यह अध्याय मुगल काल (सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी) में किसानों, ज़मींदारों और राज्य के बीच संबंधों का अध्ययन करता है। मुगल साम्राज्य में कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी, और किसान समाज का सबसे बड़ा वर्ग था। ज़मींदार वे स्थानीय प्रतिष्ठित व्यक्ति थे जो भूमि के स्वामी थे और कर वसूली में राज्य की सहायता करते थे। राज्य, विशेषकर मुगल बादशाह, कृषि उपज पर कर लगाते थे और ज़मींदारों तथा किसानों के माध्यम से इस कर को वसूलते थे। इस अध्याय में कृषि उत्पादन, कर व्यवस्था, भूमि माप, जाति और गाँव की संरचना तथा सत्रहवीं शताब्दी के संकट जैसे विषयों पर चर्चा की गई है। मुगल काल में दिल्ली सल्तनत से अलग एक नई भूमि और कर व्यवस्था विकसित हुई, जिसे मुख्य रूप से 'कुतबुद्दीन ऐबक' जैसे शासकों के समय से जोड़ा जाता है, परंतु इसका व्यापक विस्तार अकबर के काल में हुआ।
मुगल काल में कृषि मुख्य आजीविका थी। किसान विभिन्न प्रकार की फसलें उगाते थे। खरीफ की फसलें जैसे चावल, ज्वार, बाजरा और तिल गर्मियों के मानसून में बोई जाती थीं, जबकि रबी की फसलें जैसे गेहूँ, जौ और चना सर्दियों में बोई जाती थीं। इसके अलावा किसान कपास, गन्ना, मिर्च और हल्दी जैसी नकदी फसलें भी उगाते थे। किसानों ने कृषि तकनीक में सुधार किया, जैसे लोहे के हल का उपयोग और सिंचाई के लिए तालाबों, नहरों और कुओं का निर्माण। मुगल काल में सिंचाई के लिए 'पहिया' (चरखा) और 'ढेंकुली' (पानी उठाने की प्रणाली) जैसे उपकरण उपयोग होते थे। कृषि उत्पादन में वृद्धि के कारण मुगल साम्राज्य की अर्थव्यवस्था समृद्ध हुई। अकबर के काल में कृषि कर का निर्धारण उपज की मात्रा के आधार पर होता था।
मुगल काल में ज़मींदार वे व्यक्ति थे जिनके पास भूमि का स्वामित्व था और जो स्थानीय समाज में प्रतिष्ठित थे। ज़मींदार विभिन्न प्रकार के होते थे। कुछ ज़मींदार किसानों की भूमि के स्वामी होते थे, जबकि कुछ बड़े ज़मींदार थे जिन्हें राज्य द्वारा भूमि अनुदान मिला था। ज़मींदार राज्य को कर देते थे और बदले में उन्हें भूमि के कुछ हिस्से का अधिकार मिलता था। ज़मींदारों ने अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए किले, नगर और बाजार बसाए। कई ज़मींदार ब्राह्मण थे, जिन्हें भूमि दान में मिली थी। कुछ ज़मींदार 'राजपूत' थे, जिन्होंने मुगलों से संधि करके अपनी शक्ति बनाए रखी। ज़मींदारों के संबंध राज्य के साथ जटिल थे; कभी वे राज्य की सहायता करते थे तो कभी विद्रोह भी करते थे। ज़मींदारों के पास 'सिपाही' (सैनिक) रखने का अधिकार था।
मुगल साम्राज्य की आय का मुख्य स्रोत भूमि कर था। कर वसूली की व्यवस्था को समझना आवश्यक है। प्रारंभ में मुगलों ने दिल्ली सल्तनत की कर व्यवस्था को अपनाया, जिसे 'कानून' या 'कर' कहा जाता था। अकबर के शासनकाल में राजा टोडरमल ने भूमि कर की नई व्यवस्था शुरू की, जिसे 'दहसाला' प्रणाली कहा गया। इस प्रणाली के अनुसार भूमि को मापा जाता था और उपज के औसत आधार पर कर निर्धारित किया जाता था। अकबर के समय भूमि कर उपज का लगभग एक-तिहाई होता था। भूमि को 'पोलाज' (जो हर वर्ष बोई जाती), 'परौती' (जो कभी-कभी खाली छोड़ दी जाती), 'चचर' (जो 3-4 वर्ष बंजर रही हो) और 'बंजर' (जो स्थायी रूप से बंजर थी) जैसे वर्गों में विभाजित किया गया। कर वसूली के लिए 'अमिल' (कर अधिकारी) नियुक्त होते थे। भूमि कर के अतिरिक्त पशु, बाग और व्यापार पर भी कर लगते थे।
मुगल काल के गाँव में सामाजिक और आर्थिक जीवन का अपना ढाँचा था। गाँव में किसान, कारीगर, सेवक और अन्य समूह रहते थे। गाँव में 'गाँव का मुखिया' या 'पटेल' महत्वपूर्ण पद था, जो कर वसूली और विवादों के निपटारे में भूमिका निभाता था। गाँव में 'चौधरी' और 'मुकद्दम' भी स्थानीय नेता होते थे। कारीगरों में बढ़ई, लोहार, कुम्हार और जुलाहे शामिल थे। गाँव के सामान्य कार्यों के लिए 'बेगार' (मजदूरी) प्रथा थी। जाति व्यवस्था के आधार पर गाँव में कार्यों का विभाजन होता था। गाँव में 'पंचायत' विवादों का निपटारा करती थी। अकबर के काल में किसानों की जनगणना करने और भूमि का लेखा-जोखा रखने की व्यवस्था थी। गाँव की ये संस्थाएँ राज्य की कर वसूली व्यवस्था से जुड़ी हुई थीं, जिससे राज्य और गाँव के बीच घनिष्ठ संबंध बना।
सत्रहवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में मुगल साम्राज्य में गहरा संकट उत्पन्न हुआ, जिसे 'सत्रहवीं शताब्दी का संकट' कहा जाता है। इस संकट के कारण कई थे। कृषि उपज में कमी आई, जिसके कारण खाद्यान्न की कमी हुई। बढ़ते करों ने किसानों को कंगाल बना दिया। ज़मींदारों और किसानों में असंतोष बढ़ा, जिसके कारण कई क्षेत्रों में विद्रोह हुए। सतनामी विद्रोह, जाट विद्रोह और मराठों का उदय इसी संकट के परिणाम थे। औरंगज़ेब के शासनकाल में इन विद्रोहों ने तीव्रता पकड़ी। पूर्वी भारत में भी किसान विद्रोह हुए। इस संकट के कारण मुगल साम्राज्य कमजोर हुआ और प्रांतीय शासकों (नवाबों) ने स्वतंत्र होने का प्रयास किया। सत्रहवीं शताब्दी का संकट मुगल साम्राज्य के पतन का एक प्रमुख कारण बना।
ज़मींदारों और राज्य के संबंध जटिल और दोहरे थे। एक ओर, ज़मींदार राज्य के कर वसूली के सहयोगी थे और उन्हें राज्य से संरक्षण मिलता था। दूसरी ओर, ज़मींदार अपनी स्वतंत्रता बनाए रखना चाहते थे और कई बार राज्य के विरुद्ध विद्रोह करते थे। राज्य ज़मींदारों के विद्रोह को दबाने के लिए सैनिक अभियान भेजता था। ज़मींदार अपने क्षेत्र में न्याय, सुरक्षा और कानून की व्यवस्था करते थे। मुगल प्रशासन में ज़मींदारों को 'मनसबदार' प्रणाली से भी जोड़ा गया, जिसमें उन्हें राज्य के रैंक के अनुसार सम्मान मिलता था। कई ज़मींदार मुगल सेना में भर्ती होकर राज्य की सेवा करते थे। इस प्रकार ज़मींदार मुगल साम्राज्य की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था का अभिन्न अंग थे। उनकी शक्ति और राज्य के साथ उनके संबंध साम्राज्य की स्थिरता को प्रभावित करते थे।
गाँव की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित थी, परंतु इसमें शिल्प और व्यापार भी शामिल थे। गाँवों में कपड़ा, बर्तन, औजार और गहने बनाने के कार्य होते थे। किसान अपनी उपज को बाजारों में बेचते थे, जहाँ 'मंडी' (अनाज मंडी) और 'हाट' (साप्ताहिक बाजार) लगते थे। नगरों और गाँवों के बीच व्यापारिक संबंध थे। कृषि उपज के अतिरिक्त गाँव में पशुपालन, मधुमक्खी पालन और मछली पालन जैसे कार्य होते थे। गाँव में 'हवेली' (ज़मींदार का निवास) और 'कच्ची मकान' (किसानों के घर) होते थे। गाँव की अर्थव्यवस्था में सामाजिक विषमता थी; ज़मींदार समृद्ध थे जबकि किसान सामान्यतः कर्ज में थे। किसानों पर राज्य और ज़मींदारों का दोहरा कर होता था, जिससे उनकी स्थिति कठिन रहती थी। फिर भी किसानों ने अपनी मेहनत से मुगल साम्राज्य की समृद्धि का आधार तैयार किया।
| भूमि प्रकार | विवरण |
|---|---|
| पोलाज | हर वर्ष बोई जाने वाली भूमि |
| परौती | कभी-कभी बंजर छोड़ी जाने वाली भूमि |
| चचर | 3-4 वर्ष बंजर रही भूमि |
| बंजर | स्थायी रूप से बंजर भूमि |
| मौसम | फसलें |
|---|---|
| खरीफ | चावल, ज्वार, बाजरा, तिल |
| रबी | गेहूँ, जौ, चना |
| नकदी फसल | कपास, गन्ना, मिर्च, हल्दी |
मुगल काल में किसान, ज़मींदार और राज्य के बीच घनिष्ठ और जटिल संबंध थे। किसानों की मेहनत ने साम्राज्य की कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाया। ज़मींदार भूमि के स्वामी होने के साथ-साथ राज्य के कर वसूली के सहयोगी थे। अकबर के काल में टोडरमल द्वारा विकसित कर व्यवस्था ने प्रशासन को सुदृढ़ बनाया। परंतु सत्रहवीं शताब्दी में कृषि संकट, बढ़ते कर और असंतोष के कारण विद्रोह हुए, जिसने मुगल साम्राज्य को कमजोर किया। इस अध्याय का अध्ययन हमें यह समझाता है कि किसी साम्राज्य की स्थिरता उसकी कृषि-व्यवस्था, कर नीति और सामाजिक समूहों के साथ संतुलन पर निर्भर करती है। किसानों और ज़मींदारों की भूमिका को समझे बिना मुगल साम्राज्य के इतिहास को नहीं समझा जा सकता।