हड़प्पा सभ्यता भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन नगरीय सभ्यताओं में से एक है, जो लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व तक फली-फूली। इस अध्याय में हम जानेंगे कि पुरातत्ववेत्ता किस प्रकार हड़प्पा सभ्यता का अध्ययन करते हैं, कैसे वे मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, धोलावीरा जैसे स्थलों की खुदाई करके अतीत के बारे में जानकारी जुटाते हैं। हड़प्पा सभ्यता की खोज का श्रेय जॉन मार्शल, दयाराम साहनी, राखलदास बैनर्जी और जॉन मैक्के जैसे विद्वानों को जाता है। इस सभ्यता को सिंधु घाटी सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता और सिंधु-सरस्वती सभ्यता जैसे कई नामों से जाना जाता है। यह सभ्यता सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे फैली हुई थी और इसका विस्तार पूर्व में आलमगीरपुर से लेकर पश्चिम में सुतकागंदोर तक तथा उत्तर में मांडा से लेकर दक्षिण में धोलावीरा तक था। यह सभ्यता अपनी सुनियोजित नगर योजना, उत्कृष्ट निकासी प्रणाली, मानकीकृत ईंटों और अद्वितीय लिपि के लिए विश्वविख्यात है।
हड़प्पा सभ्यता की खोज का सिलसिला उन्नीसवीं सदी के अंत में शुरू हुआ। वर्ष 1875 में सिक्कों के संग्रहकर्ता अलेक्जेंडर कनिंघम ने हड़प्पा से एक मुहर प्राप्त की, जो उनके लिए एक रहस्य बन गई। वर्ष 1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा का पहला सर्वेक्षण किया और 1922 से 1923 के मध्य राखलदास बैनर्जी ने मोहनजोदड़ो की खोज की। जॉन मार्शल ने इस खोज को सर्वप्रथम विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया और इसे 'सिंधु सभ्यता' का नाम दिया। वर्ष 1924 में जॉन मार्शल ने 'इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़' में इस खोज की घोषणा की। इसके बाद जॉन मैक्के ने 1927 में मोहनजोदड़ो में खुदाई का कार्य किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद एस.आर. राव ने लोथल (गुजरात) में खुदाई की, जहाँ बंदरगाह और नावों के लिए घाट मिले। राव ने ही पहली बार सुझाव दिया कि हड़प्पा लिपि दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी। आर.एस. बिष्ट ने 1990 में कच्छ में धोलावीरा की खोज की, जो इस सभ्यता का सबसे दक्षिणी और सबसे बड़ा स्थल है। धोलावीरा के बारे में उल्लेखनीय है कि वहाँ जल संग्रहण की अद्भुत प्रणाली विकसित की गई थी। आर.एस. बिष्ट ने धोलावीरा में एक संरचना का उत्खनन किया, जिसे उन्होंने 'चौखंभ' कहा।
हड़प्पा सभ्यता की सबसे विशिष्ट विशेषता उसकी सुनियोजित नगर योजना थी। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे प्रमुख नगर दो भागों में विभाजित थे। पश्चिमी भाग में स्थित दुर्ग या गढ़ी (Citadel) ऊँचे चबूतरे पर बना था, जहाँ शासक वर्ग या प्रशासन के भवन स्थित थे। पूर्वी भाग निचला नगर (Lower Town) कहलाता था, जहाँ सामान्य नागरिक निवास करते थे। नगर की गलियाँ एक-दूसरे को समकोण (90 अंश) पर काटती थीं, जिससे सड़कें बिल्कुल सीधी बनती थीं। घरों का निर्माण मानकीकृत पक्की ईंटों से किया जाता था, जिनका आकार 1:2:4 के अनुपात में होता था। घरों में आंगन, रसोई, कुएँ और स्नानागार होते थे। सबसे महत्वपूर्ण विशेषता नालियों की व्यवस्था थी। हर घर का अपना एक स्नान कक्ष था जो नाली से जुड़ा था। नालियाँ टेराकोटा पाइपों से बनी होती थीं और प्रत्येक नाले पर टेराकोटा या पत्थर के ढक्कन होते थे। यह स्वच्छता और नगर प्रबंधन की अनूठी व्यवस्था थी।
मोहनजोदड़ो (जिसका अर्थ 'मृतकों का टीला') में कई महत्वपूर्ण संरचनाएँ पाई गई हैं। गढ़ी में स्थित महान स्नानागार (Great Bath) सबसे प्रसिद्ध है, जो एक विशाल स्नान टंकी है। यह 12 मीटर लंबा, 7 मीटर चौड़ा और 2.4 मीटर गहरा था। इसकी दीवारें पक्की ईंटों से बनी थीं और फर्श पर प्राकृतिक टार या बिटुमेन का लेप किया गया था ताकि पानी रिसाव न हो। महान स्नानागार के आसपास गलियारे और कमरे बने थे। अन्नागार (Granary) को विशाल संरचना माना गया है, जिसमें अनाज का भंडारण किया जाता था। पुरातत्ववेत्ता इस बात पर असहमत हैं कि अन्नागार में अनाज रखा जाता था या यह कोई और सार्वजनिक भवन था। इसी प्रकार एक अन्य संरचना को 'महान सभागृह' (Great Hall) कहा गया है। मोहनजोदड़ो में ही कांस्य में ढाली हुई 'नृत्य करती स्त्री' (Dancing Girl) की मूर्ति मिली है, जो इस सभ्यता की कलात्मक उपलब्धि का प्रतीक है। इसके अलावा यहाँ 'पशुपति मुहर' भी प्राप्त हुई, जिसमें एक पुरुष की आकृति सींगों वाले मुकुट के साथ दिखाई देती है और उसके चारों ओर हाथी, गैंडा, भैंसा तथा बाघ जैसे पशु हैं।
हड़प्पा सभ्यता का आर्थिक जीवन कृषि, पशुपालन, शिल्प उत्पादन और व्यापार पर आधारित था। किसान गेहूँ, जौ, चना, तिल, मटर तथा चावल (लोथल में) जैसी फसलें उगाते थे। वर्षा की कमी वाले क्षेत्रों में प्लेस्टोसीन नदियों और जल संग्रहण तंत्रों से सिंचाई की जाती थी। हड़प्पा के लोग बैलों, भेड़ों, बकरियों और सूअरों का पालन करते थे। हाथी और गैंडे का शिकार भी किया जाता था। शिल्प उत्पादन में पत्थर के औजार, मुहरें, मनके, बर्तन, ताँबे तथा कांसे के उपकरण और कपड़े बनाना शामिल था। मनके बनाने के लिए कार्नेलियन, जैस्पर, क्रिस्टल, क्वार्ट्ज और स्टीटाइट जैसे रत्न पत्थरों का उपयोग होता था। चन्हूदड़ो में मनके बनाने की कार्यशालाएँ मिली हैं। बलूचिस्तान के सुखतगेण्डोर और लोथल से लाजवर्द (लापिस लाजुली) प्राप्त हुआ है। हड़प्पा के लोग समुद्री और स्थल दोनों मार्गों से व्यापार करते थे। लोथल में नावों के लिए घाट मिला है, जो समुद्री व्यापार का प्रमाण है। व्यापार में माप-तौल के लिए चर्ट पत्थर के बाटों का उपयोग होता था, जो दो के गुणक में होते थे। ताँबा खनन के लिए राजस्थान में खेत्री और अफगानिस्तान के क्षेत्रों से लाया जाता था।
हड़प्पा समाज के बारे में हमें सीमित जानकारी है क्योंकि हड़प्पा लिपि अब तक पूर्ण रूप से पढ़ी नहीं जा सकी है। समाज में आर्थिक और सामाजिक असमानता के संकेत मिलते हैं, क्योंकि गढ़ी और निचले नगर का स्पष्ट विभाजन था। धन एवं संपत्ति का वितरण असमान था। मुहरों पर मातृदेवी या उपजाऊ धरती माता की पूजा के संकेत मिलते हैं। मुहरों पर यूनिकॉर्न (एक सींग वाला पशु) तथा अन्य पशुओं की आकृतियाँ मिलती हैं। कुछ विद्वान पशुपति मुहर को शिव का प्रारंभिक रूप मानते हैं, जबकि कुछ इसे कोई दूसरी आकृति मानते हैं। हड़प्पा के लोग दफनाने और कभी-कभी शवाधान (कब्रगाह) की रीति का पालन करते थे। हड़प्पा में एक शवाधान स्थल मिला है जहाँ ईंटों की कब्रें बनी थीं। हड़प्पा की महिलाएँ आभूषण पहनती थीं और श्रृंगार का उपयोग करती थीं। मोहनजोदड़ो से कांस्य की बनी नृत्य करती स्त्री की मूर्ति मिली है, जो समाज में महिलाओं की कलात्मक गतिविधियों का संकेत देती है।
हड़प्पा सभ्यता की लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है, इसलिए इसे 'अपठित लिपि' कहा जाता है। हड़प्पा लिपि के अधिकांश शिलालेख मुहरों पर उकेरे गए मिलते हैं। यह लिपि दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी, जैसा कि एस.आर. राव ने सुझाया। लिपि में लगभग 375 से 400 चिह्न पाए गए हैं, जिन्हें चित्रलिपि कहा जाता है। कुछ विद्वान इसे द्रविड़ परिवार से संबंधित मानते हैं, जबकि अन्य इसे आर्यभाषा से जोड़ते हैं। मुहरों पर लिखे लेखों में प्रायः नाम, पदवी या स्वामित्व की जानकारी हो सकती है। लिपि की कमी के कारण हड़प्पा के इतिहास का पुनर्निर्माण केवल पुरातात्त्विक साक्ष्यों पर निर्भर करता है। यही कारण है कि हड़प्पा के राजनीतिक ढाँचे, धर्म और समाज के बारे में निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते।
हड़प्पा सभ्यता लगभग 1900 ईसा पूर्व के आसपास पतन की ओर अग्रसर हुई। इसके पतन के कई कारण बताए जाते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि सरस्वती नदी के सूखने के कारण नगरों का अंत हुआ। अन्य विद्वान बाढ़, भूकंप, सिंचाई में अत्यधिक शोषण तथा जलवायु परिवर्तन को कारण मानते हैं। इसके अलावा व्यापार का कमजोर होना तथा राजनैतिक अस्थिरता भी पतन के कारण माने गए हैं। पतन की प्रक्रिया क्रमिक थी। बाद की अवधि में नगरों में भवन निर्माण बंद हो गया, शिल्प उत्पादन घट गया और लंबी दूरी का व्यापार समाप्त हो गया। सभ्यता की समाप्ति के बाद उपमहाद्वीप में एक साथ कई छोटी-छोटी स्थानीय संस्कृतियों का उदय हुआ। पतन के कारणों के बारे में आज भी विद्वानों में मतभेद है और यह शोध का विषय बना हुआ है।
| स्थल | स्थान | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| हड़प्पा | साहिवाल, पाकिस्तान | प्रथम खोज, शवाधान स्थल, अन्नागार |
| मोहनजोदड़ो | सिंध, पाकिस्तान | महान स्नानागार, नृत्य करती स्त्री, पशुपति मुहर |
| लोथल | गुजरात | बंदरगाह, नावों का घाट, चावल का प्रमाण |
| धोलावीरा | कच्छ, गुजरात | जल संग्रहण प्रणाली, तीन भागों में विभाजित नगर |
| चन्हूदड़ो | सिंध | मनकों की कार्यशाला, केवल ताँबा उपयोग |
| विद्वान | वर्ष | योगदान |
|---|---|---|
| अलेक्जेंडर कनिंघम | 1875 | हड़प्पा मुहर प्राप्त करना |
| दयाराम साहनी | 1921 | हड़प्पा की खोज |
| राखलदास बैनर्जी | 1922-23 | मोहनजोदड़ो की खोज |
| जॉन मार्शल | 1924 | सिंधु सभ्यता की घोषणा |
| एस.आर. राव | 1950 के दशक | लोथल की खुदाई, लिपि दाएँ से बाएँ का सुझाव |
| आर.एस. बिष्ट | 1990 | धोलावीरा की खोज |
हड़प्पा सभ्यता भारतीय इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। इसकी सुनियोजित नगर योजना, बेहतरीन निकासी व्यवस्था और अद्भुत शिल्प कौशल उस समय के लोगों की वैज्ञानिक और सामाजिक चेतना को दर्शाता है। यद्यपि हड़प्पा लिपि अपठित होने के कारण इसके राजनीतिक और धार्मिक जीवन के बारे में बहुत कुछ अनिश्चित है, फिर भी पुरातात्त्विक साक्ष्य हमें एक उन्नत नगरीय सभ्यता की झलक देते हैं। हड़प्पा के अध्ययन से यह शिक्षा मिलती है कि अतीत को समझने के लिए हमें केवल लिखित स्रोतों पर ही नहीं, बल्कि भौतिक अवशेषों के सूक्ष्म विश्लेषण पर भी निर्भर रहना पड़ता है। यह सभ्यता अपने पतन के बाद भी आधुनिक शहरी नियोजन, स्वच्छता और जल प्रबंधन के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई है।