्वयन समावयवता: धनायन-ऋणायन के मध्य लिगैंड का विनिमय।
  4. समन्वयन स्थल समावयवता: द्विनाभिकीय यौगिकों में।

त्रिविम समावयवता

  1. ज्यामितीय समावयवता: cis (एक ही ओर) तथा trans (विपरीत ओर)। - [Pt(NH₃)₂Cl₂]: cis तथा trans दोनों (वर्ग समतलीय)। - [Co(NH₃)₄Cl₂]⁺: cis तथा trans। - ऑक्टाहेड्रल [Ma₃b₃] में fac तथा mer समावयव।
  2. प्रकाशिक समावयवता: असममित अणु जो प्रकाश को दाएँ (dextro) या बाएँ (laevo) घुमाते हैं। जैसे [Co(en)₃]³⁺।

9. उपसहसंयोजन यौगिकों के अनुप्रयोग

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: नामकरण उदाहरण

यौगिक नाम
K4[Fe(CN)6] पोटैशियम हेक्सासायनाइडोफेरेट(II)
[Co(NH3)6]Cl3 हेक्साअम्मीनीकोबाल्ट(III) क्लोराइड
[Ni(CO)4] टेट्राकार्बोनिलनिकेल(0)
[Pt(NH3)2Cl2] डाइअम्मीनीडाइक्लोरिडोप्लैटिनम(II)

तालिका 2: VBT उदाहरण

कॉम्प्लेक्स संकरण संरचना चुंबकत्व
[Co(NH3)6]³⁺ d²sp³ ऑक्टाहेड्रल प्रतिचुंबकीय
[CoF6]³⁻ sp³d² ऑक्टाहेड्रल अनुचुंबकीय
[Ni(CN)4]²⁻ dsp² वर्ग समतलीय प्रतिचुंबकीय
[NiCl4]²⁻ sp³ चतुष्फलकीय अनुचुंबकीय

तालिका 3: समावयवता

प्रकार उदाहरण
लिंकेज [Co(NH3)5(NO2)]²⁺ vs [Co(NH3)5(ONO)]²⁺
आयनीकरण [Co(NH3)5Br]SO4 vs [Co(NH3)5SO4]Br
ज्यामितीय cis-व-trans [Pt(NH3)2Cl2]
प्रकाशिक d- व l- [Co(en)3]³⁺

माइंड मैप

graph TD A["उपसहसंयोजन यौगिक"] --> B["मूल पद"] B --> C["केंद्रीय धातु, लिगैंड, समन्वयन संख्या"] A --> D["लिगैंड"] D --> E["मोनो/डाइ/पॉलीडेंटेट"] D --> F["सम्युक्त (NO2⁻)"] D --> G["हेलटिंग (en, ox, EDTA)"] A --> H["वर्नर सिद्धांत"] H --> I["प्राथमिक व द्वितीयक संयोजकता"] A --> J["VBT"] J --> K["d²sp³ (आंतरिक)"] J --> L["sp³d² (बाह्य)"] A --> M["CFT"] M --> N["t2g, eg"] M --> O["स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी"] A --> P["समावयवता"] P --> Q["लिंकेज, आयनीकरण, ज्यामितीय, प्रकाशिक"] A --> R["अनुप्रयोग"] R --> S["सिस्प्लैटिन, क्लोरोफिल, EDTA"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

आरेख 1: ऑक्टाहेड्रल तथा चतुष्फलकीय संरचना

उपसहसंयोजन संरचनाएँ ऑक्टाहेड्रल (समन्वयन 6) M चतुष्फलकीय (समन्वयन 4) M Golden Rule प्रबल लिगैंड आंतरिक-कक्षीय (प्रतिचुंबकीय) तथा दुर्बल लिगैंड बाह्य-कक्षीय (अनुचुंबकीय) कॉम्प्लेक्स बनाते हैं।

आरेख 2: cis-trans समावयवता

वर्ग समतलीय [Pt(NH₃)₂Cl₂] की cis-trans समावयवता cis (समान लिगैंड एक ओर) Pt NH3 NH3 Cl Cl trans (समान लिगैंड विपरीत) Pt NH3 Cl NH3 Cl स्वर्ण नियम समान लिगैंड जब एक ही ओर हों तो cis और विपरीत ओर हों तो trans समावयव बनता है।

सामान्य गलतियाँ

  1. उपसहसंयोजन संख्या को लिगैंड की संख्या के बराबर लिखना — यह दानदाता परमाणुओं की संख्या है (डाइडेंटेट लिगैंड 2 गिनता है)।
  2. ऋणायन स्पीशीज़ में धातु का नाम '-एट' प्रत्यय के साथ लिखना भूलना — फेरेट, क्यूप्रेट, निकोलेट।
  3. केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था की गणना में लिगैंड के आवेश को नहीं जोड़ना।
  4. NO₂⁻ (नाइट्रो) और ONO⁻ (नाइट्राइटो) के लिंकेज समावयवों को उल्टा लिखना।
  5. [NiCl₄]²⁻ को वर्ग समतलीय लिखना — यह sp³, चतुष्फलकीय है।
  6. स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी में CN⁻ को दुर्बल लिगैंड लिखना — CN⁻, CO प्रबल क्षेत्र लिगैंड हैं।
  7. cis-trans को ऑक्टाहेड्रल में भी मुख्य रूप से लिखना — cis-trans वर्ग समतलीय और ऑक्टाहेड्रल दोनों में संभव है, परंतु [Pt(NH₃)₂Cl₂] का उदाहरण वर्ग समतलीय है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. नामकरण में पहले वर्णानुक्रम में लिगैंड, फिर धातु; ऑक्सीकरण अवस्था रोमन में।
  2. समन्वयन संख्या निकालने के लिए दानदाता परमाणुओं की कुल संख्या गिनें।
  3. VBT प्रश्नों में पहले धातु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखें, फिर लिगैंड की प्रबलता से spin state तय करें।
  4. स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी के छोटे क्रम (I⁻ < Cl⁻ < F⁻ < H₂O < NH₃ < en < CN⁻ < CO) याद रखें।
  5. प्रकाशिक समावयवता के लिए [Co(en)₃]³⁺ का उदाहरण सबसे सामान्य है।
  6. अनुप्रयोगों के लिए — सिस्प्लैटिन, क्लोरोफिल (Mg), हीमोग्लोबिन (Fe), B₁₂ (Co) युग्म याद रखें।

निष्कर्ष

उपसहसंयोजन यौगिकों का अध्ययन केंद्रीय धातु-लिगैंड बंधन, नामकरण, वर्नर सिद्धांत, VBT, CFT, समावयवता तथा चुंबकीय गुणधर्मों पर केंद्रित है। ये यौगिक जैविक प्रणालियों, औषधियों और औद्योगिक प्रक्रमों में व्यापक उपयोगी हैं। नामकरण और समन्वयन संख्या की गणना में सटीकता से परीक्षा में उच्च अंक अर्जित किए जा सकते हैं।