यह अध्याय ब्रिटिश शासन के अंतिम वर्षों (लगभग 1947) में भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति का विश्लेषण करता है। ब्रिटिश शासन का उद्देश्य भारत को अपने उद्योगों का कच्चा माल प्रदान करने वाला कृषि प्रधान देश तथा तैयार माल का बाजार बनाना था। इस नीति के परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास असंतुलित हुआ। कृषि क्षेत्र ठहरा हुआ था, उद्योग क्षेत्र अविकसित था, बुनियादी अवसंरचना की भारी कमी थी तथा जनसंख्या पर दबाव लगातार बढ़ रहा था। भारत की राष्ट्रीय आय में कृषि का हिस्सा लगभग 50 प्रतिशत तक था, जबकि रोजगार में कृषि का हिस्सा लगभग 72 प्रतिशत था।
2. ब्रिटिश काल में भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ
कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था: अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी, किंतु कृषि का विकास अत्यंत धीमा था।
ठहरी हुई अर्थव्यवस्था (Stagnant Economy): राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर बहुत कम रही, प्रति व्यक्ति आय में लगभग कोई वृद्धि नहीं हुई।
पिछड़ी अवसंरचना: रेलवे, सड़क, बंदरगाह का विकास मुख्यतः ब्रिटिश स्वार्थ के लिए हुआ, घरेलू विकास हेतु नहीं।
गरीबी एवं बेरोजगारी: अधिकांश जनसंख्या निर्धन थी, शहरों में बेरोजगारी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में छिपी बेरोजगारी व्याप्त थी।
आधुनिक उद्योगों का अभाव: कपड़ा एवं चीनी उद्योग आदि के अपवाद को छोड़कर आधुनिक उद्योग नगण्य थे।
3. कृषि की स्थिति (State of Agriculture)
ब्रिटिश काल में कृषि की स्थिति दयनीय थी:
अत्यधिक बोझ: कृषि पर लगभग 72 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या निर्भर थी, किंतु उत्पादकता अत्यंत कम थी।
बंधुआ श्रमिक एवं भूमिहीनता: जमींदारी प्रथा (जैसे जमींदारी, महालवाड़ी, रैयतवाड़ी व्यवस्था) के कारण किसान कठोर शर्तों पर जमीन पर काम करते थे।
व्यावसायिक फसलों का दबाव: किसानों को नील, कपास, जूट जैसी नकदी फसलें उगाने के लिए बाध्य किया गया, जिससे खाद्यान्न उत्पादन घटा।
अकालों की बारंबारता: ब्रिटिश काल में कई भीषण अकाल पड़े, जैसे 1943 का बंगाल का अकाल।
सिंचाई एवं तकनीक का अभाव: सिंचाई सुविधाएँ सीमित थीं और आधुनिक तकनीक तथा उर्वरकों का प्रयोग नहीं होता था।
जमींदारी प्रथाओं का परिचय
जमींदारी (Permanent Settlement): 1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा लागू; जमींदार मध्यस्थ के रूप में राजस्व वसूलते थे।
महालवाड़ी: उत्तर-पश्चिमी भारत में; गाँव (महल) को इकाई मानकर राजस्व वसूला जाता था।
रैयतवाड़ी: दक्षिणी भारत में; सीधे किसानों (रैयत) से राजस्व लिया जाता था।
4. औद्योगिक क्षेत्र की स्थिति (State of Industry)
हस्तशिल्प उद्योगों का पतन: ब्रिटिश नीति के कारण भारतीय हस्तशिल्प (बुनाई, बढ़ई, कुम्हार) नष्ट हो गए।
डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन: अत्यधिक आयात शुल्क लगाए बिना खुले बाजार के कारण भारतीय उद्योग विदेशी प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए।
उद्योगों का सीमित विस्तार: कपड़ा, चीनी, सीमेंट, जूट जैसे उद्योग तो विकसित हुए, किंतु लौह-इस्पात, रसायन, इंजीनियरिंग जैसे भारी उद्योग नहीं।
प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव: युद्ध के दौरान कुछ उद्योगों (लोहा-इस्पात, कपड़ा) को गति मिली, किंतु यह स्थायी विकास नहीं था।
विदेशी पूँजी का वर्चस्व: जूट, चाय जैसे उद्योगों में ब्रिटिश पूँजी का नियंत्रण था।
5. विदेशी व्यापार की स्थिति (Foreign Trade)
निर्यात-आयात का ढाँचा: भारत कच्चे माल का निर्यातक और तैयार माल का आयातक था।
ब्रिटेन पर निर्भरता: व्यापार का बड़ा हिस्सा ब्रिटेन के साथ होता था।
शुद्ध निर्यातक (Net Exporter): व्यापार शेष भारत के पक्ष में धनात्मक था, किंतु यह आधिक्य भारत के विकास में नहीं, ब्रिटेन की गद्दी में जाता था (घरेलू संसाधनों का ह्रास)।
कच्चे माल का निर्यात: कपास, जूट, चाय, नील, मसाले प्रमुख निर्यात थे।
6. जनसंख्या की स्थिति (Demographic Profile)
पहली जनगणना: 1881 में भारत की पहली जनगणना हुई।
वृद्धि दर: 1921 तक जनसंख्या वृद्धि दर ऋणात्मक या शून्य के समीप रही, जिसे 'बड़ा विराम' (Great Divide) कहा जाता है; 1921 के बाद जनसंख्या तेजी से बढ़ने लगी।
विशेषताएँ: उच्च जन्म दर, उच्च मृत्यु दर, उच्च शिशु मृत्यु दर, निम्न जीवन प्रत्याशा तथा उच्च साक्षरता दर का अभाव।
शहरीकरण: ब्रिटिश काल में शहरीकरण दर अत्यंत धीमी रही।
7. बुनियादी अवसंरचना (Infrastructure)
ब्रिटिश काल में रेलवे, डाक-तार, बंदरगाह जैसी अवसंरचना का विकास हुआ, किंतु यह केवल प्रशासनिक एवं व्यापारिक स्वार्थ के लिए था। रेलवे की शुरुआत 1853 में बंबई-ठाणे के बीच हुई। इनका निर्माण भारतीय करदाताओं के धन से हुआ, जबकि लाभ ब्रिटिश पूँजीपतियों को मिला।
त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ
तालिका 1: ब्रिटिश काल में भारतीय अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ
क्षेत्र
स्थिति
कृषि
72% जनसंख्या निर्भर, कम उत्पादकता
उद्योग
हस्तशिल्प का पतन, भारी उद्योगों का अभाव
व्यापार
कच्चे माल का निर्यात, तैयार माल का आयात
जनसंख्या
1921 तक स्थिर, फिर तीव्र वृद्धि
अवसंरचना
केवल ब्रिटिश स्वार्थ के लिए विकसित
तालिका 2: भू-राजस्व व्यवस्थाएँ
व्यवस्था
क्षेत्र
राजस्व वसूली
जमींदारी
बंगाल, बिहार
जमींदार द्वारा
महालवाड़ी
उत्तर-पश्चिम भारत
गाँव (महल) द्वारा
रैयतवाड़ी
दक्षिणी भारत
सीधे किसान से
तालिका 3: जनगणना 1921 का महत्व
बिंदु
विवरण
पहली जनगणना
1881
1921 तक
जनसंख्या वृद्धि स्थिर/ऋणात्मक
1921 के बाद
तीव्र जनसंख्या वृद्धि
1921 कहलाता है
बड़ा विराम (Great Divide)
माइंड मैप
graph TD
A["स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था"] --> B["कृषि: ठहरी हुई, 72% निर्भरता"]
A --> C["उद्योग: हस्तशिल्प पतन, भारी उद्योग अभाव"]
A --> D["विदेशी व्यापार: कच्चे माल का निर्यातक"]
A --> E["जनसंख्या: 1921 के बाद तीव्र वृद्धि"]
A --> F["अवसंरचना: ब्रिटिश स्वार्थ हेतु"]
B --> G["जमींदारी, महालवाड़ी, रैयतवाड़ी"]
C --> H["डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन"]
E --> I["बड़ा विराम 1921"]
महत्वपूर्ण आरेख (SVG)
सामान्य गलतियाँ
1921 के महत्व को भूल जाना: 1921 'बड़ा विराम' (Great Divide) है, जिसके बाद भारत में जनसंख्या तेजी से बढ़ने लगी।
भू-राजस्व व्यवस्थाओं का क्षेत्र भ्रम: जमींदारी बंगाल/बिहार, महालवाड़ी उत्तर-पश्चिम, रैयतवाड़ी दक्षिण से जोड़ना याद रखें।
कृषि में रोजगार और आय के हिस्से में भ्रम: कृषि में रोजगार का हिस्सा ~72% था, जबकि राष्ट्रीय आय में ~50%।
व्यापार संतुलन की गलत व्याख्या: व्यापार शेष धनात्मक था (निर्यात > आयात), किंतु यह आधिक्य भारत के विकास में नहीं, ब्रिटेन को हस्तांतरित होता था।
पहली जनगणना का वर्ष भूलना: पहली जनगणना 1881 में हुई थी।
रेलवे की शुरुआत का वर्ष: भारत में पहली रेल 1853 में बंबई-ठाणे के बीच चली।
उद्योगों की स्थिति का अति सरलीकरण: सभी उद्योग नष्ट नहीं हुए; कपड़ा, चीनी, जूट जैसे उद्योगों का विस्तार हुआ था।
परीक्षा युक्तियाँ
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताओं को पाँच बिंदुओं में लिखें।
तीन भू-राजस्व व्यवस्थाओं की तुलनात्मक तालिका बनाने का अभ्यास करें।
कृषि के पतन के कारणों (जमींदारी, नकदी फसलों का दबाव, अकाल) को उदाहरण सहित समझाएँ।
हस्तशिल्प के पतन के कारण (डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन, विदेशी प्रतिस्पर्धा) पर जोर दें।
जनसंख्या के जनसांख्यिकीय स्वरूप में 1921 के महत्व पर प्रकाश डालें।
विदेशी व्यापार की संरचना (कच्चा माल निर्यात, तैयार माल आयात) को स्पष्ट करें।
ब्रिटिश अवसंरचना विकास के पक्ष-विपक्ष का तर्कसंगत विश्लेषण लिखें।
निष्कर्ष
ब्रिटिश शासन के अंत तक भारतीय अर्थव्यवस्था ठहरी हुई, कृषि प्रधान एवं पिछड़ी हुई थी। कृषि का पतन, हस्तशिल्प का विनाश, विदेशी व्यापार की शोषणकारी संरचना तथा आधुनिक अवसंरचना का अभाव इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं। 1921 के बाद तीव्र होती जनसंख्या वृद्धि ने दबाव और बढ़ाया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश को इन समस्याओं से निपटते हुए नियोजित विकास की ओर बढ़ना था। यह अध्याय अगले अध्याय (भारतीय अर्थव्यवस्था 1950-1990) की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करता है।