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1. परिचय

पिछले अध्याय में हमने वैद्युत आवेश तथा विद्युत क्षेत्र का अध्ययन किया। इस अध्याय में हम स्थिरवैद्युत विभव (Electrostatic Potential) तथा धारिता (Capacitance) की संकल्पनाओं का विस्तार से अध्ययन करेंगे। विभव एक अदिश राशि है, जबकि विद्युत क्षेत्र एक सदिश राशि है। विभव का उपयोग करके विद्युत क्षेत्र की गणना आसानी से की जा सकती है। धारिता आवेश संग्रह करने की क्षमता है, जिसका व्यावहारिक उपयोग संधारित्र (Capacitor) में होता है। संधारित्र का उपयोग रेडियो, टेलीविजन, कंप्यूटर तथा विद्युत परिपथों में ऊर्जा संग्रहण तथा फिल्टरिंग के लिए किया जाता है। यह अध्याय विभव, विभवांतर, समविभव पृष्ठ, धारिता, संधारित्र तथा उनके संयोजनों की संकल्पनाओं पर केंद्रित है।

2. स्थिरवैद्युत विभव (Electrostatic Potential)

किसी बिंदु पर स्थिरवैद्युत विभव उस कार्य के बराबर होता है जो किसी एकांक धनावेश को अनंत से उस बिंदु तक लाने में किया जाता है। यह एक अदिश राशि है।

$$V = \frac{W}{q_0}$$

विभव की SI इकाई वोल्ट (V) है। $1 \text{ V} = 1 \text{ J/C}$। बिंदु आवेश $q$ के कारण दूरी $r$ पर विभव:

$$V = \frac{1}{4\pi\epsilon_0} \frac{q}{r}$$

किसी निकाय में कई आवेशों के कारण किसी बिंदु पर कुल विभव प्रत्येक आवेश के कारण विभव का अदिश योग होता है (अध्यारोपण सिद्धांत)।

विभव और विद्युत क्षेत्र में संबंध

विद्युत क्षेत्र विभव में होने वाले ऋणात्मक प्रवणता (Negative Gradient) के बराबर होता है।

$$E = -\frac{dV}{dr}$$

किसी बिंदु पर विभव उच्च विभव से निम्न विभव की ओर घटता है, जबकि विद्युत क्षेत्र की दिशा उच्च विभव से निम्न विभव की ओर होती है। एकांक आवेश को एक बिंदु से दूसरे बिंदु पर ले जाने में किया गया कार्य विभवांतर के बराबर होता है:

$$W = q_0 (V_A - V_B)$$

3. समविभव पृष्ठ (Equipotential Surfaces)

ऐसा पृष्ठ जिसके सभी बिंदुओं पर विभव समान होता है, समविभव पृष्ठ कहलाता है। समविभव पृष्ठ पर आवेश को एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने में कोई कार्य नहीं किया जाता है, क्योंकि विभवांतर शून्य होता है।

समविभव पृष्ठ के गुण:

  1. समविभव पृष्ठ पर विद्युत क्षेत्र हमेशा अभिलंब होता है।
  2. दो समविभव पृष्ठ कभी प्रतिच्छेद नहीं करते।
  3. समान विद्युत क्षेत्र के लिए ये पृष्ठ समांतर तथा समदूरस्थ होते हैं।
  4. बिंदु आवेश के लिए ये संकेंद्री गोले होते हैं।
  5. समविभव पृष्ठ पर आवेश को स्थानांतरित करने में शून्य कार्य होता है।

4. वैद्युत द्विध्रुव के कारण विभव

वैद्युत द्विध्रुव के कारण द्विध्रुव के केंद्र से दूरी $r$ पर तथा द्विध्रुव आघूर्ण से $\theta$ कोण पर स्थित बिंदु पर विभव:

$$V = \frac{1}{4\pi\epsilon_0} \frac{p\cos\theta}{r^2}$$

जहाँ $p = q \times 2a$ द्विध्रुव आघूर्ण है। अक्षीय बिंदु पर ($\theta = 0$): $V = \frac{p}{4\pi\epsilon_0 r^2}$, निरक्षीय बिंदु पर ($\theta = 90^\circ$): $V = 0$।

5. धारिता (Capacitance)

किसी चालक की आवेश संग्रह करने की क्षमता को उसकी धारिता कहते हैं। किसी चालक को दिया गया आवेश $Q$ उसके विभव $V$ के समानुपाती होता है।

$$Q = CV$$

यहाँ $C$ चालक की धारिता है। धारिता की SI इकाई फैरड (F) है। $1 \text{ F} = 1 \text{ C/V}$। एकांक आवेश द्वारा उत्पन्न विभव पर निर्भर करने वाला यह गुणांक चालक के आकार, आकृति तथा माध्यम पर निर्भर करता है, न कि आवेश या विभव पर।

एक गोलीय चालक जिसकी त्रिज्या $R$ है, की धारिता:

$$C = 4\pi\epsilon_0 R$$

6. संधारित्र और समांतर प्लेट संधारित्र (Capacitor and Parallel Plate Capacitor)

दो चालकों का ऐसा संयोजन जिसमें वे एक-दूसरे से किसी विद्युतरोधक (परावैद्युत) माध्यम द्वारा पृथक रहते हैं, संधारित्र कहलाता है। संधारित्र का सबसे सरल रूप समांतर प्लेट संधारित्र है जिसमें $A$ क्षेत्रफल की दो समांतर धात्विक प्लेटें $d$ दूरी पर रखी होती हैं।

समांतर प्लेट संधारित्र की धारिता:

निर्वात में: $C_0 = \frac{\epsilon_0 A}{d}$

परावैद्युत माध्यम में (परावैद्युतांक $K$): $C = \frac{K\epsilon_0 A}{d} = KC_0$

परावैद्युत का प्रभाव: परावैद्युत रखने से धारिता $K$ गुना बढ़ जाती है। परावैद्युत को पूर्णतः भरने पर धारिता $K$ गुना हो जाती है, जबकि आंशिक रूप से भरने पर धारिता केवल आंशिक रूप से बढ़ती है। परावैद्युत के अंदर विद्युत क्षेत्र $\frac{1}{K}$ गुना हो जाता है तथा विभवांतर भी $\frac{1}{K}$ गुना हो जाता है।

गोलीय संधारित्र की धारिता

दो संकेंद्री गोलों (त्रिज्याएँ $R_a$ और $R_b$, $R_b > R_a$) से बने संधारित्र की धारिता:

$$C = 4\pi\epsilon_0 \frac{R_a R_b}{R_b - R_a}$$

7. आवेशित संधारित्र की ऊर्जा (Energy Stored in a Capacitor)

संधारित्र को आवेशित करने में किया गया कुल कार्य उसमें स्थितिज ऊर्जा के रूप में संग्रहीत हो जाता है।

$$U = \frac{1}{2} CV^2 = \frac{1}{2} QV = \frac{Q^2}{2C}$$

संधारित्र के अंदर संग्रहीत ऊर्जा उसके प्लेटों के बीच के विद्युत क्षेत्र में संग्रहीत होती है। ऊर्जा घनत्व (Energy Density):

$$u = \frac{1}{2}\epsilon_0 E^2$$

8. संधारित्रों का संयोजन (Combination of Capacitors)

श्रेणीक्रम संयोजन (Series Combination)

श्रेणीक्रम में जुड़े संधारित्रों में आवेश समान होता है, जबकि विभवांतर विभाजित हो जाता है। तुल्य धारिता:

$$\frac{1}{C_s} = \frac{1}{C_1} + \frac{1}{C_2} + \frac{1}{C_3} + \ldots$$

श्रेणीक्रम में तुल्य धारिता सबसे छोटे संधारित्र की धारिता से भी कम होती है।

समांतर क्रम संयोजन (Parallel Combination)

समांतर क्रम में जुड़े संधारित्रों में विभवांतर समान होता है, जबकि आवेश विभाजित हो जाता है। तुल्य धारिता:

$$C_p = C_1 + C_2 + C_3 + \ldots$$

समांतर क्रम में तुल्य धारिता सबसे बड़े संधारित्र की धारिता से भी अधिक होती है।

9. संधारित्र पर लगाया गया परावैद्युत पदार्थ

परावैद्युत पदार्थ अचालक होते हैं जो विद्युत क्षेत्र में रखने पर ध्रुवित (Polarize) हो जाते हैं। परावैद्युत में अणुओं के विद्युत द्विध्रुव आघूर्णों का संरेखण हो जाता है। इसके कारण परावैद्युत की सतह पर पृष्ठ आवेश उत्पन्न हो जाता है जो मुक्त आवेशों के प्रभाव को आंशिक रूप से रद्द कर देता है, जिससे धारिता बढ़ जाती है। धारिता बढ़ाने के अलावा परावैद्युत कुछ और भी लाभ देते हैं — ये प्लेटों के बीच के विद्युत क्षेत्र को सीमित रखते हैं, संधारित्र का आकार छोटा रखने में सहायक होते हैं, तथा उच्च वोल्टता पर आयनन से होने वाले विद्युत भंजन (Breakdown) से संधारित्र की सुरक्षा करते हैं।

10. अवयवों के बीच ऊर्जा का वितरण

दो आवेशित संधारित्रों को परस्पर जोड़ने पर आवेश का पुनर्वितरण होता है और कुल ऊर्जा में ह्रास होता है। इस ह्रास की मात्रा $\frac{1}{2}\frac{C_1C_2}{C_1+C_2}(V_1 - V_2)^2$ के बराबर होती है। यह ऊर्जा जूल तापन (Joule Heating) के रूप में नष्ट हो जाती है। कुल आवेश संरक्षित रहता है, परंतु कुल ऊर्जा संरक्षित नहीं रहती।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: महत्वपूर्ण सूत्र

भौतिक राशि सूत्र टिप्पणी
विभव $V = \frac{W}{q_0}$ अदिश राशि, इकाई वोल्ट
बिंदु आवेश का विभव $V = \frac{q}{4\pi\epsilon_0 r}$ $r$ पर व्युत्क्रमानुपाती
विद्युत क्षेत्र-विभव $E = -\frac{dV}{dr}$ प्रवणता
द्विध्रुव का विभव $V = \frac{p\cos\theta}{4\pi\epsilon_0 r^2}$ निरक्षीय पर शून्य
धारिता $C = \frac{Q}{V}$ इकाई फैरड
समांतर प्लेट $C = \frac{\epsilon_0 A}{d}$ परावैद्युत से K गुना
ऊर्जा $U = \frac{1}{2}CV^2$ $\frac{Q^2}{2C}$ के तुल्य

तालिका 2: श्रेणी एवं समांतर संयोजन

संयोजन तुल्य धारिता विशेषता
श्रेणीक्रम $\frac{1}{C_s} = \sum\frac{1}{C_i}$ आवेश समान, विभव विभाजित
समांतर क्रम $C_p = \sum C_i$ विभव समान, आवेश विभाजित

माइंड मैप

graph TD A["स्थिरवैद्युत विभव तथा धारिता"] --> B["विभव V"] B --> B1["V = W/q₀"] B --> B2["बिंदु आवेश: V = q/4πε₀r"] B --> B3["E = -dV/dr"] A --> C["समविभव पृष्ठ"] C --> C1["कार्य शून्य"] C --> C2["E पृष्ठ के अभिलंब"] A --> D["धारिता C = Q/V"] D --> D1["समांतर प्लेट: C = ε₀A/d"] D --> D2["गोलीय: C = 4πε₀RaRb/(Rb-Ra)"] A --> E["ऊर्जा U = ½CV²"] E --> E1["ऊर्जा घनत्व u = ½ε₀E²"] A --> F["संधारित्र संयोजन"] F --> F1["श्रेणी: 1/Cs = Σ1/Ci"] F --> F2["समांतर: Cp = ΣCi"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

आरेख 1: समांतर प्लेट संधारित्र

समांतर प्लेट संधारित्र धन प्लेट (+Q) ऋण प्लेट (-Q) E = σ/ε₀ दूरी d क्षेत्रफल A स्वर्ण नियम: C = ε₀A/d, परावैद्युत (K) भरने पर C = KC₀ धारिता क्षेत्रफल के समानुपाती तथा प्लेटों के बीच दूरी के व्युत्क्रमानुपाती होती है

आरेख 2: श्रेणी एवं समांतर संयोजन की तुलना

संधारित्रों का संयोजन श्रेणीक्रम संयोजन समांतर क्रम संयोजन C₁ C₂ C₁ C₂ C₃ 1/Cs = 1/C₁ + 1/C₂ Cp = C₁ + C₂ + C₃ सभी में आवेश समान सभी में विभव समान तुल्य धारिता सबसे कम तुल्य धारिता सबसे अधिक Golden Rule: श्रेणी में आवेश समान, समांतर में विभव समान श्रेणीक्रम तुल्य धारिता घटाता है, समांतर क्रम बढ़ाता है

सामान्य गलतियाँ

  1. विभव को सदिश राशि मान लेना गलत है; विभव अदिश होता है और बिंदु आवेशों के कारण विभवों का योग बीजगणितीय होता है।
  2. $E = -\frac{dV}{dr}$ में ऋणात्मक चिह्न भूल जाना; ऋणात्मक चिह्न इंगित करता है कि क्षेत्र की दिशा विभव घटने की ओर है।
  3. श्रेणीक्रम में तुल्य धारिता को जोड़ देना (सूत्र के बजाय) बड़ी भूल है।
  4. संधारित्र की ऊर्जा $U = \frac{1}{2}CV^2$ में $\frac{1}{2}$ भूल जाना।
  5. समविभव पृष्ठ पर आवेश को ले जाने में कार्य को गैर-शून्य मान लेना।
  6. धारिता को आवेश पर निर्भर बताना गलत है; धारिता केवल आकार, आकृति और माध्यम पर निर्भर करती है।
  7. परावैद्युत भरने पर विभवांतर और क्षेत्र के $K$ गुना बढ़ने की अवधारणा को उलटा करना; वास्तव में इनमें $1/K$ गुना कमी आती है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. समांतर प्लेट संधारित्र में परावैद्युत भरने के तीनों मामलों (पूर्ण भरना, आंशिक भरना, तथा प्लेटों में परत के रूप में भरना) का अभ्यास करें।
  2. श्रेणीक्रम केवल दो संधारित्रों के लिए तुल्य धारिता का सरलीकृत सूत्र $C = \frac{C_1C_2}{C_1+C_2}$ याद रखें।
  3. ऊर्जा के तीनों रूप $U = \frac{1}{2}CV^2 = \frac{1}{2}QV = \frac{Q^2}{2C}$ को लिखना सीखें; स्थिति के अनुसार उचित रूप चुनें।
  4. आवेशित संधारित्र का प्लेट हटाने या प्लेटों की दूरी बदलने पर क्या होता है — इस प्रकार के तर्कात्मक प्रश्न परीक्षा में आते हैं। ध्यान दें कि बैटरी जुड़ी होने पर विभव नियत रहता है, बैटरी हटाने पर आवेश नियत रहता है।
  5. गोलीय संधारित्र और गोलीय चालक की धारिता के सूत्रों में अंतर याद रखें।
  6. अधिकांश प्रश्न परावैद्युत स्थिरांक K के प्रभाव पर केंद्रित होते हैं; K से जुड़े सूत्रों की पुनरावृत्ति करें।
  7. समविभव पृष्ठ के गुणों को उदाहरण सहित लिखें, क्योंकि यहाँ से 2-3 अंक के सैद्धांतिक प्रश्न अक्सर आते हैं।

निष्कर्ष

स्थिरवैद्युत विभव तथा धारिता अध्याय विद्युत क्षेत्र की ऊर्जा संबंधी अवधारणाओं को स्पष्ट करता है। विभव, समविभव पृष्ठ, धारिता, संधारित्रों के संयोजन तथा संग्रहीत ऊर्जा की समझ आधुनिक इलेक्ट्रॉनिकी का आधार है। संधारित्र के उपयोग विद्युत परिपथों, फिल्टर, टाइमर तथा फ्लैश कैमरों में होते हैं। इन संकल्पनाओं की पक्की समझ विद्युत धारा तथा प्रत्यावर्ती धारा जैसे आगामी अध्यायों में अत्यंत सहायक सिद्ध होगी। इस अध्याय के सूत्रों एवं उनके भौतिक अर्थों को अच्छी तरह समझकर अभ्यास करने से परीक्षा में उच्च अंक सुनिश्चित किए जा सकते हैं।