विजयनगर साम्राज्य भारतीय इतिहास का एक महान और शक्तिशाली साम्राज्य था, जो लगभग 1336 से 1646 तक अस्तित्व में रहा। इसकी स्थापना हरिहर और बुक्का नामक दो भाइयों ने की थी, जो संगम वंश के थे। साम्राज्य की राजधानी विजयनगर (वर्तमान हम्पी, कर्नाटक) थी। विजयनगर का अर्थ 'विजय का नगर' होता है। यह साम्राज्य तुंगभद्रा नदी के तट पर विकसित हुआ। विजयनगर साम्राज्य ने दक्कन क्षेत्र के मुस्लिम सल्तनतों, विशेषकर बहमनी साम्राज्य से लगातार युद्ध लड़े। साम्राज्य का विस्तार दक्षिण में केरल तक और पूर्व में तमिलनाडु तक हुआ। विजयनगर शहर अपनी समृद्धि, विशाल मंदिरों और नगर नियोजन के लिए प्रसिद्ध था। इतालवी यात्री निकोलो कोंटी और पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पेस ने विजयनगर की महिमा का वर्णन किया है।
चौदहवीं शताब्दी के प्रारंभ में दक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत के आक्रमणों के कारण राजनीतिक अस्थिरता फैली हुई थी। इसी समय 1336 में हरिहर और बुक्का ने विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की। विद्वानों का मानना है कि ये दोनों भाई विरुपाक्ष (शिव) के भक्त थे। हंपी के आसपास विरुपाक्ष का मंदिर आज भी स्थित है। संगम वंश के बाद सुलुव वंश और फिर तुलुव वंश का शासन आया। कृष्णदेव राय तुलुव वंश का सबसे महान शासक था, जिसने 1509 से 1529 तक शासन किया। कृष्णदेव राय के शासनकाल में विजयनगर साम्राज्य अपनी चरम सीमा पर पहुँचा। उनके बाद अच्युतदेव राय और फिर सदाशिव राय शासक हुए। साम्राज्य के अंतिम महान शासक रामराय थे, जिनकी हार तालीकोटा के युद्ध (1565) में हुई। इस युद्ध के बाद विजयनगर साम्राज्य का पतन शुरू हुआ।
विजयनगर की खोज का श्रेय कर्नल कॉलिन मैकेंजी को जाता है, जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सर्वेक्षक थे। उन्होंने 1800 में हंपी के खंडहरों का प्रथम सर्वेक्षण किया। मैकेंजी के बाद अलेक्जेंडर ग्रीनलॉ (एलेक्जेंडर ग्रीनल) ने वर्ष 1856 में हंपी के विस्तृत अध्ययन के आधार पर 'हंपी के खंडहर' नामक पुस्तक लिखी। बीसवीं शताब्दी में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने हंपी की खुदाई और संरक्षण का कार्य किया। हंपी आज यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल है। इन अभियानों से हमें विजयनगर की वास्तुकला, नगर नियोजन और जीवन के बारे में विस्तृत जानकारी मिली। विदेशी यात्रियों के विवरण, जैसे डोमिंगो पेस का, भी नगर के पुनर्निर्माण में सहायक रहे। पेस ने विजयनगर को 'रोम से बड़ा' और 'जो पृथ्वी पर सबसे बेहतर प्रावधानित नगर है' बताया।
विजयनगर नगर की संरचना में अनेक भाग थे। सबसे महत्वपूर्ण 'साम्राज्य का केंद्र' था, जिसमें राजमहल, दरबार और प्रशासनिक भवन स्थित थे। नगर के मध्य में तुंगभद्रा नदी बहती थी। नगर को 'स्वर्ण कुमारी' और 'हंपी' जैसे क्षेत्रों में विभाजित किया गया था। डोमिंगो पेस के अनुसार नगर की परिधि लगभग 60 मील थी। नगर में मंदिर, बाजार, महल और निवास क्षेत्र स्थित थे। कृष्णदेव राय के शासनकाल में नगर में अनेक नए भवन और मंदिर बने। नगर के बाजारों में विभिन्न वस्तुएँ बिकती थीं, जैसे मोती, गहने, कपड़े और मसाले। नगर की सड़कों और चौराहों का वर्णन यात्रियों ने किया है। विजयनगर नगर की संरचना ने राज्य की शक्ति और समृद्धि को प्रतिबिंबित किया। राजाओं ने साम्राज्य की शक्ति को प्रदर्शित करने के लिए शानदार इमारतें और मंदिर बनवाए।
विजयनगर स्थापत्य कला की विशेषता 'उत्कीर्ण चट्टानों पर बनी इमारतें' और विशाल मंदिर हैं। मंदिरों में 'अम्मान मंदिर' (देवी का मंदिर), 'गोपुरम' (ऊँचे द्वार), 'कल्याण मंडप' और 'सौवर्ण मंडप' जैसी संरचनाएँ बनाई गईं। सबसे प्रसिद्ध विरुपाक्ष मंदिर है, जो शिव को समर्पित है और जहाँ से नगर का सुंदर दृश्य दिखता है। विरुपाक्ष मंदिर में एक 'मुख्य मंदिर' और एक 'अम्मान मंदिर' है, जिनके बीच 'कोनेरी गोपुरम' (ऊँचा गोपुरम) है। इन दोनों मंदिरों को जोड़ने वाले गलियारे में चित्रित किए गए दृश्य मिलते हैं। कृष्णदेव राय द्वारा निर्मित कृष्ण मंदिर और विठ्ठल मंदिर भी प्रसिद्ध हैं। विठ्ठल मंदिर में 'पत्थर का रथ' और 'संगीत के स्तंभ' स्थित हैं। इन स्तंभों को बजाने पर संगीत जैसी ध्वनि निकलती है। विजयनगर की मूर्तिकला में देवताओं, पशुओं और मानवों की आकृतियाँ बनाई गईं।
विजयनगर साम्राज्य का प्रशासन विकसित था। साम्राज्य में 'नायक' (सैन्य नेता) और 'अमरनायक' (क्षेत्रीय शासक) प्रणाली प्रचलित थी। अमरनायकों को राज्य द्वारा भूमि और कर वसूलने का अधिकार दिया जाता था। वे अपनी सेना रखते थे और राज्य को कर देते थे। साम्राज्य में 'मंडल', 'नाडु' और 'ग्राम' जैसे प्रशासनिक विभाग थे। ग्राम पंचायतों के माध्यम से स्थानीय प्रशासन संचालित होता था। विजयनगर में सिंचाई के लिए तालाबों और नहरों की व्यवस्था थी। किसान चावल, गेहूँ, कपास, मिर्च, हल्दी जैसी फसलें उगाते थे। राज्य में विदेशी व्यापार को प्रोत्साहन मिला। मुख्य बंदरगाह कृष्णापट्टनम, कालीकट और क्विलोन थे। व्यापार में घोड़ों का आयात महत्वपूर्ण था। विजयनगर साम्राज्य ने मराठा-सरदारों के संदर्भ में भी 'नायक' व्यवस्था का विस्तार किया।
विजयनगर साम्राज्य में हिंदू धर्म का बोलबाला था, परंतु धार्मिक सहिष्णुता भी थी। राज्य के प्रमुख देवता विरुपाक्ष (शिव) थे। इसके अलावा विष्णु, कृष्ण, हनुमान और लक्ष्मी की पूजा होती थी। मंदिरों में दैनिक पूजा और उत्सवों का आयोजन होता था। राज्य में स्त्रियाँ विभिन्न व्यवसायों में संलग्न थीं। 'देवदासी' (मंदिर की स्त्रियाँ) प्रथा का उल्लेख मिलता है। समाज में जाति व्यवस्था थी, परंतु मंदिरों में सभी जातियों के लोग पूजा कर सकते थे। विजयनगर नगर में अनेक सांस्कृतिक गतिविधियाँ होती थीं। संगीत, नृत्य और काव्य का विकास हुआ। कृष्णदेव राय स्वयं 'अमुक्तमाल्यदा' नामक तेलुगु कविता के रचयिता थे। राज्य के दरबार में अष्टदिग्गज (आठ महान कवि) कहे जाने वाले विद्वान रहते थे, जिनमें तेनालीराम प्रसिद्ध थे। विजयनगर की संस्कृति ने भारतीय कला और साहित्य को समृद्ध किया।
वर्ष 1565 में विजयनगर साम्राज्य और दक्कन के मुस्लिम सल्तनतों (अहमदनगर, बीजापुर, गोलकोंडा, बीदर, बरार) के संयुक्त गठबंधन के बीच तालीकोटा का युद्ध हुआ। इस युद्ध में विजयनगर की हार हुई। विजयनगर के शासक रामराय इस युद्ध में मारे गए। युद्ध के बाद विजयनगर शहर को लूटा गया और नगर का विनाश हुआ। इस घटना को कभी-कभी 'हंपी का पतन' भी कहा जाता है। तालीकोटा युद्ध के बाद साम्राज्य पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुआ, परंतु राजधानी हंपी का विनाश हो गया। बाद के शासकों ने राजधानी को पेनुकोंडा और फिर चंद्रगिरी में स्थानांतरित किया। अंततः 1646 में विजयनगर साम्राज्य का अंत हुआ। विजयनगर का पतन दक्कन के सल्तनतों के उदय के साथ हुआ। विजयनगर साम्राज्य की विरासत हंपी के खंडहरों के रूप में आज भी विद्यमान है।
| वंश | शासक | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|
| संगम | हरिहर और बुक्का | 1336 में साम्राज्य की स्थापना |
| सुलुव | सलुव नरसिंह | संगम के बाद सत्ता |
| तुलुव | कृष्णदेव राय | 1509-1529, साम्राज्य की चरम सीमा |
| अरावीडु | रामराय | तालीकोटा युद्ध 1565 में हार |
| मंदिर | समर्पित | विशेषता |
|---|---|---|
| विरुपाक्ष मंदिर | शिव | कोनेरी गोपुरम, नगर दृश्य |
| विठ्ठल मंदिर | विष्णु | पत्थर का रथ, संगीत के स्तंभ |
| कृष्ण मंदिर | कृष्ण | कृष्णदेव राय द्वारा निर्मित |
विजयनगर साम्राज्य दक्षिण भारतीय इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। इसकी राजधानी विजयनगर (हंपी) अपनी विशाल वास्तुकला, सुनियोजित नगर संरचना और समृद्ध संस्कृति के लिए प्रसिद्ध थी। कृष्णदेव राय के शासनकाल में साम्राज्य अपनी चरम सीमा पर पहुँचा। विरुपाक्ष और विठ्ठल मंदिर जैसी संरचनाएँ आज भी उस समय की कलात्मक प्रतिभा का प्रमाण हैं। तालीकोटा का युद्ध और उसके बाद का पतन साम्राज्य के लिए घातक साबित हुआ, फिर भी विजयनगर की विरासत हंपी के खंडहरों के रूप में सुरक्षित है। इस अध्याय से हमें यह शिक्षा मिलती है कि शक्तिशाली साम्राज्य भी आंतरिक कमजोरियों और बाहरी आक्रमणों से पतन का सामना कर सकते हैं, परंतु उनकी सांस्कृतिक उपलब्धियाँ सदियों तक जीवित रहती हैं।