इस अध्याय में हम प्रकाश के तरंग स्वरूप का अध्ययन करेंगे। जहाँ किरण प्रकाशिकी में प्रकाश को सरल रेखा में संचरण करने वाला माना जाता था, वहीं तरंग प्रकाशिकी में प्रकाश को विद्युतचुंबकीय तरंग माना जाता है। हाइगेन्स ने प्रकाश के तरंग सिद्धांत का प्रतिपादन किया। तरंग प्रकाशिकी में व्यतिकरण (Interference), विवर्तन (Diffraction) तथा ध्रुवण (Polarization) जैसी घटनाओं का अध्ययन किया जाता है। यंग का द्वि-स्लिट प्रयोग, फ्रेस्नेल तथा फ्राउनहोफर विवर्तन तथा ध्रुवण के नियम इस अध्याय के मुख्य विषय हैं। प्रकाश के तरंग रूप को समझना आधुनिक भौतिकी की नींव है।
हाइगेन्स ने 1678 में प्रकाश का तरंग सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसके अनुसार:
हाइगेन्स के सिद्धांत द्वारा परावर्तन और अपवर्तन के नियमों को ज्यामितीय रूप से सिद्ध किया जा सकता है। तरंग अग्रभाग (Wavefront) दो प्रकार के होते हैं — समतल (Plane) तथा गोलाकार (Spherical)। स्रोत से काफी दूरी पर गोलाकार तरंग अग्रभाग लगभग समतल हो जाता है।
जब दो संगत (Coherent) प्रकाश तरंगें अध्यारोपित होती हैं, तो प्रकाश की तीव्रता का पुनर्वितरण होता है। इस घटना को व्यतिकरण कहते हैं। व्यतिकरण के दो प्रकार हैं:
जब दोनों तरंगों का पथांतर तरंगदैर्घ्य का पूर्ण गुणज ($0, \lambda, 2\lambda, \ldots$) होता है, तो तीव्रता अधिकतम होती है:
$$\Delta x = n\lambda, \quad n = 0, 1, 2, \ldots$$
जब पथांतर विषम गुणज ($\lambda/2, 3\lambda/2, \ldots$) होता है, तो तीव्रता न्यूनतम (शून्य) होती है:
$$\Delta x = (2n+1)\frac{\lambda}{2}, \quad n = 0, 1, 2, \ldots$$
$I_1$ और $I_2$ तीव्रता वाली दो तरंगों के अध्यारोपण पर:
$$I = I_1 + I_2 + 2\sqrt{I_1 I_2}\cos\phi$$
यदि $I_1 = I_2 = I_0$, तो:
$$I_{max} = 4I_0, \quad I_{min} = 0$$
यंग ने 1801 में दो स्लिटों से प्रकाश गुजारकर व्यतिकरण प्रदर्शित किया। इस प्रयोग से प्रकाश के तरंग स्वरूप का प्रमाण मिला। स्लिटों से दूरी $D$ पर पर्दे पर व्यतिकरण फ्रिंज बनते हैं। दो स्लिटों के बीच की दूरी $d$ हो, तो:
$$\beta = \frac{\lambda D}{d}$$
$$y_n = \frac{n\lambda D}{d}$$
$$y_n = \frac{(2n+1)\lambda D}{2d}$$
यंग के प्रयोग की शर्तों के अनुसार स्लिटें बहुत पतली और निकट होनी चाहिए। यंग के प्रयोग में पर्दे पर बनी फ्रिंजें सामान रूप से समान चौड़ाई की होती हैं। यदि स्लिटें एक-दूसरे के निकट हों (d कम), तो फ्रिंज चौड़ी होती हैं।
तरंग सिद्धांत को सिद्ध करने वाली मुख्य घटनाएँ व्यतिकरण और विवर्तन हैं। इन घटनाओं को कण सिद्धांत (न्यूटन का कणिका सिद्धांत) द्वारा समझाया नहीं जा सकता। इसके अतिरिक्त ध्रुवण केवल अनुप्रस्थ तरंगों में होता है, जो यह सिद्ध करता है कि प्रकाश तरंगें अनुप्रस्थ होती हैं।
जब प्रकाश किसी संकीर्ण छिद्र या बाधा के किनारे से गुजरता है, तो वह अपने सरल रेखीय पथ से विचलित हो जाता है और बाधा के किनारों में प्रवेश करता है। इस घटना को विवर्तन कहते हैं। विवर्तन प्रत्येक प्रकार की तरंगों में होता है, परंतु प्रकाश का तरंगदैर्घ्य बहुत कम होने के कारण यह सामान्य स्थितियों में स्पष्ट नहीं दिखता।
चौड़ाई $a$ की एकल स्लिट के विवर्तन में केन्द्रीय उच्चिष्ठ (Central Maximum) सबसे चमकीला और सबसे चौड़ा होता है। निम्निष्ठ की स्थिति:
$$a\sin\theta = n\lambda$$
केन्द्रीय उच्चिष्ठ की कोणीय चौड़ाई:
$$2\theta = \frac{2\lambda}{a}$$
केन्द्रीय उच्चिष्ठ दोनों ओर के द्वितीयक उच्चिष्ठों से दोगुना चौड़ा होता है।
सामान्य प्रकाश में विद्युत क्षेत्र सभी दिशाओं में कंपन करता है। जब प्रकाश किसी विशेष तल में कंपन करने लगता है, तो उसे ध्रुवित प्रकाश कहते हैं। ध्रुवण केवल अनुप्रस्थ तरंगों में होता है, जो सिद्ध करता है कि प्रकाश तरंगें अनुप्रस्थ हैं।
जब परावर्तित और अपवर्तित किरणें परस्पर लंबवत होती हैं, तो परावर्तित प्रकाश पूर्णतः ध्रुवित होता है। इस कोण को ध्रुवण कोण ($i_p$) कहते हैं:
$$\tan i_p = n$$
यहाँ $n$ माध्यम का अपवर्तनांक है। कांच के लिए ध्रुवण कोण लगभग $57^\circ$ होता है।
ध्रुवित प्रकाश की तीव्रता जब विश्लेषक (Analyzer) से गुजरती है:
$$I = I_0 \cos^2\theta$$
यहाँ $\theta$ ध्रुवक और विश्लेषक के अक्षों के बीच का कोण है। जब $\theta = 90^\circ$, तो तीव्रता शून्य होती है।
| घटना | सूत्र |
|---|---|
| फ्रिंज चौड़ाई | $\beta = \lambda D/d$ |
| उज्ज्वल फ्रिंज | $y_n = n\lambda D/d$ |
| अदीप्त फ्रिंज | $y_n = (2n+1)\lambda D/2d$ |
| एकल स्लिट निम्निष्ठ | $a\sin\theta = n\lambda$ |
| केन्द्रीय उच्चिष्ठ कोण | $2\theta = 2\lambda/a$ |
| ब्रूस्टर नियम | $\tan i_p = n$ |
| मालस नियम | $I = I_0\cos^2\theta$ |
| गुण | व्यतिकरण | विवर्तन |
|---|---|---|
| स्रोत | दो स्लिट | एक स्लिट |
| फ्रिंज | समान चौड़ाई | असमान चौड़ाई |
| तीव्रता | समान | घटती जाती है |
तरंग प्रकाशिकी प्रकाश के तरंग स्वरूप को स्थापित करता है। हाइगेन्स का सिद्धांत, व्यतिकरण, विवर्तन और ध्रुवण प्रकाश की तरंग प्रकृति के प्रबल प्रमाण हैं। यंग का द्वि-स्लिट प्रयोग और एकल स्लिट विवर्तन प्रकाश की तरंग प्रकृति को समझाने वाले क्लासिक प्रयोग हैं। ध्रुवण केवल अनुप्रस्थ तरंगों में होने से सिद्ध होता है कि प्रकाश अनुप्रस्थ तरंग है। इन संकल्पनाओं की समझ आधुनिक प्रकाशिकी, होलोग्राफी और ऑप्टिकल इंस्ट्रूमेंटेशन के लिए आवश्यक है। अगले अध्याय — विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति — में हम प्रकाश के कण रूप का अध्ययन करेंगे, जो तरंग संकल्पना को पूरक करता है।