वैद्युत आवेश (Electric Charge) पदार्थ का वह मौलिक गुण है जिसके कारण विद्युत और चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न होते हैं। कुछ पदार्थ जैसे रेशम पर कांच की छड़ रगड़ने से विद्युतीकृत हो जाते हैं और दूसरे छोटे-छोटे पदार्थों के कणों को अपनी ओर आकर्षित करने लगते हैं। आवेश दो प्रकार के होते हैं — धनावेश और ऋणावेश। समान प्रकार के आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं तथा विपरीत प्रकार के आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। यह अध्याय वैद्युत आवेश, कूलॉम का नियम, विद्युत क्षेत्र, वैद्युत द्विध्रुव, गाउस का नियम तथा उनके विभिन्न अनुप्रयोगों की विस्तृत चर्चा करता है। विद्युत और चुंबकत्व की समस्त घटनाओं की जड़ें इसी अध्याय की संकल्पनाओं में निहित हैं, इसलिए यह संपूर्ण भौतिक विज्ञान की नींव कहलाता है।
किसी भी आवेश की मात्रा हमेशा इलेक्ट्रॉन के आवेश का पूर्ण गुणज होती है। आवेश का यह गुण आवेश की क्वांटीकरण कहलाता है।
$$q = ne$$
यहाँ $q$ आवेश है, $n$ कोई पूर्णांक है और $e$ मौलिक आवेश है जिसका मान $e = 1.6 \times 10^{-19}$ कूलॉम (C) है। इलेक्ट्रॉन पर $-1.6 \times 10^{-19}$ C तथा प्रोटॉन पर $+1.6 \times 10^{-19}$ C आवेश होता है।
आवेश को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है। यह केवल एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानांतरित हो सकता है। किसी विलगित निकाय का कुल आवेश हमेशा संरक्षित रहता है। उदाहरण के लिए, जब कांच की छड़ को रेशम से रगड़ा जाता है तो कांच की छड़ पर धनावेश तथा रेशम पर उतना ही ऋणावेश उत्पन्न होता है, जिससे निकाय का कुल आवेश शून्य ही रहता है।
किसी निकाय का कुल आवेश उसमें उपस्थित सभी आवेशों का बीजगणितीय योग होता है। यदि किसी निकाय में $q_1, q_2, q_3, \ldots$ आवेश हैं तो कुल आवेश:
$$Q = q_1 + q_2 + q_3 + \ldots$$
कूलॉम के नियम के अनुसार, दो बिंदु आवेशों के बीच लगने वाला वैद्युत बल उनके आवेशों के गुणनफल के समानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है। इस बल की दिशा दोनों आवेशों को मिलाने वाली सरल रेखा के अनुदिश होती है।
$$F = k \frac{q_1 q_2}{r^2} = \frac{1}{4\pi \epsilon_0} \frac{q_1 q_2}{r^2}$$
यहाँ $\epsilon_0$ निर्वात की विद्युतशीलता है जिसका मान $8.854 \times 10^{-12} \text{ C}^2 \text{ N}^{-1} \text{ m}^{-2}$ है तथा $k = \frac{1}{4\pi\epsilon_0} = 9 \times 10^9 \text{ N m}^2 \text{ C}^{-2}$ है। यह नियम केवल बिंदु आवेशों पर ही लागू होता है। यदि आवेशों के बीच कोई माध्यम हो तो बल $\epsilon_r$ (आपेक्षिक परावैद्युतांक) के कारण $\frac{1}{\epsilon_r}$ गुना हो जाता है।
जब एक से अधिक आवेश किसी आवेश पर बल लगाते हैं, तो उस पर परिणामी बल प्रत्येक आवेश द्वारा अलग-अलग लगाए गए बलों का सदिश योग होता है।
$$\vec{F} = \vec{F}_1 + \vec{F}_2 + \vec{F}_3 + \ldots$$
किसी आवेश के चारों ओर वह क्षेत्र जिसमें किसी अन्य आवेश पर वैद्युत बल का अनुभव होता है, विद्युत क्षेत्र कहलाता है। किसी बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता उस बिंदु पर रखे इकाई धनावेश द्वारा अनुभव किए जाने वाले बल के बराबर होती है।
$$\vec{E} = \frac{\vec{F}}{q_0}$$
बिंदु आवेश $q$ के कारण दूरी $r$ पर विद्युत क्षेत्र:
$$E = \frac{1}{4\pi\epsilon_0} \frac{q}{r^2}$$
विद्युत क्षेत्र की दिशा धनावेश के लिए आवेश से दूर की ओर तथा ऋणावेश के लिए आवेश की ओर होती है। विद्युत क्षेत्र रेखाओं (Electric Field Lines) की सहायता से विद्युत क्षेत्र को निरूपित किया जाता है। ये रेखाएँ धनावेश से प्रारंभ होकर ऋणावेश पर समाप्त होती हैं तथा कभी एक-दूसरे को प्रतिच्छेद नहीं करतीं। किसी क्षेत्र में रेखाओं की सघनता विद्युत क्षेत्र की प्रबलता को दर्शाती है।
जब दो समान परिमाण के विपरीत आवेश $+q$ और $-q$ एक-दूसरे से बहुत कम दूरी $2a$ पर स्थित होते हैं, तो इस संयोजन को वैद्युत द्विध्रुव कहते हैं।
$$p = q \times 2a$$
द्विध्रुव आघूर्ण एक सदिश राशि है जिसकी दिशा ऋणावेश से धनावेश की ओर होती है। इसकी SI इकाई कूलॉम-मीटर (C m) है।
द्विध्रुव के अक्ष पर उसके केंद्र से दूरी $r$ पर विद्युत क्षेत्र (जब $r \gg 2a$):
$$E_{ax} = \frac{1}{4\pi\epsilon_0} \frac{2p}{r^3}$$
द्विध्रुव के अभिलंब समद्विभाजक पर दूरी $r$ पर विद्युत क्षेत्र:
$$E_{eq} = \frac{1}{4\pi\epsilon_0} \frac{p}{r^3}$$
ध्यान दें कि अक्षीय स्थिति में विद्युत क्षेत्र निरक्षीय स्थिति की तुलना में दोगुना होता है।
जब कोई वैद्युत द्विध्रुव समान विद्युत क्षेत्र $\vec{E}$ में रखा जाता है, तो उस पर बल आघूर्ण कार्य करता है:
$$\tau = pE \sin\theta$$
यहाँ $\theta$ द्विध्रुव आघूर्ण और विद्युत क्षेत्र के बीच का कोण है। जब द्विध्रुव को क्षेत्र के अनुदिश संरेखित किया जाता है ($\theta = 0$), तो बल आघूर्ण शून्य होता है। समान विद्युत क्षेत्र में द्विध्रुव पर कुल बल शून्य होता है, परंतु बल आघूर्ण स्थिति पर निर्भर करता है।
गाउस के नियम के अनुसार, किसी बंद पृष्ठ से गुजरने वाला कुल वैद्युत फ्लक्स उस पृष्ठ द्वारा परिबद्ध कुल आवेश का $\frac{1}{\epsilon_0}$ गुना होता है।
$$\oint \vec{E} \cdot d\vec{A} = \frac{q_{enclosed}}{\epsilon_0}$$
वैद्युत फ्लक्स (Electric Flux) को $\phi = \oint \vec{E} \cdot d\vec{A} = EA\cos\theta$ से परिभाषित किया जाता है। इसकी SI इकाई $\text{N m}^2/\text{C}$ है।
$$E = \frac{\lambda}{2\pi\epsilon_0 r}$$
$$E = \frac{\sigma}{2\epsilon_0}$$
गाउस का नियम केवल सममित आवेश वितरणों के लिए विद्युत क्षेत्र की गणना को सरल बनाता है, जैसे गोलीय, बेलनाकार तथा समतल सममिति।
गाउस का नियम कूलॉम के व्युत्क्रम-वर्ग नियम की एक अभिव्यक्ति है। यदि कूलॉम का व्युत्क्रम-वर्ग नियम सत्य न होता तो गाउस का नियम भी परिवर्तित हो जाता। किसी धात्विक चालक के भीतर विद्युत क्षेत्र शून्य होता है, इसलिए अतिरिक्त आवेश चालक की बाहरी सतह पर ही वितरित रहता है। इसी कारण आवेशित चालक में आवेश पृष्ठ पर रहता है और गुब्बारे जैसी खोखली वस्तुएँ अंदर से आवेश-मुक्त रहती हैं। यह गाउस के नियम से सिद्ध किया जा सकता है।
विद्युत क्षेत्र के कर्ल (Curl) का मान हमेशा शून्य होता है, अर्थात $\nabla \times \vec{E} = 0$। इसका अर्थ है कि विद्युत क्षेत्र एक संरक्षी (Conservative) क्षेत्र है। विद्युत क्षेत्र के लिए गाउस का नियम विचलन (Divergence) रूप में $\nabla \cdot \vec{E} = \frac{\rho}{\epsilon_0}$ द्वारा व्यक्त होता है, जहाँ $\rho$ आवेश घनत्व है। ये दोनों समीकरण विद्युतचुंबकत्व की मैक्सवेल समीकरणों का आधार बनाते हैं।
किसी चालक में आवेश हमेशा उसकी बाहरी सतह पर वितरित होता है। सतह पर आवेश का वितरण एक समान नहीं होता, बल्कि वक्रता अधिक होने पर आवेश घनत्व अधिक होता है। नुकीले सिरों पर आवेश घनत्व सबसे अधिक होता है, इसलिए नुकीले चालक से आवेश आसानी से निकल सकता है। इसी सिद्धांत पर विद्युत-दिष्ट (Van de Graaff) जनित्र तथा बिजली की छड़ (Lightning Conductor) कार्य करते हैं।
| भौतिक राशि | सूत्र | इकाई |
|---|---|---|
| कूलॉम का बल | $F = \frac{1}{4\pi\epsilon_0}\frac{q_1q_2}{r^2}$ | न्यूटन (N) |
| विद्युत क्षेत्र | $E = \frac{F}{q_0}$ | $\text{N/C}$ या $\text{V/m}$ |
| बिंदु आवेश का क्षेत्र | $E = \frac{1}{4\pi\epsilon_0}\frac{q}{r^2}$ | $\text{N/C}$ |
| द्विध्रुव आघूर्ण | $p = q \times 2a$ | कूलॉम-मीटर (C m) |
| अक्षीय क्षेत्र | $E = \frac{2p}{4\pi\epsilon_0 r^3}$ | $\text{N/C}$ |
| निरक्षीय क्षेत्र | $E = \frac{p}{4\pi\epsilon_0 r^3}$ | $\text{N/C}$ |
| द्विध्रुव पर बल आघूर्ण | $\tau = pE\sin\theta$ | न्यूटन-मीटर (N m) |
| वैद्युत फ्लक्स | $\phi = EA\cos\theta$ | $\text{N m}^2/\text{C}$ |
| आवेश विन्यास | विद्युत क्षेत्र (दूरी $r$ पर) | विशेषता |
|---|---|---|
| बिंदु आवेश | $\frac{q}{4\pi\epsilon_0 r^2}$ | $\frac{1}{r^2}$ पर निर्भर |
| वैद्युत द्विध्रुव (अक्षीय) | $\frac{2p}{4\pi\epsilon_0 r^3}$ | $\frac{1}{r^3}$ पर निर्भर |
| अनंत रैखिक आवेश | $\frac{\lambda}{2\pi\epsilon_0 r}$ | $\frac{1}{r}$ पर निर्भर |
| अनंत समतल पृष्ठ | $\frac{\sigma}{2\epsilon_0}$ | दूरी से स्वतंत्र |
| गोलीय खोल (अंदर) | $0$ | शून्य |
वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र संपूर्ण विद्युतचुंबकत्व की आधारशिला है। आवेश के क्वांटीकरण, संरक्षण तथा योज्यता के गुणों से शुरू होकर कूलॉम का नियम, विद्युत क्षेत्र, वैद्युत द्विध्रुव तथा गाउस का नियम सभी विद्यार्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन संकल्पनाओं की दृढ़ पकड़ आगे के अध्यायों — विभव, धारिता, विद्युत धारा तथा चुंबकत्व — को समझने में सहायक सिद्ध होती है। नियमित अभ्यास, सूत्रों की पुनरावृत्ति तथा आरेखों के सही निरूपण से इस अध्याय में उच्चतम अंक प्राप्त किए जा सकते हैं।