भूमि मानव के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, क्योंकि भारत की बड़ी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। भूसंसाधन का अध्ययन भूमि उपयोग, भूमि क्षरण, भूमि सुधार एवं कृषि से संबंधित है। भारत में कुल भौगोलिक क्षेत्र लगभग 3.28 मिलियन वर्ग किमी है, जिसमें से लगभग 51 प्रतिशत पर खेती होती है। कृषि भारत की आर्थिक गतिविधि का प्रमुख अंग है, जो सकल घरेलू उत्पाद में महत्वपूर्ण योगदान देती है तथा सर्वाधिक रोजगार प्रदान करती है। भारत में कृषि मुख्यतः मानसून पर निर्भर है, जिसे 'मानसून का जुआ' कहा जाता है।
भूमि उपयोग को विभिन्न श्रेणियों में बाँटा जाता है: - शुद्ध बोया गया क्षेत्र: वह भूमि जिस पर वर्ष भर में फसलें बोई जाती हैं। - वन क्षेत्र: वनों से आच्छादित भूमि। - परती भूमि: वह भूमि जो कुछ समय के लिए खेती से विराम लेती है। - चरागाह एवं कृषि-विहीन भूमि। - गैर-कृषि भूमि: बस्तियों, उद्योगों, सड़कों आदि में प्रयुक्त भूमि। - अन्य बंजर एवं अकृषक भूमि।
भारत में भूमि उपयोग पैटर्न क्षेत्रीय रूप से भिन्न है। कृषि योग्य भूमि की दृष्टि से भारत विश्व के प्रमुख देशों में है, किंतु प्रति व्यक्ति कृषि योग्य भूमि लगातार घट रही है।
भूमि क्षरण से आशय भूमि की उर्वरता एवं उत्पादकता में ह्रास से है। भूमि क्षरण के प्रमुख कारण हैं: - वनों की अंधाधुंध कटाई। - अतिचारण (पशुओं द्वारा अधिक चराई)। - असुरक्षित कृषि पद्धतियाँ (ढलानों पर खेती)। - रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का अधिक उपयोग। - अत्यधिक सिंचाई से लवणीकरण एवं जलभराव। - पवन एवं जल अपरदन।
भूमि संरक्षण के उपाय: वृक्षारोपण, पट्टी कृषि (Contour Ploughing), वर्मी कम्पोस्ट, संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक कृषि, बाँध निर्माण, समोच्च बाँध तथा परती भूमि का उचित प्रबंधन।
भारत में निम्न प्रकार की कृषि की जाती है: - निर्वाह कृषि: किसान अपनी आवश्यकताओं के लिए फसलें उगाते हैं। - वाणिज्यिक कृषि: फसलें बाजार हेतु उगाई जाती हैं। - गहन कृषि: छोटे भूखंड पर अधिक श्रम एवं सिंचाई से अधिक उत्पादन। - वृक्षारोपण कृषि: चाय, कॉफी, रबड़ जैसी नकदी फसलें। - सहकारी कृषि: किसान सहकारी समितियों द्वारा खेती एवं विपणन। - सूखी खेती (Dry Farming): कम वर्षा वाले क्षेत्रों में।
भारत की प्रमुख फसलें: - खाद्यान्न फसलें: चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, मक्का, दालें। - नकदी फसलें: कपास, गन्ना, जूट, तिलहन। - पेय एवं अन्य: चाय, कॉफी, मसाले, रबड़।
चावल: भारत का प्रमुख खाद्यान्न; मानसूनी क्षेत्रों (पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश) में उगाया जाता है। पश्चिम बंगाल भारत का सबसे बड़ा चावल उत्पादक राज्य है। चावल को 'खरीफ फसल' कहा जाता है।
गेहूँ: उत्तर-पश्चिम भारत (पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश) की प्रमुख फसल; रबी फसल है। उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा गेहूँ उत्पादक राज्य है।
कपास: महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना में; काली मृदा (रेगुर) में उगती है। 'सफेद सोना' कहलाती है।
गन्ना: उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र में; चीनी उद्योग का कच्चा माल।
भारत को कृषि जलवायु के आधार पर कई क्षेत्रों में बाँटा गया है — चावल-गेहूँ क्षेत्र, कपास क्षेत्र, बागवानी क्षेत्र, मिश्रित कृषि क्षेत्र, शुष्क कृषि क्षेत्र। ये क्षेत्र जलवायु, मृदा एवं सिंचाई की उपलब्धता से निर्धारित होते हैं। भारत सरकार ने कृषि जलवायु क्षेत्रों के आधार पर 'कृषि जलवायु क्षेत्रीय नियोजन' (Agro-climatic Regional Planning) की अवधारणा अपनाई है।
भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याएँ हैं — छोटे एवं विखंडित भूखंड, मानसून पर निर्भरता, सिंचाई सुविधाओं की कमी, कम उत्पादकता, कृषि ऋण एवं विपणन की समस्या, बिचौलियों का शोषण, भूमि क्षरण तथा कृषकों की आय में अस्थिरता। कृषि सुधारों में हरित क्रांति, सिंचाई का विस्तार, उन्नत बीज, उर्वरक, कृषि विपणन सुधार (e-NAM), फसल बीमा योजना तथा किसान क्रेडिट कार्ड प्रमुख हैं। हरित क्रांति (1960 के दशक) से भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हुआ।
| श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| शुद्ध बोया गया क्षेत्र | फसलों के अधीन भूमि |
| वन क्षेत्र | वनों से आच्छादित |
| परती भूमि | अस्थायी विराम |
| गैर-कृषि भूमि | बस्तियाँ, उद्योग |
| फसल | ऋतु | सबसे बड़ा उत्पादक राज्य |
|---|---|---|
| चावल | खरीफ | पश्चिम बंगाल |
| गेहूँ | रबी | उत्तर प्रदेश |
| कपास | खरीफ | महाराष्ट्र |
| गन्ना | — | उत्तर प्रदेश |
| कारण | संरक्षण उपाय |
|---|---|
| वन कटाई | वृक्षारोपण |
| अतिचारण | नियंत्रित चराई |
| रासायनिक उर्वरक | जैविक कृषि |
| अपरदन | पट्टी कृषि, बाँध |
भूमि एवं कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। भूमि उपयोग का संतुलित प्रबंधन तथा भूमि क्षरण से सुरक्षा देश की खाद्य सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। भारत में चावल, गेहूँ, कपास, गन्ना जैसी प्रमुख फसलें विभिन्न जलवायु एवं मृदा क्षेत्रों में उगाई जाती हैं। हरित क्रांति से भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर हुआ, किंतु छोटे भूखंड, मानसून निर्भरता एवं कृषि विपणन की समस्याएँ अभी भी विद्यमान हैं। सतत कृषि, जैविक खेती एवं भूमि संरक्षण ही भारतीय कृषि का उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करेंगे।