Comprehensive theory, key formulas, diagrams, and memory aids for आय और रोजगार का निर्धारण.
यह अध्याय कीन्स के सिद्धांत पर आधारित है, जो यह बताता है कि किसी अर्थव्यवस्था में राष्ट्रीय आय तथा रोजगार का स्तर कैसे निर्धारित होता है। कीन्स के अनुसार, राष्ट्रीय आय एवं रोजगार का स्तर प्रभावी माँग (Effective Demand) पर निर्भर करता है। जब कुल माँग (Aggregate Demand) और कुल पूर्ति (Aggregate Supply) बराबर हो जाती हैं, तब अर्थव्यवस्था का संतुलन स्थापित होता है। बेरोजगारी मुख्यतः माँग की कमी के कारण होती है, इसलिए सरकार को कुल माँग को बढ़ाने के उपाय करने चाहिए।
कुल माँग से आशय किसी वर्ष में अर्थव्यवस्था की सभी इकाइयों द्वारा की गई अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं की कुल माँग से है।
$$AD = C + I + G + (X - M)$$
क्लोज्ड अर्थव्यवस्था (सरकारी क्षेत्र रहित) में:
$$AD = C + I$$
जहाँ $C$ = उपभोग व्यय, $I$ = निवेश व्यय। AD एक प्रवाह चर है।
कुल पूर्ति से आशय अर्थव्यवस्था में एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं की कुल मात्रा से है। दो क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में:
$$AS = C + S$$
जहाँ $C$ = उपभोग और $S$ = बचत। कुल पूर्ति को राष्ट्रीय आय (Y) के बराबर माना जाता है, अर्थात $Y = C + S$।
उपभोग एवं आय के बीच कार्यात्मक संबंध को उपभोग फलन कहते हैं।
$$C = \bar{C} + bY$$
यहाँ: - $C$ = कुल उपभोग - $\bar{C}$ = स्वायत्त उपभोग (आय शून्य पर भी उपभोग, जो ऋण से किया जाता है) - $b$ = सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC) - $Y$ = आय
$$\text{MPC} = \frac{\Delta C}{\Delta Y}$$
$$\text{APC} = \frac{C}{Y}$$
$$S = -\bar{C} + (1 - b)Y$$
यहाँ $(1 - b)$ = सीमांत बचत प्रवृत्ति (MPS) है।
$$\text{MPS} = \frac{\Delta S}{\Delta Y} = 1 - \text{MPC}$$
$$MPC + MPS = 1 \quad \text{और} \quad APC + APS = 1$$
निवेश पूँजीगत वस्तुओं पर किया गया व्यय है, जो भविष्य में आय उत्पन्न करता है। स्वायत्त निवेश (Autonomous Investment) ब्याज दर पर निर्भर नहीं करता। प्रेरित निवेश (Induced Investment) आय पर निर्भर करता है। कीन्स के सरल मॉडल में निवेश को स्वायत्त (I = I) माना जाता है।
संतुलन स्तर पर आय वहाँ निर्धारित होती है जहाँ:
$$AD = AS \quad \text{अर्थात} \quad Y = C + I$$
या समतुल्य रूप से:
$$S = I \quad \text{(बचत = निवेश)}$$
$$\bar{C} + bY + I = Y$$ $$Y - bY = \bar{C} + I$$ $$Y^* = \frac{\bar{C} + I}{1 - b}$$
कीन्स का गुणक सिद्धांत बताता है कि निवेश में एक इकाई की वृद्धि से आय में कई गुना वृद्धि होती है।
$$\text{गुणक } (K) = \frac{\Delta Y}{\Delta I} = \frac{1}{1 - \text{MPC}} = \frac{1}{\text{MPS}}$$
निवेश में वृद्धि से आय बढ़ती है, बढ़ी हुई आय का एक भाग उपभोग में जाता है (MPC के अनुपात में), जिससे माँग पुनः बढ़ती है और यह प्रक्रिया क्रमिक रूप से चलती रहती है।
$$\Delta Y = K \times \Delta I$$
प्रभावी माँग वह कुल माँग है जो कुल पूर्ति के बराबर होकर वास्तव में क्रय शक्ति में बदल जाती है। यह रोजगार के स्तर को निर्धारित करती है। पूर्ण रोजगार से कम स्तर पर अर्थव्यवस्था में संतुलन संभव है।
जब संतुलन आय पूर्ण रोजगार आय से कम होती है, तो बेरोजगारी उत्पन्न होती है। यह माँग की कमी (Deficient Demand) का परिणाम है। माँग की कमी दूर करने के लिए सरकार राजकोषीय नीति (व्यय बढ़ाना, कर घटाना) तथा RBI मौद्रिक नीति (ब्याज दर घटाना) अपना सकती है।
पूर्ण रोजगार (Full Employment) की स्थिति वह होती है जब अर्थव्यवस्था में कार्य करने को तत्पर एवं सक्षम सभी व्यक्तियों को यथावत् वास्तविक मजदूरी पर रोजगार प्राप्त हो जाता है। कीन्स के अनुसार, अर्थव्यवस्था पूर्ण रोजगार से कम स्तर पर भी संतुलन में हो सकती है, जिसे अधीन-रोजगार संतुलन (Underemployment Equilibrium) कहते हैं। यह स्थिति माँग की कमी के कारण उत्पन्न होती है।
| आधार | पूर्ण रोजगार संतुलन | अधीन-रोजगार संतुलन |
|---|---|---|
| कुल माँग | प्रभावी माँग अधिक | माँग की कमी |
| बेरोजगारी | केवल स्वैच्छिक/घर्षणात्मक | अनैच्छिक बेरोजगारी |
| सरकारी हस्तक्षेप | कम आवश्यक | आवश्यक |
माँग की कमी की स्थिति में राजकोषीय नीति (सरकारी व्यय बढ़ाना, कर घटाना) तथा मौद्रिक नीति (ब्याज दर घटाना, CRR घटाना) द्वारा कुल माँग को बढ़ाया जाता है। अतिरिक्त माँग की स्थिति में सरकारी व्यय घटाकर, कर बढ़ाकर तथा मौद्रिक संकुचन द्वारा मुद्रास्फीति दबाव को कम किया जाता है। इस प्रकार सरकार तथा केंद्रीय बैंक की नीतियों का समन्वय ही अर्थव्यवस्था को स्थिरता की ओर ले जाता है। यही कीन्सियन सिद्धांत का व्यावहारिक महत्व है।
| सूत्र | अभिव्यक्ति |
|---|---|
| उपभोग फलन | C = C̄ + bY |
| बचत फलन | S = -C̄ + (1-b)Y |
| MPC | ΔC/ΔY |
| MPS | ΔS/ΔY = 1 - MPC |
| निवेश गुणक | 1/(1-MPC) = 1/MPS |
| संतुलन आय | (C̄ + I)/(1-b) |
| MPC | MPS | गुणक = 1/MPS |
|---|---|---|
| 0.5 | 0.5 | 2 |
| 0.75 | 0.25 | 4 |
| 0.8 | 0.2 | 5 |
| 0.9 | 0.1 | 10 |
| कुल माँग (AD) | कुल पूर्ति (AS) |
|---|---|
| AD = C + I | AS = C + S |
| उपभोग + निवेश | उपभोग + बचत |
| माँग पक्ष | आपूर्ति पक्ष |
| संतुलन: AD = AS | अर्थात S = I |
graph TD
A["आय और रोजगार का निर्धारण"] --> B["प्रभावी माँग"]
A --> C["कुल माँग AD = C + I"]
A --> D["कुल पूर्ति AS = C + S"]
A --> E["उपभोग फलन C = C̄ + bY"]
A --> F["संतुलन: AD = AS या S = I"]
A --> G["निवेश गुणक K = 1/(1-MPC)"]
E --> H["MPC, MPS, APC, APS"]
F --> I["संतुलन आय = (C̄ + I)/(1-b)"]
G --> J["ΔY = K x ΔI"]
कीन्स का सिद्धांत राष्ट्रीय आय एवं रोजगार के निर्धारण में प्रभावी माँग को केंद्रीय स्थान देता है। उपभोग फलन, बचत फलन तथा निवेश की अवधारणाओं के माध्यम से संतुलन आय AD = AS या S = I पर निर्धारित होती है। निवेश गुणक यह दर्शाता है कि निवेश में अल्प वृद्धि आय में कई गुना वृद्धि कर सकती है, जिससे माँग की कमी के कारण उत्पन्न बेरोजगारी का समाधान संभव है। यह अध्याय सरकारी बजट तथा खुली अर्थव्यवस्था जैसे आगे के अध्यायों के लिए आधार तैयार करता है।