यह अध्याय महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का अध्ययन करता है, जो मुख्यतः 1915 से 1947 के बीच का काल है। मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका से वर्ष 1915 में भारत लौटे। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी और उनकी अहिंसा और सत्याग्रह की विचारधारा ने आम जनता को आंदोलन से जोड़ा। इस अध्याय में चंपारण, खेड़ा, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक सत्याग्रह (दांडी मार्च), क्विट इंडिया आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे प्रमुख आंदोलनों का अध्ययन किया जाता है। गांधीजी के विचारों और आंदोलनों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जन-आंदोलन बना दिया। उनके नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक जनसंगठन बन गई।
मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर (गुजरात) में हुआ था। उन्होंने लंदन में कानून की शिक्षा प्राप्त की। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने वकालत की और वहाँ भारतीयों के विरुद्ध नस्लीय भेदभाव देखा। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने 'सत्याग्रह' (सत्य और अहिंसा के बल पर संघर्ष) की विधि विकसित की। उन्होंने पीटरमैरिट्सबर्ग रेलवे स्टेशन पर हुए नस्लीय अपमान का अनुभव किया, जब उन्हें प्रथम श्रेणी के डिब्बे से बाहर निकाल दिया गया। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने वर्ष 1894 में नेटाल भारतीय कांग्रेस की स्थापना की। उन्होंने अहिंसा, सत्य और सत्याग्रह के सिद्धांतों का विकास किया। वर्ष 1915 में वे भारत लौटे। उनके गुरु और प्रेरणा स्रोत गोपाल कृष्ण गोखले थे। गांधीजी ने अपनी आत्मकथा 'सत्य के प्रयोग' लिखी।
भारत लौटने के बाद गांधीजी ने सबसे पहले चंपारण (बिहार) में नील की खेती के विरोध का नेतृत्व किया। चंपारण के किसानों को नील की खेती थोपी गई थी, जिसके विरुद्ध उन्होंने वर्ष 1917 में आंदोलन चलाया। उन्होंने किसानों की शिकायतें सुनीं और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध संघर्ष किया। चंपारण में उनकी सफलता से किसानों को राहत मिली और नील की थोपी गई खेती समाप्त हुई। इसके बाद वर्ष 1918 में उन्होंने खेड़ा (गुजरात) में किसानों के कर माफी के लिए आंदोलन चलाया। खेड़ा में फसल खराब होने के कारण किसान कर नहीं दे पा रहे थे। गांधीजी ने कर माफी की माँग की और सत्याग्रह का सहारा लिया। इन आंदोलनों ने गांधीजी को राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया। इन आंदोलनों से गांधीजी ने साबित किया कि सत्याग्रह आम जनता के संघर्ष का प्रभावी माध्यम है।
वर्ष 1919 में रोलेट एक्ट के विरुद्ध गांधीजी ने आंदोलन चलाया। रोलेट एक्ट के अनुसार ब्रिटिश सरकार बिना मुकदमे के लोगों को जेल में बंद कर सकती थी। इस एक्ट के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सभा हुई, जहाँ जनरल डायर ने निहत्थे लोगों पर गोली चलवाई, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। इस हत्याकांड के बाद गांधीजी ने वर्ष 1920 में 'असहयोग आंदोलन' शुरू किया। इस आंदोलन में लोगों को सरकारी नौकरियों, स्कूलों, अदालतों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने का आह्वान किया गया। असहयोग आंदोलन ने आम जनता को जोड़ा और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एकता बनाई। वर्ष 1922 में चौरी-चौरा (उत्तर प्रदेश) में हुई हिंसक घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया। असहयोग आंदोलन के कारण खिलाफत आंदोलन के साथ गठबंधन बना।
वर्ष 1930 में गांधीजी ने 'सविनय अवज्ञा आंदोलन' शुरू किया, जिसकी शुरुआत 'नमक सत्याग्रह' या 'दांडी मार्च' से हुई। गांधीजी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से दांडी (गुजरात) तक लगभग 240 मील की पैदल यात्रा की, जो लगभग 24 दिनों में पूरी हुई। दांडी पहुँचकर उन्होंने नमक कानून का उल्लंघन कर नमक बनाया। नमक पर कर ब्रिटिश शासन की अन्यायपूर्ण नीति का प्रतीक था, क्योंकि नमक का उपयोग हर घर में होता था। नमक सत्याग्रह ने पूरे देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन को प्रेरित किया। इस आंदोलन में लाखों लोगों ने भाग लिया और कई लोगों को जेल जाना पड़ा। वर्ष 1931 में गांधीजी और लॉर्ड इरविन के बीच 'गांधी-इरविन समझौता' हुआ। इसके बाद गांधीजी ने लंदन में हुए 'गोलमेज सम्मेलन' में भाग लिया। वर्ष 1932 में गांधीजी ने 'पूना समझौता' पर हस्ताक्षर किए।
वर्ष 1942 में गांधीजी ने 'क्विट इंडिया' या 'भारत छोड़ो आंदोलन' शुरू किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिशों ने भारत की सहमति के बिना भारत को युद्ध में शामिल किया। गांधीजी ने अगस्त 1942 में 'करो या मरो' (Do or Die) का नारा दिया। क्विट इंडिया आंदोलन में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया और विरोध प्रदर्शन किए। ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी और कांग्रेस के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। यह आंदोलन जनता के व्यापक समर्थन से चला, हालाँकि इसे जल्द ही दबा दिया गया। इस आंदोलन ने साबित किया कि भारतीय जनता ब्रिटिश शासन की समाप्ति चाहती है। क्विट इंडिया आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम बड़ा जन-आंदोलन था। इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ ब्रिटिशों को भारत छोड़ने का निर्णय लेना पड़ा।
गांधीजी की विचारधारा अहिंसा, सत्य और सत्याग्रह पर आधारित थी। अहिंसा का अर्थ था किसी भी प्रकार की हिंसा का त्याग। सत्य का अर्थ था सत्य का पालन। सत्याग्रह का अर्थ था सत्य और अहिंसा के बल पर बुराई के विरुद्ध संघर्ष। गांधीजी ने 'स्वराज' (स्वतंत्रता) को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आत्म-नियंत्रण और आत्म-सुधार के रूप में देखा। उन्होंने सामाजिक समानता, अस्पृश्यता उन्मूलन, खादी का प्रचार और ग्राम स्वराज पर बल दिया। उन्होंने 'हरिजन' शब्द का प्रयोग दलितों के लिए किया। उन्होंने स्त्रियों को आंदोलन में सम्मानजनक स्थान दिया। गांधीजी ने 'नई तालीम' (बुनियादी शिक्षा) का सुझाव दिया। उनकी विचारधारा में शांति, सहिष्णुता और सत्य की विजय पर विश्वास था। गांधीजी की विचारधारा ने न केवल भारत, बल्कि विश्व के विभिन्न आंदोलनों को प्रेरित किया।
महात्मा गांधीजी का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान अद्वितीय था। उन्होंने आंदोलन को केवल शहरी बुद्धिजीवियों का आंदोलन नहीं रहने दिया, बल्कि किसानों, मजदूरों, स्त्रियों और आम जनता को जोड़ा। उनके नेतृत्व में कांग्रेस एक जनसंगठन बनी। उनके आंदोलनों ने ब्रिटिश शासन को कमजोर किया और स्वतंत्रता की नींव तैयार की। गांधीजी का विश्वास था कि स्वतंत्रता सभी के लिए समान होनी चाहिए। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक एकता पर बल दिया। वर्ष 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली, परंतु गांधीजी विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा से व्यथित थे। 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी। गांधीजी को 'महात्मा' और 'राष्ट्रपिता' कहा जाता है। उनका संदेश अहिंसा और सत्य का संदेश आज भी प्रासंगिक है।
| आंदोलन | वर्ष | विशेषता |
|---|---|---|
| चंपारण आंदोलन | 1917 | नील खेती का विरोध |
| खेड़ा आंदोलन | 1918 | कर माफी |
| असहयोग आंदोलन | 1920 | सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार |
| सविनय अवज्ञा आंदोलन | 1930 | नमक सत्याग्रह, दांडी मार्च |
| क्विट इंडिया आंदोलन | 1942 | करो या मरो |
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 2 अक्टूबर 1869 | गांधीजी का जन्म |
| 13 अप्रैल 1919 | जलियांवाला बाग हत्याकांड |
| 12 मार्च 1930 | दांडी मार्च की शुरुआत |
| 30 जनवरी 1948 | गांधीजी की हत्या |
महात्मा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी और उसे जन-आंदोलन बना दिया। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद उन्होंने चंपारण, खेड़ा, असहयोग, सविनय अवज्ञा और क्विट इंडिया जैसे आंदोलनों का नेतृत्व किया। उनकी अहिंसा, सत्य और सत्याग्रह की विचारधारा ने लाखों लोगों को प्रेरित किया। उन्होंने सामाजिक समानता, अस्पृश्यता उन्मूलन और स्वदेशी पर बल दिया। उनके नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक जनसंगठन बनी और ब्रिटिश शासन कमजोर हुआ। वर्ष 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली, परंतु गांधीजी की हत्या 30 जनवरी 1948 को कर दी गई। गांधीजी का संदेश अहिंसा और सत्य का संदेश आज भी विश्व के लिए प्रेरणा स्रोत है। वे भारत के 'राष्ट्रपिता' कहलाते हैं।