विलयन दो या दो से अधिक पदार्थों का समांगी मिश्रण होता है जिसमें विलेय (Solute) विलायक (Solvent) में समान रूप से वितरित होता है। विलयन में विलेय का कण आकार परमाण्वीय या आण्विक स्तर (1 nm से कम) का होता है। विलायक वह घटक है जिसकी मात्रा अधिक होती है, जबकि विलेय वह घटक है जिसकी मात्रा कम होती है। विलयनों का अध्ययन रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान और उद्योगों में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि अधिकांश अभिक्रियाएँ विलयन में ही संपन्न होती हैं। सांद्रण व्यक्त करने के कई प्रकार होते हैं — द्रव्यमान प्रतिशत, आयतन प्रतिशत, मोल प्रभाज, मोलरता, मोललता, नॉर्मलता इत्यादि।
विलायक की अवस्था के आधार पर विलयन निम्न प्रकार के होते हैं:
किसी घटक के मोलों की संख्या तथा विलयन के कुल मोलों की संख्या के अनुपात को मोल प्रभाज कहते हैं। $$x_A = \frac{n_A}{n_A + n_B}, \qquad x_B = \frac{n_B}{n_A + n_B}, \qquad x_A + x_B = 1$$
एक लीटर विलयन में उपस्थित विलेय के मोलों की संख्या को मोलरता कहते हैं। $$M = \frac{\text{विलेय के मोल}}{\text{विलयन का आयतन (लीटर में)}}$$
मोलरता ताप पर निर्भर करती है क्योंकि आयतन ताप के साथ बदलता है।
एक किलोग्राम विलायक में उपस्थित विलेय के मोलों की संख्या को मोललता कहते हैं। $$m = \frac{\text{विलेय के मोल}}{\text{विलायक का द्रव्यमान (kg में)}}$$
मोललता ताप पर निर्भर नहीं करती क्योंकि द्रव्यमान ताप के साथ परिवर्तित नहीं होता।
$$m = \frac{M \times 1000}{(1000 \times d) - (M \times M_{\text{solute}})}$$ यहाँ $d$ = विलयन का घनत्व, $M_{\text{solute}}$ = विलेय का मोलर द्रव्यमान।
राउल्ट के नियम के अनुसार, किसी विलयन के घटक का आंशिक वाष्प दाब, शुद्ध घटक के वाष्प दाब तथा उस घटक के मोल प्रभाज के गुणनफल के बराबर होता है। $$p_A = p_A^0 \times x_A, \qquad p_B = p_B^0 \times x_B$$
कुल वाष्प दाब: $p_{total} = p_A + p_B = p_A^0 x_A + p_B^0 x_B$
वे विलयन जो सभी सांद्रणों पर राउल्ट के नियम का पालन करते हैं, आदर्श विलयन कहलाते हैं। इनकी विशेषताएँ: - $\Delta H_{\text{मिश्रण}} = 0$ (ऊष्मा परिवर्तन नहीं) - $\Delta V_{\text{मिश्रण}} = 0$ (आयतन परिवर्तन नहीं) - उदाहरण: बेंजीन-टॉलूईन, n-हेक्सेन-n-हेप्टेन
जो विलयन राउल्ट के नियम का पालन नहीं करते: 1. धनात्मक विचलन ($\Delta H > 0$, $\Delta V > 0$): A-B अंतरक्रिया A-A या B-B से दुर्बल। उदाहरण: एसीटोन-इथेनॉल, जल-मेथेनॉल। 2. ऋणात्मक विचलन ($\Delta H < 0$, $\Delta V < 0$): A-B अंतरक्रिया प्रबल। उदाहरण: क्लोरोफॉर्म-एसीटोन, जल-HNO₃।
ऐजियोट्रॉप वे विलयन होते हैं जिनका क्वथनांक निश्चित होता है और जिन्हें साधारण आसवन द्वारा पृथक नहीं किया जा सकता।
सहप्रभावी गुणधर्म वे गुण हैं जो विलेय कणों की संख्या पर निर्भर करते हैं, विलेय की प्रकृति पर नहीं। चार प्रमुख सहप्रभावी गुणधर्म हैं:
$$\frac{p_A^0 - p_A}{p_A^0} = x_B$$ यहाँ $x_B$ = विलेय का मोल प्रभाज।
$$\Delta T_b = K_b \times m$$ यहाँ $K_b$ = मोलल क्वथनांक उन्नयन स्थिरांक (इबुलियोस्कोपी स्थिरांक), $m$ = मोललता।
जल के लिए $K_b = 0.52$ K kg mol⁻¹।
$$\Delta T_f = K_f \times m$$ यहाँ $K_f$ = मोलल हिमांक अवनमन स्थिरांक (क्रायोस्कोपी स्थिरांक)।
जल के लिए $K_f = 1.86$ K kg mol⁻¹।
परासरण दाब वह अतिरिक्त दाब है जो अर्धपारगम्य झिल्ली के द्वारा विलायक के विलयन की ओर प्रवाह को रोकने के लिए आवश्यक होता है। $$\Pi = CRT = \frac{n}{V}RT$$
वान्ट हॉफ ने इसे सिद्ध किया। परासरण दाब सबसे अधिक महत्वपूर्ण सहप्रभावी गुणधर्म है क्योंकि इसे कमरे के ताप पर मापा जा सकता है।
समपरासारी विलयन (Isotonic): जिन विलयनों का परासरण दाब समान होता है। मानव रक्त का परासरण दाब लगभग 7.7 atm होता है। अंतःशिरा (IV) द्रवों में इसी के समतुल्य 0.9% NaCl विलयन (सामान्य लवण विलयन) उपयोग होता है।
वैद्युत-अपघट्य (Electrolyte) विलयनों में विलेय के आयनों में वियोजन या अणुओं के संगुणन के कारण कणों की वास्तविक संख्या प्रेक्षित संख्या से भिन्न होती है। वान्ट हॉफ गुणांक $i$ निम्न प्रकार परिभाषित है: $$i = \frac{\text{प्रेक्षित सहप्रभावी गुणधर्म}}{\text{सैद्धांतिक सहप्रभावी गुणधर्म}} = \frac{\text{विलयन में कणों की वास्तविक संख्या}}{\text{विलेय के कणों की सैद्धांतिक संख्या}}$$
संशोधित सूत्र: $$\Delta T_b = i K_b m, \qquad \Delta T_f = i K_f m, \qquad \Pi = iCRT$$
किसी ताप पर किसी विलायक की निश्चित मात्रा में घुलने वाले विलेय की अधिकतम मात्रा को उसकी विलेयता कहते हैं।
किसी स्थिर ताप पर गैस की विलेयता उसके आंशिक दाब के अनुक्रमानुपाती होती है। $$p = K_H \times x$$ यहाँ $K_H$ = हेनरी स्थिरांक, $x$ = गैस का मोल प्रभाज।
गैसों की विलेयता ताप बढ़ने पर घटती है (जैसे सोडा की बोतल खोलने पर गैस निकलती है)। $K_H$ का मान ताप बढ़ने पर बढ़ता है।
ठोस विलेयों की विलेयता सामान्यतः ताप बढ़ने पर बढ़ती है। NaCl की विलेयता ताप के साथ बहुत कम बदलती है जबकि KNO₃ और KCl की विलेयता ताप के साथ काफी बढ़ती है।
| सहप्रभावी गुणधर्म | सूत्र | उपयोग/उदाहरण |
|---|---|---|
| वाष्प दाब का आपेक्षिक अवनमन | $\Delta p / p^0 = x_B$ | राउल्ट नियम |
| क्वथनांक उन्नयन | $\Delta T_b = K_b \times m$ | इबुलियोस्कोपी |
| हिमांक अवनमन | $\Delta T_f = K_f \times m$ | क्रायोस्कोपी, एंटीफ्रीज़ |
| परासरण दाब | $\Pi = CRT$ | वान्ट हॉफ समीकरण |
| गुण | मोलरता (M) | मोललता (m) |
|---|---|---|
| परिभाषा | प्रति लीटर विलयन में मोल | प्रति kg विलायक में मोल |
| ताप पर निर्भरता | हाँ | नहीं |
| इकाई | mol/L | mol/kg |
| गुण | आदर्श विलयन | धनात्मक विचलन | ऋणात्मक विचलन |
|---|---|---|---|
| राउल्ट नियम | पालन करता है | नहीं | नहीं |
| ΔH मिश्रण | 0 | >0 | <0 |
| ΔV मिश्रण | 0 | >0 | <0 |
| A-B आकर्षण | A-A = A-B | A-B < A-A | A-B > A-A |
विलयन अध्याय में सांद्रण की इकाइयों, राउल्ट नियम, आदर्श-अनादर्श विलयन, ऐजियोट्रॉप, सहप्रभावी गुणधर्म, वान्ट हॉफ गुणांक और हेनरी नियम का विस्तृत अध्ययन किया गया। यह अध्याय आण्विक द्रव्यमान निर्धारण और वैद्युत-अपघट्यों के व्यवहार को समझने का आधार है। सूत्रों का सही उपयोग तथा इकाइयों पर ध्यान देकर इस अध्याय में पूर्ण अंक प्राप्त किए जा सकते हैं।