यह अध्याय भारतीय संविधान के निर्माण की प्रक्रिया का अध्ययन करता है। भारतीय संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है, जिसे 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। संविधान सभा ने लगभग तीन वर्षों में संविधान का निर्माण किया। इस अध्याय में संविधान सभा की संरचना, संविधान सभा की बहसें, संविधान के मुख्य सिद्धांत, संविधान सभा के प्रमुख सदस्य और संविधान निर्माण की प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है। संविधान सभा के प्रमुख सदस्यों में डॉ. भीमराव अंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद, महात्मा गांधी जैसे महान नेता शामिल थे। संविधान निर्माण में डॉ. अंबेडकर का योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण था, इसलिए उन्हें 'भारतीय संविधान के जनक' के रूप में जाना जाता है।
संविधान सभा का गठन वर्ष 1946 में ब्रिटिश कैबिनेट मिशन की योजना के आधार पर किया गया। संविधान सभा के चुनाव प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से हुए। संविधान सभा में कुल 389 सदस्य थे, जिनमें से 296 सदस्य ब्रिटिश भारत से और 93 सदस्य रियासतों से चुने गए थे। विभाजन के बाद सदस्यों की संख्या घटकर लगभग 299 रह गई। संविधान सभा में विभिन्न समुदायों, क्षेत्रों और दलों के सदस्य शामिल थे। संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई। डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष बने। संविधान सभा में विभिन्न समितियाँ बनाई गईं, जैसे प्रारूप समिति (ड्राफ्टिंग कमेटी), जिसकी अध्यक्षता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने की। प्रारूप समिति ने संविधान का प्रारूप तैयार किया, जिस पर सभा में विस्तृत बहसें हुईं।
संविधान सभा में संविधान के विभिन्न मुद्दों पर गहन बहसें हुईं। सदस्यों ने मौलिक अधिकारों, राज्य की नीति के निदेशक सिद्धांतों, संसदीय प्रणाली, संघीय ढाँचे, न्यायपालिका और अन्य विषयों पर विचार किया। संविधान सभा की बहसों में 'एक देश एक राष्ट्र' के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। कुछ सदस्यों ने राष्ट्रपति प्रणाली का समर्थन किया, जबकि अन्य ने संसदीय प्रणाली का। अंततः संविधान सभा ने ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को अपनाने का निर्णय लिया, क्योंकि यह भारत की परिस्थितियों के लिए उपयुक्त मानी गई। संविधान सभा ने मौलिक अधिकारों और निदेशक सिद्धांतों पर लंबी बहस की। सदस्यों ने नस्लीय, धार्मिक और जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करने का प्रयास किया। संविधान सभा की बहसों के विवरण 'संविधान सभा वाद-विवाद' (Constituent Assembly Debates) में दर्ज हैं, जो संविधान निर्माण का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
भारतीय संविधान के मुख्य सिद्धांतों में न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व शामिल हैं। संविधान की प्रस्तावना में इन सिद्धांतों का उल्लेख है। प्रस्तावना के अनुसार भारत एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है। संविधान में मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 12-35) दिए गए हैं, जैसे समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार और संवैधानिक उपचारों का अधिकार। संविधान में राज्य की नीति के निदेशक सिद्धांत (अनुच्छेद 36-51) भी शामिल हैं, जो राज्य के नीति निर्देश हैं। संविधान में संघीय प्रणाली अपनाई गई, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन है। संविधान में वयस्क मताधिकार, जिसमें सभी वयस्क नागरिकों को मतदान का अधिकार है, को स्वीकार किया गया। संविधान के ये सिद्धांत भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों का आधार हैं।
संविधान में मौलिक अधिकार और राज्य की नीति के निदेशक सिद्धांत शामिल हैं। मौलिक अधिकार न्यायसंगत हैं, अर्थात नागरिक इन्हें अदालत में चुनौती दे सकते हैं। निदेशक सिद्धांत न्यायसंगत नहीं हैं, परंतु राज्य के नीति निर्माण के लिए मार्गदर्शक हैं। मौलिक अधिकार नागरिकों को सरकार के मनमाने कार्यों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। निदेशक सिद्धांतों का उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक न्याय प्राप्त करना है। संविधान में अस्पृश्यता का अंत किया गया और सभी नागरिकों को समानता का अधिकार दिया गया। संविधान में कार्य के अधिकार, शिक्षा के अधिकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य के संरक्षण के लिए निदेशक सिद्धांत शामिल हैं। ग्राम पंचायतों का संगठन भी निदेशक सिद्धांतों का हिस्सा है। मौलिक अधिकार और निदेशक सिद्धांत मिलकर भारतीय संविधान की सामाजिक और नैतिक दृष्टि को दर्शाते हैं। संविधान में दिए गए ये प्रावधान आज भी भारतीय राजनीति का आधार हैं।
डॉ. भीमराव अंबेडकर भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माता थे। वे प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे, जिसने संविधान का प्रारूप तैयार किया। उन्होंने संविधान सभा में मौलिक अधिकारों और दलितों के अधिकारों की रक्षा के लिए जोर दिया। अंबेडकर दलित वर्ग के प्रमुख नेता थे और उन्होंने अस्पृश्यता के अंत और सामाजिक समानता के लिए कार्य किया। उन्होंने संविधान में समानता के अधिकार और अस्पृश्यता के उन्मूलन के प्रावधान सुनिश्चित किए। अंबेडकर ने श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों के लिए भी जोर दिया। उनके योगदान के कारण उन्हें 'भारतीय संविधान के जनक' कहा जाता है। संविधान सभा में अंबेडकर की बहसें और विचार संविधान के निर्माण में निर्णायक रहे। उन्होंने भारतीय संविधान को विश्व के सर्वश्रेष्ठ संविधानों में से एक बनाया। अंबेडकर की दूरदर्शिता और ज्ञान ने संविधान को मजबूत नींव दी।
संविधान सभा में कई प्रमुख सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जवाहरलाल नेहरू ने संविधान की प्रस्तावना में 'उद्देश्य प्रस्ताव' (ऑब्जेक्टिव रेज़ोल्यूशन) प्रस्तुत किया, जिसमें संविधान के मूल सिद्धांतों को रेखांकित किया गया। राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे। सरदार वल्लभभाई पटेल ने रियासतों के एकीकरण और मौलिक अधिकारों की समिति में कार्य किया। महात्मा गांधी संविधान सभा के सदस्य नहीं थे, परंतु उनके विचारों ने सदस्यों को प्रभावित किया। संविधान सभा में महिला सदस्यों, जैसे सरोजिनी नायडू और हंसा मेहता, ने भी भाग लिया। संविधान सभा में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधि शामिल थे। संविधान सभा ने ब्रिटिश, अमेरिकी, आयरिश और कनाडाई संविधानों से उपयुक्त प्रावधानों को अपनाया। संविधान सभा का यह समावेशी स्वरूप भारतीय संविधान की विशेषता है।
संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को संविधान को अपनाया। इसके बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू किया गया। 26 जनवरी को इसलिए चुना गया क्योंकि 1930 में कांग्रेस ने इसी दिन पूर्ण स्वराज की घोषणा की थी। संविधान के लागू होने के साथ भारत एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य बना। डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने। 26 जनवरी को आज 'गणतंत्र दिवस' के रूप में मनाया जाता है। संविधान में समय-समय पर संशोधन किए गए हैं, जिनके माध्यम से इसे समाज की बदलती जरूरतों के अनुसार अद्यतन किया गया। भारतीय संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है। संविधान के निर्माण की यह प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र की मजबूत नींव की गवाह है। संविधान निर्माण का यह अध्याय भारतीय लोकतंत्र के मूल्यों और उसके निर्माताओं की दूरदर्शिता को दर्शाता है।
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 9 दिसंबर 1946 | संविधान सभा की पहली बैठक |
| 26 नवंबर 1949 | संविधान का स्वीकरण |
| 26 जनवरी 1950 | संविधान लागू |
| अधिकार | विवरण |
|---|---|
| समानता का अधिकार | सभी नागरिकों को समानता |
| स्वतंत्रता का अधिकार | भाषण, अभिव्यक्ति आदि की स्वतंत्रता |
| शोषण के विरुद्ध अधिकार | दासता, बंधुआ मजदूरी का अंत |
| धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार | सभी धर्मों की स्वतंत्रता |
भारतीय संविधान का निर्माण विश्व के सबसे महान लोकतांत्रिक प्रयोगों में से एक है। संविधान सभा ने लगभग तीन वर्षों में विभिन्न विचारधाराओं और समुदायों के प्रतिनिधियों की बहसों के माध्यम से एक व्यापक और मजबूत संविधान का निर्माण किया। डॉ. अंबेडकर, नेहरू, पटेल और राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं ने संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। संविधान की प्रस्तावना में न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांत निहित हैं। मौलिक अधिकार और निदेशक सिद्धांत संविधान की सामाजिक दृष्टि को दर्शाते हैं। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ भारत एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य बना। संविधान के निर्माण का यह अध्ययन हमें भारतीय लोकतंत्र के मूल्यों, उसके निर्माताओं की दूरदर्शिता और सामूहिक निर्णय लेने की शक्ति की सीख देता है।