आर्थिक क्रियाओं को उनकी प्रकृति के आधार पर चार मुख्य क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है — प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक और चतुर्थ। प्राथमिक क्रियाएँ वे क्रियाएँ हैं जो प्राकृतिक संसाधनों के सीधे दोहन से संबंधित होती हैं, जैसे कृषि, पशुपालन, वानिकी, मत्स्यन और खनन। ये क्रियाएँ धरती से सीधे उत्पाद प्राप्त करती हैं और इन्हें 'सकल प्राथमिक उत्पादन' के रूप में देखा जा सकता है। इन क्रियाओं में लगे लोग सीधे प्रकृति पर निर्भर होते हैं। विकासशील देशों में प्राथमिक क्षेत्र में कार्यरत जनसंख्या का प्रतिशत अधिक है। प्राथमिक क्रियाओं का महत्व इस बात में है कि ये मानव जीवन के लिए आधारभूत आवश्यकताएँ — भोजन, कच्चा माल और ईंधन — प्रदान करती हैं।
निर्वाह कृषि वह कृषि है जिसमें किसान केवल अपनी एवं अपने परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए फसलें उगाता है, बाजार के लिए नहीं। यह मुख्यतः विकासशील एवं अविकसित क्षेत्रों में पाई जाती है। इसकी विशेषताएँ हैं — छोटे भूखंड, सरल औजार, परम्परागत तकनीक और सीमित अधिशेष। निर्वाह कृषि के दो रूप हैं — आदिम निर्वाह कृषि (Primitive Subsistence Farming) और गहन निर्वाह कृषि (Intensive Subsistence Farming)।
आदिम निर्वाह कृषि में कृषक अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्थानांतरशील कृषि करता है। इसे अमेजन बेसिन में स्लेश एंड बर्न या 'झूम' कृषि, मध्य अफ्रीका में 'शिफ्टिंग कल्टीवेशन', दक्षिण-पूर्व एशिया में 'लादांग' कहा जाता है। भारत में इसे झूमिंग कहा जाता है। इस विधि में वनों को काटकर जलाया जाता है और राख में फसल उगाई जाती है। गहन निर्वाह कृषि उच्च जनसंख्या घनत्व वाले मानसूनी एशिया के क्षेत्रों (भारत, चीन, जापान, इंडोनेशिया) में प्रचलित है, जहाँ छोटे भूखंडों पर अधिक श्रम लगाकर प्रति इकाई क्षेत्रफल से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जाता है। इसका मुख्य आधार चावल है।
वाणिज्यिक कृषि में फसलें बाजार में बेचने के उद्देश्य से उगाई जाती हैं। इसके प्रमुख प्रकार हैं: - वाणिज्यिक अनाज कृषि: गेहूँ, मक्का जैसी अनाजों की विशाल पैमाने पर खेती — संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना में। - मिश्रित कृषि (Mixed Farming): एक ही फार्म पर फसल उत्पादन एवं पशुपालन दोनों — उत्तर-पश्चिमी यूरोप, पूर्वी उत्तर अमेरिका में। - वृक्षारोपण कृषि (Plantation Agriculture): चाय, कॉफी, रबड़, केला जैसी नकदी फसलों की बड़े फार्मों पर खेती — भारत, श्रीलंका, ब्राजील, मलेशिया में। यह एकमात्र फसल पर आधारित, पूँजी एवं श्रम प्रधान कृषि है। - दुग्ध कृषि (Dairy Farming): दूध एवं दुग्ध उत्पादों हेतु पशुपालन — डेनमार्क, न्यूजीलैंड, नीदरलैंड में। - मेडीटरेनियन कृषि: जैतून, अंगूर, साइट्रस फल — भूमध्य सागर तटीय क्षेत्रों में। - भूमध्यवर्ती/बागवानी कृषि (Horticulture): फल, सब्जियाँ एवं फूल — कैलिफोर्निया, भूमध्यवर्ती क्षेत्रों में।
पशुपालन प्राथमिक क्रियाओं का महत्वपूर्ण अंग है। विश्व के शुष्क एवं अर्धशुष्क घास क्षेत्रों में स्थानांतरशील पशुचारण (Transhumance/Shifting Cultivation of Livestock) प्रचलित है। स्थानांतरशील पशुपालक ऋतु परिवर्तन के साथ अपने पशुओं के साथ चारागाहों की तलाश में स्थान बदलते हैं। इन्हें अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न नामों से जाना जाता है — सहारा के बद्दू, मध्य एशिया के कज़ाक, आर्कटिक के लैपलैंडर्स (सामी), स्विट्जरलैंड के ट्रांसह्यूमेंस चरवाहे, अफ्रीका के मासाई। वाणिज्यिक पशुपालन में पशुओं को बाजार हेतु पाला जाता है, जैसे न्यूजीलैंड एवं आस्ट्रेलिया में भेड़ पालन (ऊन एवं मांस), संयुक्त राज्य अमेरिका एवं अर्जेंटीना में गो-पालन। न्यूजीलैंड विश्व का सबसे बड़ा मांस एवं दुग्ध उत्पाद निर्यातक देश है।
मत्स्यन प्राथमिक क्रिया है जिसमें मछली एवं अन्य जलीय जीव पकड़े जाते हैं। समुद्री मत्स्यन मुख्यतः महाद्वीपीय उथले शेल्फ क्षेत्रों में होता है, जहाँ प्लवक की बहुलता होती है। विश्व के प्रमुख मत्स्यन क्षेत्र हैं — उत्तर-पश्चिम प्रशांत महासागर (जापान, कोरिया के तट), उत्तर-पूर्व अटलांटिक (नॉर्वे, ब्रिटेन), भूमध्य सागर, कैलिफोर्निया तट। मछली पकड़ने की विधियाँ — हुक और लाइन (ट्रॉलिंग), जाल लगाना (ड्रिफ्ट नेट), कोंटीबाज़ी आदि हैं। अधिक पकड़ के कारण कुछ क्षेत्रों में मछली के स्टॉक में कमी आई है। जलकृषि (Aquaculture) अर्थात मत्स्य एवं जलीय पादपों का नियंत्रित पालन आधुनिक मत्स्यन का महत्वपूर्ण रूप है।
खनन पृथ्वी की पपड़ी से खनिजों का निष्कर्षण है। खनिजों को दो मुख्य श्रेणियों में बाँटा गया है — धात्विक खनिज (लौह अयस्क, ताँबा, सोना) और अधात्विक खनिज (कोयला, पेट्रोलियम, चूना पत्थर)। खनन की विधियाँ — खुले गड्ढे में खनन, भूमिगत खनन और अपवाहन विधि। खनन उद्योग बड़े पैमाने पर रोजगार प्रदान करता है। मुख्य खनन क्षेत्रों में रूहर (जर्मनी), अपलाचियन (अमेरिका), दक्षिण अफ्रीका (सोना) शामिल हैं। खनिजों का आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान है, किंतु अति दोहन से पर्यावरणीय ह्रास होता है।
| क्रिया | विवरण | प्रमुख क्षेत्र |
|---|---|---|
| निर्वाह कृषि | परिवार की आवश्यकता हेतु | एशिया, अफ्रीका |
| वाणिज्यिक कृषि | बाजार हेतु उत्पादन | यूरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया |
| पशुपालन | पशुधन पालन | न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया |
| मत्स्यन | मछली पकड़ना | जापान, नॉर्वे |
| खनन | खनिज निष्कर्षण | दक्षिण अफ्रीका, रूहर |
| क्षेत्र | स्थानांतरशील कृषि का नाम |
|---|---|
| अमेजन बेसिन | स्लेश एंड बर्न |
| भारत | झूम |
| दक्षिण-पूर्व एशिया | लादांग |
| मध्य अफ्रीका | शिफ्टिंग कल्टीवेशन |
| प्रकार | मुख्य फसल/उत्पाद | प्रमुख क्षेत्र |
|---|---|---|
| वाणिज्यिक अनाज | गेहूँ, मक्का | अमेरिका, कनाडा |
| वृक्षारोपण | चाय, कॉफी, रबड़ | भारत, ब्राजील |
| दुग्ध कृषि | दूध, मक्खन | डेनमार्क, न्यूजीलैंड |
| मेडीटरेनियन | जैतून, अंगूर | भूमध्य सागर तट |
प्राथमिक क्रियाएँ मानव आर्थिक गतिविधियों की आधारभूत सीढ़ी हैं, जो प्रकृति के संसाधनों से सीधे जुड़ी होती हैं। कृषि, पशुपालन, मत्स्यन और खनन न केवल जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी करते हैं, बल्कि द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों के लिए कच्चा माल भी उपलब्ध कराते हैं। निर्वाह से वाणिज्यिक कृषि की ओर संक्रमण आर्थिक विकास का सूचक है। विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में इन क्रियाओं के भिन्न-भिन्न स्वरूप उनके पर्यावरण, जलवायु और तकनीकी विकास को दर्शाते हैं। प्राथमिक क्रियाओं का सतत एवं वैज्ञानिक प्रबंधन भविष्य की खाद्य एवं संसाधन सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।