इस अध्याय में हम अर्धचालक पदार्थों और उनसे बने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का अध्ययन करेंगे। अर्धचालक वे पदार्थ होते हैं जिनकी चालकता चालकों (जैसे ताँबा) और अचालकों (जैसे रबर) के बीच होती है। सिलिकॉन और जर्मेनियम सबसे सामान्य अर्धचालक हैं। अर्धचालक पदार्थों में डोपन (Doping) द्वारा n-प्रकार और p-प्रकार अर्धचालक बनाए जाते हैं। इन्हीं से p-n संधि डायोड, ट्रांजिस्टर और विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाए जाते हैं। आधुनिक कंप्यूटर, मोबाइल और संपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक्स इन्हीं अर्धचालक उपकरणों पर आधारित हैं।
ठोस पदार्थों में परमाणुओं के इलेक्ट्रॉनों के ऊर्जा स्तर मिलकर ऊर्जा बैंड बनाते हैं। मुख्य बैंड:
| पदार्थ | निषिद्ध अंतराल (E_g) |
|---|---|
| चालक (धातु) | $E_g = 0$ या बैंड ओवरलैप |
| अर्धचालक | $E_g \approx 1$ eV (Si: 1.14 eV, Ge: 0.67 eV) |
| अचालक | $E_g > 3$ eV (हीरा: 5.8 eV) |
अर्धचालकों की चालकता ताप बढ़ने पर बढ़ती है (चालकों के विपरीत), क्योंकि ताप से इलेक्ट्रॉन चालन बैंड में संक्रमण करते हैं।
शुद्ध (डोपन-रहित) अर्धचालक को आंतरिक अर्धचालक कहते हैं। सिलिकॉन में प्रत्येक सिलिकॉन परमाणु अपने 4 संयोजकता इलेक्ट्रॉनों द्वारा 4 पड़ोसी परमाणुओं से सहसंयोजक बंध बनाता है। कमरे के ताप पर कुछ सहसंयोजक बंध टूटते हैं, जिससे इलेक्ट्रॉन-छिद्र युग्म उत्पन्न होते हैं। इनमें:
आंतरिक अर्धचालक में $n_e = n_h$ होता है।
शुद्ध अर्धचालक में अशुद्धता मिलाकर उसकी चालकता नियंत्रित की जाती है। इस प्रक्रिया को डोपन (Doping) कहते हैं।
सिलिकॉन में पंचसंयोजक (Pentavalent) अशुद्धता (फॉस्फोरस, आर्सेनिक, एंटीमनी) मिलाने से बनता है। प्रत्येक अशुद्धता परमाणु अपने 4 इलेक्ट्रॉन बंध के लिए देता है, और 5वाँ इलेक्ट्रॉन मुक्त रह जाता है। इससे अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन (दाता, Donor) मिलते हैं। बहुसंख्यक वाहक इलेक्ट्रॉन और अल्पसंख्यक वाहक छिद्र होते हैं।
सिलिकॉन में त्रिसंयोजक (Trivalent) अशुद्धता (बोरॉन, एल्युमिनियम, इंडियम) मिलाने से बनता है। प्रत्येक अशुद्धता परमाणु में एक बंध अधूरा रहता है, जिसे छिद्र (ग्राही, Acceptor) कहते हैं। बहुसंख्यक वाहक छिद्र और अल्पसंख्यक वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं।
यद्यपि n-प्रकार अर्धचालक में अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं, परंतु समग्र रूप से यह विद्युत उदासीन रहता है, क्योंकि परमाणुओं का कुल आवेश संतुलित होता है।
जब p-प्रकार और n-प्रकार अर्धचालकों को एक साथ मिलाया जाता है, तो उनके बीच की सीमा पर p-n संधि बनती है। संधि के निकट विसरण के कारण आवेश वाहक पुनः संयोजित होते हैं और एक आवेश-विहीन क्षेत्र (Depletion Region) बनता है। इस क्षेत्र में बाधक विभव (Barrier Potential) होता है। सिलिकॉन के लिए बाधक विभव लगभग 0.7 V और जर्मेनियम के लिए 0.3 V होता है।
जब p-प्रकार को बैटरी के धन टर्मिनल से और n-प्रकार को ऋण टर्मिनल से जोड़ा जाता है, तो अग्र अभिनति कहलाती है। इसमें बाधक विभव घटता है और धारा आसानी से प्रवाहित होती है।
जब p-प्रकार को ऋण टर्मिनल से और n-प्रकार को धन टर्मिनल से जोड़ा जाता है, तो पश्च अभिनति होती है। इसमें बाधक विभव बढ़ता है और धारा लगभग शून्य होती है (केवल अल्पसंख्यक वाहकों की छोटी धारा)।
p-n संधि डायोड में एक दिशा में धारा प्रवाह की अनुमति होती है, इसलिए इसे एकदिशीय चालक कहते हैं। डायोड की विशेषताएँ:
डायोड का उपयोग: 1. दिष्टकारी (Rectifier) के रूप में — AC को DC में बदलना 2. संसूचक (Detector) के रूप में — AM सिग्नल का संसूचन 3. लाइट एमिटिंग डायोड (LED) 4. ज़ेनर डायोड — वोल्टता नियमन में
दो डायोडों और केंद्र-टैप ट्रांसफार्मर द्वारा बना पूर्ण तरंग दिष्टकारी प्रत्यावर्ती वोल्टता के दोनों अर्धचक्रों में धारा प्रवाहित करता है। इसकी दक्षता अर्ध तरंग दिष्टकारी से अधिक होती है।
ज़ेनर डायोड विशेष रूप से डोपित पश्च-अभिनत डायोड है जो भंजन क्षेत्र में कार्य करता है। यह वोल्टता नियमन (Voltage Regulation) में उपयोग होता है। पश्च अभिनति में भंजन वोल्टता के बाद भी धारा बढ़ने पर भी वोल्टता स्थिर रहती है।
ट्रांजिस्टर तीन टर्मिनलों वाला अर्धचालक उपकरण है। यह दो प्रकार के होते हैं — n-p-n और p-n-p। इसमें तीन क्षेत्र होते हैं: उत्सर्जक (Emitter, E), आधार (Base, B) और संग्राहक (Collector, C)।
$$I_E = I_B + I_C$$
$$\beta = \frac{\Delta I_C}{\Delta I_B}$$
n-p-n ट्रांजिस्टर में इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक वाहक होते हैं, जो उत्सर्जक से संग्राहक की ओर प्रवाहित होते हैं। आधार बहुत पतला होने के कारण अधिकांश वाहक आधार से होकर संग्राहक में पहुँच जाते हैं।
डिजिटल इलेक्ट्रॉनिकी में केवल दो अवस्थाएँ होती हैं — उच्च (1) और निम्न (0)। तर्क गेट (Logic Gates) डिजिटल परिपथों के मूलभूत खंड हैं:
NAND और NOR गेट को सार्वत्रिक गेट (Universal Gates) कहते हैं, क्योंकि इनसे कोई भी अन्य गेट बनाया जा सकता है। NAND गेट की सत्य सारणी: जब दोनों इनपुट 1 हों तभी आउटपुट 0, अन्यथा आउटपुट 1।
| A | B | AND | OR | NAND | NOR |
|---|---|---|---|---|---|
| 0 | 0 | 0 | 0 | 1 | 1 |
| 0 | 1 | 0 | 1 | 1 | 0 |
| 1 | 0 | 0 | 1 | 1 | 0 |
| 1 | 1 | 1 | 1 | 0 | 0 |
| उपकरण | टर्मिनल | मुख्य उपयोग |
|---|---|---|
| p-n डायोड | 2 (एनोड, कैथोड) | दिष्टकारी |
| ज़ेनर डायोड | 2 | वोल्टता नियमन |
| LED | 2 | प्रकाश उत्सर्जन |
| ट्रांजिस्टर | 3 (E, B, C) | प्रवर्धन, स्विचिंग |
अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी आधुनिक प्रौद्योगिकी की रीढ़ है। अर्धचालक पदार्थों के गुणों को समझकर n-प्रकार और p-प्रकार अर्धचालक बनाए जाते हैं, जिनसे p-n संधि, डायोड और ट्रांजिस्टर बनते हैं। डायोड का उपयोग दिष्टकरण में, ज़ेनर डायोड का वोल्टता नियमन में और ट्रांजिस्टर का प्रवर्धन तथा स्विचिंग में होता है। डिजिटल इलेक्ट्रॉनिकी के तर्क गेट कंप्यूटर और डिजिटल उपकरणों का आधार हैं। इन संकल्पनाओं की गहरी समझ इलेक्ट्रॉनिक्स, संचार और कंप्यूटर विज्ञान के आगे के अध्ययन के लिए आवश्यक है। अगले अध्याय — संचार व्यवस्था — में हम इन्हीं उपकरणों के उपयोग का अध्ययन करेंगे।