यह अध्याय भारतीय इतिहास में धार्मिक विचारधाराओं, विश्वासों और स्थापत्य कला के विकास का अध्ययन करता है। मुख्य रूप से बौद्ध धर्म के उद्भव और विस्तार, स्तूपों की वास्तुकला, मूर्तिकला तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बने धार्मिक स्मारकों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इस अध्याय में हम बुद्ध के जीवन, उनके उपदेशों, बौद्ध संघ के संगठन, भक्ति आंदोलन तथा जैन और वैदिक परंपराओं के बारे में विस्तार से जानेंगे। साथ ही, हम स्तूपों की वास्तुकला के माध्यम से यह समझने का प्रयास करेंगे कि धार्मिक विश्वासों को किस प्रकार मूर्त रूप दिया गया। स्थापत्य कला और मूर्तिकला धार्मिक विश्वासों के भौतिक प्रमाण हैं, जिनका अध्ययन करके हम अतीत के धार्मिक जीवन को समझते हैं।
वैदिक धर्म यज्ञों और बलि पर आधारित था, जिसमें ब्राह्मण पुजारी की प्रमुख भूमिका थी। यज्ञों के माध्यम से देवताओं की आराधना की जाती थी। धीरे-धीरे यज्ञीय धर्म की जटिलता बढ़ी और यह महंगा हो गया। इससे आम जनता में असंतोष उत्पन्न हुआ। उत्तर वैदिक काल में उपनिषदों की रचना हुई, जिनमें ब्रह्म और आत्मा की एकता, कर्म सिद्धांत और मोक्ष के बारे में दार्शनिक चर्चा की गई। उपनिषदों में ज्ञान को सर्वोच्च महत्व दिया गया। इसी काल में जैन और बौद्ध धर्मों का उदय हुआ, जिन्होंने वैदिक यज्ञीय धर्म का विरोध किया। जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर और बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध इसी सामाजिक-धार्मिक परिवेश में उभरे। इन्होंने कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष के सिद्धांतों पर नए दृष्टिकोण प्रस्तुत किए।
महात्मा बुद्ध का जन्म लगभग 563 ई.पू. में लुंबिनी में हुआ था। उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ गौतम था। वे शाक्य वंश के क्षत्रिय थे। उनका विवाह यशोधरा से हुआ और उनका पुत्र राहुल था। जब वे चार दृश्यों - एक वृद्ध, एक बीमार व्यक्ति, एक शव और एक संन्यासी - को देखे, तो उनके मन में सांसारिक जीवन की असारता के प्रति वैराग्य पैदा हुआ। उन्होंने घर त्याग दिया और वर्षों तक सत्य की खोज की। बोधगया में पीपल वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए उन्हें 'ज्ञान' प्राप्त हुआ और वे 'बुद्ध' कहलाए। बुद्ध का पहला उपदेश सारनाथ में हुआ, जिसे 'धर्मचक्र प्रवर्तन' कहा जाता है। उन्होंने कुशीनगर में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। बुद्ध के उपदेशों में अष्टांगिक मार्ग, चार आर्य सत्य और कर्म सिद्धांत प्रमुख हैं। बुद्ध ने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया, जो अतिवाद से बचकर संतुलित जीवन जीने की शिक्षा देता है।
बुद्ध ने अपने अनुयायियों के लिए संघ (मठवासी समुदाय) की स्थापना की। संघ में भिक्षु और भिक्षुणियाँ शामिल थे। संघ में प्रवेश के लिए प्रमुख जातियों से भिन्न लोगों को भी अनुमति दी गई थी, जिससे बौद्ध धर्म जाति व्यवस्था के प्रति उदार था। संघ में दीक्षा और नियमों का पालन होता था। बौद्ध धर्म में कई संगीतियाँ (सभाएँ) हुईं, जिनमें धर्म के सिद्धांतों का संकलन किया गया। प्रथम बौद्ध संगीति राजगृह में हुई, जहाँ सुत्तपिटक और विनयपिटक का संकलन हुआ। तृतीय बौद्ध संगीति पाटलिपुत्र में अशोक के संरक्षण में हुई। इन संगीतियों में धर्म के विभिन्न पक्षों पर विचार किया गया। अशोक के काल में बौद्ध धर्म का प्रचार एशिया के विभिन्न क्षेत्रों में हुआ। अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार किया।
स्तूप (Stupa) बौद्ध स्मारक हैं, जिनमें बुद्ध के अवशेष या धार्मिक वस्तुएँ रखी जाती हैं। स्तूप शब्द का शाब्दिक अर्थ 'टीला' है। स्तूप में अर्धगोलाकार आकृति होती है, जिसे 'अंडा' (anda) कहा जाता है। अंडे के ऊपर चौकोर 'हर्मिका' होती है, जिसके ऊपर से 'यष्टि' निकलती है, जिस पर छत्र (छतरियाँ) लगी होती हैं। स्तूप के चारों ओर तोरण द्वार और वेदिका (बाड़) होती है। सबसे प्रसिद्ध स्तूप सांची (मध्य प्रदेश) में स्थित है, जिसे अशोक के काल से जोड़ा जाता है। सांची के स्तूप का विस्तार शुंग वंश के काल में हुआ। सांची के स्तूप के चारों तोरण द्वार अत्यंत सुंदर मूर्तिकला से सज्जित हैं। बोधगया में महाबोधि मंदिर बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति स्थल से जुड़ा है। अमरावती का स्तूप (आंध्र प्रदेश) भी प्रसिद्ध है, जिसमें गहरे उत्कीर्णन (रिलीफ) की कला देखने को मिलती है।
स्तूपों की मूर्तिकला में बुद्ध के जीवन की घटनाओं, जातक कथाओं और प्रतीकों का चित्रण किया गया है। सांची के तोरणों पर बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति, धर्मचक्र प्रवर्तन और महापरिनिर्वाण के दृश्य उकेरे गए हैं। प्रारंभिक काल में बुद्ध को मानव रूप में नहीं, बल्कि प्रतीकों जैसे कि खाली सिंहासन, धर्मचक्र, पीपल वृक्ष और पदचिह्नों के रूप में दर्शाया गया था। यह प्रतीकात्मक शैली बाद के काल में बदली और गांधार क्षेत्र में बुद्ध की मानवरूपी मूर्तियाँ बनने लगीं। गांधार कला (वर्तमान पाकिस्तान क्षेत्र) में यूनानी प्रभाव के कारण मूर्तियों में मानवीय सौंदर्य और हाव-भाव दर्शाए गए। मथुरा कला में भी बुद्ध की मूर्तियाँ बनीं। इस प्रकार स्तूपों की मूर्तिकला क्षेत्रीय कला परंपराओं और धार्मिक विश्वासों का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है।
जैन धर्म के प्रवर्तक वर्धमान महावीर थे, जिन्हें 'जिन' भी कहा जाता है। महावीर का जन्म कुंडग्राम (वैशाली के पास) में लगभग 599 ई.पू. में हुआ था। वे 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के बाद 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे। महावीर ने 30 वर्ष की आयु में गृह त्याग किया और 42 वर्ष की आयु में ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने त्रिरत्न - सम्यक दृष्टि, सम्यक ज्ञान और सम्यक आचरण - का उपदेश दिया। जैन धर्म में अहिंसा पर सर्वाधिक बल दिया गया। महावीर ने सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के सिद्धांतों का पालन करने का आदेश दिया। महावीर के अनुयायी श्वेतांबर और दिगंबर नामक दो संप्रदायों में विभाजित हो गए। जैन धर्म का मुख्य सिद्धांत अहिंसा परमो धर्म है। जैन धर्म के प्रमुख स्थल पावापुरी (महावीर के निर्वाण स्थल) और श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) हैं।
इसी काल में भक्ति परंपरा का विकास हुआ, जिसमें भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति को मुक्ति का मार्ग माना गया। भागवत धर्म में विष्णु को सर्वोच्च देवता माना गया और उनके अवतारों की पूजा की गई। भक्ति आंदोलन में भगवद्गीता का बड़ा महत्व है, जिसमें कर्म, ज्ञान और भक्ति तीनों मार्गों की चर्चा की गई। भक्ति परंपरा में गीता के अनुसार भक्ति मार्ग सबसे सरल है। इस काल में भागवत पुराण और विष्णु पुराण जैसे ग्रंथों की रचना हुई। स्थापत्य में भी भक्ति का प्रभाव दिखा, जैसे कि मंदिरों का निर्माण। मंदिर स्थापत्य में सर्वोच्च शिखर, गर्भगृह और मंडप जैसे भाग होते हैं। पूर्वी भारत में वैष्णव धर्म का विशेष प्रभाव रहा। इस प्रकार भक्ति परंपरा ने धार्मिक जीवन में एकता और सामाजिक समावेश का संदेश दिया।
| घटना | स्थान | महत्व |
|---|---|---|
| जन्म | लुंबिनी | बुद्ध की जन्मभूमि |
| ज्ञान प्राप्ति | बोधगया | बुद्ध बने |
| प्रथम उपदेश | सारनाथ | धर्मचक्र प्रवर्तन |
| महापरिनिर्वाण | कुशीनगर | अंतिम यात्रा |
| संगीति | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| प्रथम | राजगृह | सुत्तपिटक और विनयपिटक का संकलन |
| तृतीय | पाटलिपुत्र | अशोक का संरक्षण, धर्म का शुद्धिकरण |
| चतुर्थ | कश्मीर (कुंडलवन) | हीनयान और महायान में विभाजन |
विचारक, विश्वास और इमारतें अध्याय धार्मिक विचारधाराओं और स्थापत्य कला के बीच गहरा संबंध स्थापित करता है। वैदिक यज्ञीय धर्म के बाद उपनिषदों, बौद्ध और जैन धर्मों के उदय ने भारतीय धार्मिक जीवन को नई दिशा दी। बुद्ध का मध्यम मार्ग और अहिंसा का उपदेश, महावीर का त्रिरत्न और भक्ति परंपरा का समावेश इस काल की धार्मिक विविधता को दर्शाता है। स्तूपों और उनकी मूर्तिकला में इन विश्वासों का सुंदर मूर्त रूप दिखाई देता है। सांची, अमरावती और गांधार की कला क्षेत्रीय परंपराओं का संगम है। इस अध्याय का अध्ययन यह सिखाता है कि धर्म केवल विचार नहीं है, बल्कि इमारतों, मूर्तियों और प्रतीकों के माध्यम से समाज में स्थायी रूप से विद्यमान रहता है।