यह अध्याय ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौरान भारतीय देहात (ग्रामीण क्षेत्रों) में हुए परिवर्तनों का अध्ययन करता है। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में राजस्व वसूली, भूमि व्यवस्था और कृषि के क्षेत्रों में हस्तक्षेप किया। इसके परिणामस्वरूप देहात में किसानों, ज़मींदारों और राज्य के बीच संबंधों में बड़े बदलाव आए। कंपनी ने बंगाल में 'स्थायी बंदोबस्त' (परमानेंट सेटलमेंट) और अन्य क्षेत्रों में विभिन्न राजस्व व्यवस्थाएँ लागू कीं। इस अध्याय में पॉटिंगर जैसे अधिकारियों के विवरण, जंगल कानून, किसान विद्रोह और देहात में आर्थिक परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है। ब्रिटिश राजस्व नीतियों ने देहात की सामाजिक और आर्थिक संरचना को मौलिक रूप से बदल दिया, जिससे किसानों की दुर्दशा बढ़ी और कई विद्रोह हुए।
वर्ष 1793 में बंगाल में लॉर्ड कॉर्नवालिस ने 'स्थायी बंदोबस्त' लागू किया। इस व्यवस्था के अनुसार ज़मींदारों को भूमि का स्थायी स्वामी बना दिया गया, और वे राज्य को एक निश्चित राशि 'मालगुज़ारी' देते थे। यह राशि स्थायी थी और इसे बदला नहीं जा सकता था। ज़मींदारों को किसानों से कर वसूलने का अधिकार मिला। इस व्यवस्था का उद्देश्य कंपनी को एक स्थिर और निश्चित आय सुनिश्चित करना था। परंतु इसका परिणाम यह हुआ कि ज़मींदार किसानों से अत्यधिक कर वसूलने लगे और किसानों की स्थिति दयनीय हो गई। जो ज़मींदार कर नहीं दे पाते थे, उनकी ज़मीन नीलाम हो जाती थी। इस व्यवस्था के कारण ज़मींदारों की शक्ति बढ़ी, परंतु किसानों की स्थिति खराब हुई। स्थायी बंदोबस्त को 'ज़मींदारी व्यवस्था' भी कहा जाता है।
मद्रास प्रांत और बॉम्बे प्रांत के कुछ हिस्सों में कंपनी ने 'रैयतवाड़ी' व्यवस्था लागू की। इस व्यवस्था में किसानों (रैयतों) को भूमि का सीधा स्वामी माना गया। किसान सीधे राज्य को कर देते थे, और उनके बीच ज़मींदार की मध्यस्थता नहीं थी। रैयतवाड़ी व्यवस्था को मुख्य रूप से थॉमस मुनरो ने लागू किया। इस व्यवस्था में भूमि का सर्वेक्षण किया जाता था और प्रत्येक भूखंड का अलग-अलग कर निर्धारित किया जाता था। कर की दर कभी-कभी बहुत अधिक होती थी, जिससे किसान कर्ज में डूब जाते थे। किसान समय पर कर नहीं चुका पाने पर अपनी ज़मीन खो देते थे। रैयतवाड़ी व्यवस्था का उद्देश्य भी कंपनी के लिए निश्चित आय सुनिश्चित करना था, परंतु इसने किसानों की दुर्दशा को बढ़ाया। बाद में इस व्यवस्था में संशोधन किए गए।
उत्तर-पश्चिमी प्रांतों (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और पंजाब में कंपनी ने 'महालवाड़ी' व्यवस्था लागू की। इस व्यवस्था में भूमि के राजस्व का निर्धारण गाँव या महाल के आधार पर किया जाता था। गाँव के समूह (महाल) को इकाई माना जाता था, और उसकी ओर से 'लंबरदार' (प्रतिनिधि) कर देता था। इस व्यवस्था में ज़मींदारों और किसानों दोनों की स्थिति निर्धारित की जाती थी। महालवाड़ी व्यवस्था में भूमि का सर्वेक्षण और बार-बार मूल्यांकन होता था, जिससे कर का निर्धारण सटीक होता था। परंतु इस व्यवस्था में भी कर की दर अधिक थी, और किसानों को संकट का सामना करना पड़ता था। महालवाड़ी व्यवस्था का विवरण कंपनी के अधिकारियों जैसे जॉन शोर और जॉन एलियस ने दिया। इन तीनों राजस्व व्यवस्थाओं ने मिलकर भारतीय देहात में बड़े बदलाव किए।
ब्रिटिश काल में जंगलों पर भी कंपनी का नियंत्रण स्थापित हुआ। सत्रहवीं शताब्दी के अंत में और अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में कंपनी ने जंगलों को अपने नियंत्रण में लिया। जंगलों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाए गए, जिससे आदिवासी और वनवासी लोगों की आजीविका प्रभावित हुई। जंगल कानूनों ने किसानों के साथ-साथ वनवासियों को भी अपनी ज़मीन से विस्थापित किया। किसानों को अपनी पारंपरिक भूमि से हटना पड़ा और उन्हें नई ज़मीन में बसाया गया। इस प्रक्रिया में कई किसान और आदिवासी विद्रोह करने लगे। कंपनी की नीतियों ने देहात में सामाजिक असमानता को बढ़ाया। जंगल कानूनों के कारण किसानों की कृषि भूमि सिकुड़ गई और खाद्यान्न की कमी हुई। इस अवधि में कई क्षेत्रों में अकाल पड़े, जिससे किसानों की दुर्दशा और बढ़ी।
ब्रिटिश राजस्व नीतियों के कारण किसानों में गहरा असंतोष पैदा हुआ, जिसके परिणामस्वरूप अनेक किसान विद्रोह हुए। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में बंगाल, बिहार, मद्रास और अन्य क्षेत्रों में किसान विद्रोह हुए। इन विद्रोहों में किसानों ने करों के विरुद्ध संघर्ष किया। कई विद्रोहों में आदिवासियों ने भी भाग लिया, जैसे संथाल विद्रोह (1855) और भील विद्रोह। ये विद्रोह स्थानीय होते थे और इनमें किसान अपनी शिकायतें दूर करने का प्रयास करते थे। कंपनी ने इन विद्रोहों को सैनिक बल से दबाया। फिर भी इन विद्रोहों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ असंतोष को दर्शाया। इतिहासकार इन विद्रोहों का अध्ययन 'सबाल्टर्न' (दमित वर्ग) के दृष्टिकोण से करते हैं, जिसमें आम किसानों की आवाज़ को महत्व दिया जाता है।
ब्रिटिश शासन में देहात की अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव आए। कंपनी के राजस्व नीतियों ने किसानों की आर्थिक स्थिति को कमजोर किया। किसानों पर कर का बोझ बढ़ा और वे साहूकारों (महाजनों) से कर्ज लेने लगे। कर्ज के ब्याज ने किसानों को और अधिक कंगाल बना दिया। किसानों को अपनी उपज कम कीमत पर बेचनी पड़ती थी, जबकि बाजार में कीमतें ऊँची होती थीं। कंपनी की नीतियों ने व्यापारिक फसलों (जैसे कपास, नील) के उत्पादन को बढ़ावा दिया, जिससे खाद्यान्न उत्पादन घटा। नील की खेती किसानों पर थोपी गई, जिससे अनेक क्षेत्रों में नील विद्रोह हुए। देहात में सामाजिक संरचना में भी बदलाव आया, जिसमें ज़मींदारों की शक्ति बढ़ी और किसानों की स्थिति कमजोर हुई। देहात के ये आर्थिक परिवर्तन आधुनिक भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नींव बने।
देहात में किसानों के प्रतिरोध का अध्ययन आधुनिक इतिहासकारों का महत्वपूर्ण विषय है। इतिहासकार रणजीत गुहा ने 'सबाल्टर्न स्टडीज़' की स्थापना की, जिसमें आम जनता, किसानों और दमित वर्गों के इतिहास को महत्व दिया गया। सबाल्टर्न दृष्टिकोण में यह माना जाता है कि अभिलेखों और साहित्य में आम लोगों की आवाज़ कम दर्ज है, इसलिए उनके प्रतिरोध के बारे में सावधानीपूर्वक स्रोतों से जानकारी निकाली जानी चाहिए। किसानों के विद्रोह और प्रतिरोध ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार की। देहात के अध्ययन से हमें यह समझने में सहायता मिलती है कि उपनिवेशवाद ने भारतीय समाज को किस प्रकार प्रभावित किया। उपनिवेशवाद और देहात का यह अध्ययन आधुनिक भारत के इतिहास की आधारशिला है।
| व्यवस्था | क्षेत्र | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| स्थायी बंदोबस्त | बंगाल | ज़मींदार स्थायी स्वामी, निश्चित मालगुज़ारी |
| रैयतवाड़ी | मद्रास, बॉम्बे | किसान सीधे राज्य को कर देते |
| महालवाड़ी | उत्तर-पश्चिमी प्रांत, पंजाब | महाल (गाँव समूह) पर कर |
| विद्रोह | वर्ष | क्षेत्र |
|---|---|---|
| संथाल विद्रोह | 1855 | बिहार/झारखंड |
| भील विद्रोह | 19वीं शताब्दी | मध्य भारत |
| नील विद्रोह | 1859-60 | बंगाल |
ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने भारतीय देहात की सामाजिक और आर्थिक संरचना को मौलिक रूप से बदल दिया। स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी जैसी राजस्व व्यवस्थाओं ने कंपनी की आय सुनिश्चित की, परंतु किसानों की स्थिति को कमजोर किया। जंगल कानूनों ने वनवासियों और किसानों को विस्थापित किया। किसानों पर कर का बोझ और साहूकारों का कर्ज उनकी दुर्दशा का प्रमुख कारण बना। इन परिस्थितियों में संथाल, नील और अन्य विद्रोह हुए, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के विरोध की पृष्ठभूमि तैयार की। सबाल्टर्न अध्ययन ने आम किसानों के इतिहास को महत्व दिया। इस अध्याय से हमें यह शिक्षा मिलती है कि उपनिवेशवाद के प्रभाव को समझने के लिए देहात के लोगों के जीवन का गहन अध्ययन आवश्यक है।