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1. परिचय

मुद्रा (Money) वस्तु विनिमय की समस्या का समाधान है। वस्तु विनिमय प्रणाली में 'आवश्यकताओं के दोहरे संयोग' (Double Coincidence of Wants) की बड़ी समस्या थी। मुद्रा के आविष्कार से मूल्य का मापन, विनिमय का माध्यम, बचत का संग्रहण आदि कार्य सरल हो गए। मुद्रा कोई भी ऐसी वस्तु है जिसे सामान्य रूप से विनिमय के माध्यम के रूप में स्वीकार किया जाता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भारत की केंद्रीय बैंक है, जो मुद्रा की आपूर्ति को नियंत्रित करती है तथा साख नियंत्रण की नीतियाँ बनाती है। वाणिज्यिक बैंक जमा स्वीकार करते हैं, ऋण प्रदान करते हैं और साख का सृजन करते हैं।

2. मुद्रा के कार्य (Functions of Money)

मुद्रा के कार्यों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है - प्राथमिक कार्य एवं द्वितीयक कार्य।

प्राथमिक कार्य (Primary Functions)

  1. विनिमय का माध्यम (Medium of Exchange): मुद्रा वस्तुओं एवं सेवाओं के विनिमय में माध्यम का कार्य करती है।
  2. मूल्य का मापक (Measure of Value): मुद्रा में सभी वस्तुओं के मूल्य को मापा जाता है, जिससे तुलना संभव होती है।

द्वितीयक कार्य (Secondary Functions)

  1. स्थगित भुगतान का मानक (Standard of Deferred Payments): ऋणों के भुगतान का मानक मुद्रा में ही निर्धारित होता है।
  2. मूल्य का संचय (Store of Value): मुद्रा में बचत को सुरक्षित रखा जा सकता है।
  3. मूल्य का हस्तांतरण (Transfer of Value): धन को एक स्थान से दूसरे स्थान तथा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक हस्तांतरित किया जा सकता है।

सांविधिक कार्य (Contingent Functions)

  1. बंटवारा (Distribution) का आधार प्रदान करना, कुल उपभोग का मापन करना तथा आय की लोच का निर्धारण करना।

3. मुद्रा की माँग (Demand for Money)

कीन्स के अनुसार लोग निम्नलिखित उद्देश्यों से मुद्रा की माँग करते हैं:

  1. लेन-देन का उद्देश्य (Transaction Motive): दैनिक क्रय-विक्रय के लिए नकद रखना।
  2. सावधानी का उद्देश्य (Precautionary Motive): अप्रत्याशित व्यय से बचने के लिए नकद रखना।
  3. सट्टेबाजी का उद्देश्य (Speculative Motive): ब्याज दरों में होने वाले परिवर्तन से लाभ कमाने के लिए नकद रखना।

सट्टेबाजी माँग तथा ब्याज दर के बीच विपरीत (Negative) संबंध होता है। ब्याज दर बढ़ने पर मुद्रा की सट्टेबाजी माँग घटती है।

4. मुद्रा की आपूर्ति (Supply of Money)

मुद्रा की आपूर्ति से आशय अर्थव्यवस्था में चालू समय पर उपलब्ध मुद्रा की कुल मात्रा से है। मुद्रा की आपूर्ति एक स्टॉक चर है। RBI मुद्रा आपूर्ति के निम्नलिखित माप प्रकाशित करती है:

यहाँ $CU$ = जनता के पास करेंसी, $DD$ = वाणिज्यिक बैंकों में डिमांड जमा।

5. वाणिज्यिक बैंक एवं साख का सृजन (Commercial Banks and Credit Creation)

वाणिज्यिक बैंक वे संस्थाएँ हैं जो जनता से जमा स्वीकार करती हैं तथा आगे ऋण प्रदान करती हैं। साख का सृजन (Credit Creation) वाणिज्यिक बैंकों का एक महत्वपूर्ण कार्य है। बैंक अपने जमा के एक भाग को नकद रखकर शेष राशि को ऋण के रूप में देते हैं, इससे अर्थव्यवस्था में नई क्रय शक्ति का सृजन होता है।

साख सृजन का गुणक (Credit Multiplier)

$$\text{कुल साख सृजन} = \frac{1}{CRR} \times \text{प्रारंभिक नकद जमा}$$

$$\text{साख निर्माण गुणक} = \frac{1}{CRR}$$

उदाहरण के लिए, यदि CRR = 20% है तो साख गुणक = 1/0.20 = 5 होगा, अर्थात 1000 रुपये की प्रारंभिक जमा से कुल 5000 रुपये की साख का सृजन संभव है।

6. साख नियंत्रण के उपाय (Measures of Credit Control)

मौद्रिक नीति के मात्रात्मक उपाय (Quantitative Tools)

  1. बैंक दर (Bank Rate): केंद्रीय बैंक जिस दर पर वाणिज्यिक बैंकों को ऋण देती है। बैंक दर बढ़ाने से साख संकुचित होती है।
  2. नकद आरक्षित अनुपात (CRR): वाणिज्यिक बैंकों को अपनी कुल जमा का एक निश्चित भाग केंद्रीय बैंक के पास नकद रखना होता है।
  3. वैधानिक तरलता अनुपात (SLR): बैंकों को अपनी जमा का एक निश्चित भाग तरल परिसंपत्तियों में रखना होता है।
  4. खुले बाजार प्रचालन (Open Market Operations): केंद्रीय बैंक सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद-बिक्री करके बाजार में मुद्रा की मात्रा को प्रभावित करता है।
  5. पुनर्कटौती सुविधा (Repo Rate): रेपो दर वह दर है जिस पर RBI बैंकों को सरकारी प्रतिभूतियों के बदले अल्पकालिक ऋण देती है।

गुणात्मक उपाय (Qualitative Tools)

  1. मार्जिन आवश्यकता (Margin Requirement)
  2. नैतिक प्रेरणा (Moral Suasion)
  3. प्रत्यक्ष कार्रवाई (Direct Action)
  4. उपभोक्ता साख नियंत्रण

7. रेपो दर और रिवर्स रेपो दर (Repo and Reverse Repo Rate)

8. मुद्रास्फीति एवं मुद्रा आपूर्ति का संबंध

मुद्रा की अत्यधिक आपूर्ति से मुद्रास्फीति (Inflation) उत्पन्न होती है क्योंकि माँग में वृद्धि से सामान्य मूल्य स्तर बढ़ता है। कीन्स के अनुसार, पूर्ण रोजगार की स्थिति में मुद्रा आपूर्ति बढ़ाने से केवल मूल्य स्तर बढ़ता है, उत्पादन नहीं। फिशर का विनिमय समीकरण इस संबंध को इस प्रकार दर्शाता है:

$$MV = PT$$

यहाँ $M$ = मुद्रा की आपूर्ति, $V$ = मुद्रा का संचालन वेग, $P$ = मूल्य स्तर, $T$ = लेन-देन की कुल मात्रा।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: मुद्रा आपूर्ति के माप

माप परिभाषा
M1 CU + DD (डिमांड जमा)
M2 M1 + डाकघर बचत जमा
M3 M1 + सावधि जमा
M4 M3 + डाकघर की कुल जमा

तालिका 2: साख नियंत्रण के उपाय

मात्रात्मक उपाय गुणात्मक उपाय
बैंक दर मार्जिन आवश्यकता
CRR नैतिक प्रेरणा
SLR प्रत्यक्ष कार्रवाई
खुले बाजार प्रचालन उपभोक्ता साख नियंत्रण
रेपो दर अनुपातीकरण

तालिका 3: मुद्रा के कार्य

कार्य का प्रकार कार्य
प्राथमिक विनिमय का माध्यम, मूल्य का मापक
द्वितीयक स्थगित भुगतान, मूल्य संचय, मूल्य हस्तांतरण
सांविधिक बंटवारा, कुल उपभोग का मापन

माइंड मैप

graph TD A["मुद्रा और बैंकिंग"] --> B["मुद्रा के कार्य: प्राथमिक, द्वितीयक, सांविधिक"] A --> C["मुद्रा की माँग: लेन-देन, सावधानी, सट्टेबाजी"] A --> D["मुद्रा आपूर्ति: M1, M2, M3, M4"] A --> E["वाणिज्यिक बैंक: साख का सृजन"] A --> F["केंद्रीय बैंक: साख नियंत्रण"] E --> G["गुणक = 1/CRR"] F --> H["मात्रात्मक: बैंक दर, CRR, SLR, OMO"] F --> I["गुणात्मक: मार्जिन, नैतिक प्रेरणा"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

वाणिज्यिक बैंक द्वारा साख का सृजन CRR = 20%, प्रारंभिक नकद जमा = 1000 रुपये, गुणक = 5 चरण 1: जमा 1000 नकद रखा 200, ऋण 800 जमा चरण 2: जमा 800 नकद रखा 160, ऋण 640 चरण 3: जमा 640 और ऐसे ही चलता है कुल साख सृजन = प्रारंभिक जमा x (1/CRR) = 1000 x 5 = 5000 रुपये साख सृजन की प्रक्रिया बैंक जमा का केवल CRR भाग नकद रखता है शेष राशि ऋण के रूप में प्रदान की जाती है ऋण प्राप्त व्यक्ति की जमा नए बैंक में जाती है इस प्रकार जमाओं का क्रमिक विस्तार होता है स्वर्ण नियम साख सृजन गुणक = 1/CRR; CRR जितनी कम, साख सृजन उतना अधिक।
मुद्रा की माँग के उद्देश्य लेन-देन का उद्देश्य - दैनिक क्रय-विक्रय हेतु - आय एवं व्यय की समय असंतुलन के कारण - आय के अनुपात में - ब्याज दर से स्वतंत्र सावधानी का उद्देश्य - अप्रत्याशित व्यय हेतु - बीमारी, दुर्घटना जैसी आपात स्थिति के लिए - आय एवं स्थिति पर निर्भर करता है सट्टेबाजी का उद्देश्य - ब्याज दर के परिवर्तन से लाभ कमाने हेतु - ब्याज दर के साथ विपरीत संबंध - उच्च दर पर कम माँग Golden Rule ब्याज दर बढ़ने पर सट्टेबाजी माँग घटती है, किंतु लेन-देन माँग अपरिवर्तित रहती है।

सामान्य गलतियाँ

  1. बैंक दर और रेपो दर में भ्रम: बैंक दर दीर्घकालिक ऋण की दर है जबकि रेपो दर अल्पकालिक ऋण (सरकारी प्रतिभूतियों के बदले) की दर है।
  2. CRR और SLR में अंतर न करना: CRR नकद रखने की दर है जबकि SLR तरल परिसंपत्तियों (प्रतिभूतियाँ) में रखने की दर है।
  3. मुद्रा आपूर्ति को प्रवाह चर मानना: मुद्रा आपूर्ति एक स्टॉक चर है, प्रवाह नहीं।
  4. साख सृजन की गणना में त्रुटि: कुल साख = जमा x (1/CRR), जहाँ गुणक = 1/CRR। CRR को प्रतिशत में बदलकर ही गणना करें।
  5. M1 को मुद्रा आपूर्ति का एकमात्र माप मानना: RBI चार माप (M1 से M4) प्रकाशित करती है।
  6. लेन-देन माँग और सट्टेबाजी माँग के निर्धारकों में भ्रम: लेन-देन माँग आय पर तथा सट्टेबाजी माँग ब्याज दर पर निर्भर करती है।
  7. खुले बाजार प्रचालन की दिशा भूल जाना: प्रतिभूतियाँ बेचने से मुद्रा घटती है, खरीदने से बढ़ती है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. मुद्रा के प्राथमिक, द्वितीयक एवं सांविधिक कार्यों की सूची उदाहरण सहित लिखें।
  2. साख सृजन के गणितीय प्रश्नों में सूत्र 'कुल साख = प्रारंभिक जमा x (1/CRR)' दिखाकर हल करें।
  3. मुद्रा आपूर्ति के चार माप (M1, M2, M3, M4) की परिभाषाएँ याद रखें।
  4. मात्रात्मक और गुणात्मक साख नियंत्रण उपायों की तुलनात्मक सूची बनाएँ।
  5. रेपो दर और रिवर्स रेपो दर का अर्थ तथा उनका मुद्रास्फीति नियंत्रण में योगदान समझाएँ।
  6. सट्टेबाजी माँग और ब्याज दर के विपरीत संबंध को वक्र (वक्र) सहित समझाएँ।
  7. फिशर समीकरण MV = PT की व्याख्या करके मुद्रा-मूल्य स्तर संबंध को स्पष्ट करें।

निष्कर्ष

मुद्रा विनिमय की सभी कठिनाइयों को दूर कर अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनती है। मुद्रा की माँग के तीन उद्देश्य तथा RBI के चार माप मुद्रा आपूर्ति को समझने में सहायक हैं। वाणिज्यिक बैंक साख के सृजन द्वारा अर्थव्यवस्था में क्रय शक्ति बढ़ाते हैं, जबकि केंद्रीय बैंक (RBI) मात्रात्मक एवं गुणात्मक उपायों से साख को नियंत्रित करती है। साख सृजन गुणक (1/CRR) तथा रेपो-रिवर्स रेपो दर की समझ मुद्रास्फीति नियंत्रण की कुंजी है। यह अध्याय आगे 'आय और रोजगार का निर्धारण' के लिए आधारभूत तैयारी करता है।