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1. परिचय

पर्यावरण (Environment) में जल, भूमि, वायु, वन, जीव-जंतु तथा उनके पारस्परिक संबंध शामिल हैं। आर्थिक क्रियाकलाप पर्यावरण से संसाधन (इनपुट) लेते हैं और अवशेष/प्रदूषण (आउटपुट) लौटाते हैं। अर्थशास्त्र में पर्यावरण की दो मुख्य भूमिकाएँ हैं - संसाधनों का प्रदाता तथा कचरे का स्वीकारकर्ता। अनियंत्रित आर्थिक विकास पर्यावरणीय क्षरण (Environmental Degradation) उत्पन्न करता है। इसी समस्या से निपटने के लिए धारणीय विकास (Sustainable Development) की अवधारणा विकसित हुई, जो वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों की क्षमता को सुरक्षित रखती है।

2. पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का संबंध

अर्थव्यवस्था तथा पर्यावरण के बीच तीन प्रकार का संबंध होता है:

  1. इनपुट के रूप में: उत्पादन के लिए प्राकृतिक संसाधन (जल, ऊर्जा, कच्चा माल)।
  2. आउटपुट के रूप में: उपभोग एवं उत्पादन से उत्पन्न अवशेष पर्यावरण में छोड़े जाते हैं।
  3. उपभोक्ता वस्तु के रूप में: लोग अपने जीवन स्तर के लिए स्वच्छ वायु, जल जैसे पर्यावरणीय सुविधाओं का उपभोग करते हैं।

3. पर्यावरणीय क्षरण के कारण (Causes of Environmental Degradation)

  1. जनसंख्या वृद्धि: संसाधनों पर दबाव।
  2. औद्योगीकरण एवं शहरीकरण: प्रदूषण तथा कचरे में वृद्धि।
  3. गरीबी: गरीब पर्यावरणीय स्थिरता की चिंता किए बिना संसाधनों का अधिक दोहन करते हैं।
  4. कृषि रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग: मिट्टी तथा जल का क्षरण।
  5. वनों की कटाई: जैव विविधता में कमी।

पर्यावरणीय क्षरण के रूप

4. विकास और पर्यावरण के बीच व्यापार-अपव्यापार (Trade-off)

अक्सर यह माना जाता है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी हैं। औद्योगिक विकास से प्रदूषण बढ़ता है, किंतु धारणीय विकास की अवधारणा इन दोनों को सुलह कराती है। विकास को इस तरह करना चाहिए कि पर्यावरणीय क्षति न्यूनतम हो तथा भावी पीढ़ियों के संसाधन सुरक्षित रहें।

5. धारणीय विकास (Sustainable Development)

धारणीय विकास वह विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करता है, किंतु भविष्य की पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से समझौता नहीं करता। यह परिभाषा 'बुंटलैंड रिपोर्ट' (Brundtland Commission, 1987) की है।

धारणीय विकास के मूल सिद्धांत

  1. नवीकरणीय संसाधनों का उपयोग उनकी पुनः-निर्माण दर से अधिक नहीं होना चाहिए।
  2. गैर-नवीकरणीय संसाधनों का सीमित एवं कुशल उपयोग।
  3. प्रदूषण की मात्रा पर्यावरण की अवशोषण क्षमता से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  4. भावी पीढ़ियों के लिए संसाधनों का संरक्षण।

6. पर्यावरणीय अर्थशास्त्र की अवधारणाएँ

पर्यावरण क्षरण और राष्ट्रीय आय

परंपरागत राष्ट्रीय आय की गणना में पर्यावरणीय क्षरण को शामिल नहीं किया जाता। वनों की कटाई या प्रदूषण GDP को घटाने के बजाय कुछ मामलों में बढ़ा भी सकते हैं (क्योंकि सफाई एवं पुनर्निर्माण में व्यय बढ़ता है)। इसलिए सतत राष्ट्रीय आय (Green GDP) की अवधारणा पर जोर दिया जाता है।

सार्वजनिक वस्तु एवं बाह्यता

स्वच्छ वायु एक सार्वजनिक वस्तु है। प्रदूषण एक नकारात्मक बाह्यता (Negative Externality) है, जिसमें उत्पादक की लागत समाज पर पड़ती है। बाह्यताओं को आंतरिक करने के लिए सरकार प्रदूषण कर लगा सकती है।

7. भारत में पर्यावरण संरक्षण के उपाय

  1. वन संरक्षण अधिनियम (1980): वनों की कटाई पर नियंत्रण।
  2. जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम (1974) तथा वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम (1981)
  3. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम (1986): समग्र पर्यावरण संरक्षण कानून।
  4. राष्ट्रीय हरित पंचायत (Green Tribunal): पर्यावरणीय विवादों का निपटारा।
  5. राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम: वृक्षारोपण एवं वन क्षेत्र में वृद्धि।
  6. गंगा संरक्षण परियोजना: नदियों की सफाई।

ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों को बढ़ावा

सौर, पवन, जल ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों के प्रयोग से जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटती है तथा पर्यावरणीय क्षति कम होती है।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: पर्यावरणीय क्षरण के रूप

प्रकार मुख्य कारण
वायु प्रदूषण उद्योग, वाहन
जल प्रदूषण औद्योगिक कचरा
भूमि क्षरण रसायनिक उर्वरक
वनों का क्षरण वनों की कटाई

तालिका 2: प्रमुख पर्यावरणीय कानून

कानून वर्ष
जल (प्रदूषण) अधिनियम 1974
वन (संरक्षण) अधिनियम 1980
वायु (प्रदूषण) अधिनियम 1981
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986

तालिका 3: धारणीय विकास के सिद्धांत

सिद्धांत विवरण
नवीकरणीय संसाधन पुनः-निर्माण दर से अधिक उपयोग नहीं
गैर-नवीकरणीय सीमित एवं कुशल उपयोग
प्रदूषण अवशोषण क्षमता से अधिक नहीं
भावी पीढ़ी संरक्षण अनिवार्य

माइंड मैप

graph TD A["पर्यावरण और धारणीय विकास"] --> B["पर्यावरण: संसाधन प्रदाता"] A --> C["क्षरण के कारण"] A --> D["धारणीय विकास"] A --> E["पर्यावरणीय कानून"] C --> F["जनसंख्या, प्रदूषण, वन कटाई"] D --> G["बुंटलैंड रिपोर्ट 1987"] E --> H["वन, जल, वायु, पर्यावरण अधिनियम"] D --> I["नवीकरणीय ऊर्जा"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का संबंध अर्थव्यवस्था इनपुट: प्राकृतिक संसाधन (जल, ऊर्जा, कच्चा माल) पर्यावरण से अर्थव्यवस्था में प्रवाह आउटपुट: अवशेष एवं प्रदूषण अर्थव्यवस्था से पर्यावरण में प्रवाह उपभोक्ता वस्तु: स्वच्छ वायु, जल का उपभोग जीवन स्तर का आधार अत्यधिक दोहन से पर्यावरणीय क्षरण प्रदूषण = नकारात्मक बाह्यता, स्वच्छ वायु = सार्वजनिक वस्तु स्वर्ण नियम पर्यावरण अर्थव्यवस्था को इनपुट देता है तथा आउटपुट स्वीकार करता है।
धारणीय विकास के सिद्धांत नवीकरणीय संसाधन उपयोग पुनः-निर्माण दर से अधिक नहीं होना चाहिए जैसे: वन, मत्स्य, जल गैर-नवीकरणीय संसाधन सीमित एवं कुशल उपयोग रिसाइक्लिंग पर जोर जैसे: कोयला, तेल प्रदूषण नियंत्रण प्रदूषण की मात्रा पर्यावरण की अवशोषण क्षमता से अधिक नहीं अवशोषण क्षमता सीमित है भावी पीढ़ियाँ भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों का संरक्षण अंतर-पीढ़ीगत न्याय परिभाषा: बुंटलैंड रिपोर्ट (1987) वर्तमान की आवश्यकताएँ पूरी हों, किंतु भविष्य की क्षमता से समझौता न हो Golden Rule धारणीय विकास वर्तमान को पूरा करता है, भविष्य की क्षमता सुरक्षित रखता है।

सामान्य गलतियाँ

  1. धारणीय विकास की परिभाषा के स्रोत को भूलना: यह परिभाषा बुंटलैंड रिपोर्ट (1987) की है।
  2. पर्यावरणीय कानूनों के वर्षों में भ्रम: जल 1974, वन 1980, वायु 1981, पर्यावरण 1986।
  3. सार्वजनिक वस्तु और बाह्यता का भ्रम: स्वच्छ वायु सार्वजनिक वस्तु है, प्रदूषण नकारात्मक बाह्यता।
  4. नवीकरणीय और गैर-नवीकरणीय संसाधनों में भ्रम: वन-जल नवीकरणीय, कोयला-तेल गैर-नवीकरणीय।
  5. GDP से पर्यावरणीय क्षरण का संबंध: परंपरागत GDP में पर्यावरणीय क्षरण की कटौती नहीं होती।
  6. ग्रीन GDP का अर्थ भूलना: सतत राष्ट्रीय आय, जिसमें पर्यावरणीय लागत समायोजित होती है।
  7. प्रदूषण की अवशोषण क्षमता को असीम मानना: पर्यावरण की अवशोषण क्षमता सीमित होती है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के संबंध को इनपुट-आउटपुट रूप में समझाएँ।
  2. पर्यावरणीय क्षरण के कारणों को सूचीबद्ध करें।
  3. धारणीय विकास की परिभाषा (बुंटलैंड रिपोर्ट) सटीक लिखें।
  4. धारणीय विकास के मूल सिद्धांतों को उदाहरण सहित समझाएँ।
  5. प्रमुख पर्यावरणीय कानूनों की सूची वर्ष सहित लिखें।
  6. विकास और पर्यावरण के व्यापार-अपव्यापार (Trade-off) का विश्लेषण करें।
  7. नवीकरणीय ऊर्जा के प्रोत्साहन को धारणीय विकास से जोड़कर लिखें।

निष्कर्ष

पर्यावरण अर्थव्यवस्था को संसाधन प्रदान करता है और अवशेषों को स्वीकार करता है। अनियंत्रित विकास से वायु, जल, भूमि एवं वनों का क्षरण होता है, जो भावी पीढ़ियों के लिए खतरा है। धारणीय विकास विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करता है। भारत ने विभिन्न अधिनियमों (वन, जल, वायु, पर्यावरण) तथा नवीकरणीय ऊर्जा के प्रोत्साहन द्वारा पर्यावरण संरक्षण के प्रयास किए हैं। स्थायी समृद्धि के लिए पर्यावरणीय सीमाओं का सम्मान करते हुए विकास करना ही धारणीय मार्ग है।