स्वतंत्रता के बाद भारत ने अपनी विदेश नीति का निर्माण किया, जो देश की राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और वैश्विक शांति के लक्ष्यों पर आधारित थी। भारत की विदेश नीति के प्रमुख सिद्धांत थे- गुटनिरपेक्षता, पंचशील, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, उपनिवेशवाद-विरोध और मानवाधिकारों का सम्मान। भारत ने संयुक्त राष्ट्र, गुटनिरपेक्ष आंदोलन और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाई। नेहरू भारत की विदेश नीति के प्रमुख वास्तुकार थे। इस अध्याय में हम भारत की विदेश नीति के सिद्धांत, पंचशील, गुटनिरपेक्षता, भारत-पाकिस्तान संबंध, भारत-चीन संबंध, भारत-अमेरिका संबंध, भारत-सोवियत संघ संबंध और विदेश नीति में बदलावों का अध्ययन करेंगे।
भारत की विदेश नीति कुछ मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित थी। प्रथम, गुटनिरपेक्षता- भारत ने शीत युद्ध के दौरान किसी भी महाशक्ति के सैन्य गुट में शामिल होने से इनकार किया। द्वितीय, पंचशील के सिद्धांत- ये पाँच सिद्धांत शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर आधारित थे। तृतीय, उपनिवेशवाद और नस्लभेद का विरोध- भारत ने दुनिया भर में उपनिवेशवाद और नस्लभेद के विरुद्ध आवाज उठाई। चतुर्थ, विश्व शांति का समर्थन- भारत ने निरस्त्रीकरण और परमाणु अप्रसार को बढ़ावा दिया। पंचम, विकासशील देशों का समर्थन- भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन और दक्षिण-दक्षिण सहयोग में सक्रिय भूमिका निभाई। भारत की विदेश नीति में 'राष्ट्रीय हित' सर्वोपरि रहा, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और क्षेत्रीय स्थिरता शामिल थी।
पंचशील के पाँच सिद्धांत 1954 में भारत और चीन के बीच संपन्न हुए समझौते में निहित थे। ये सिद्धांत इस प्रकार हैं- (1) एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के लिए पारस्परिक सम्मान, (2) पारस्परिक आक्रमण न करना, (3) एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, (4) समानता और पारस्परिक लाभ, (5) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व। पंचशील के सिद्धांत भारत और चीन के बीच तिब्बत के मुद्दे पर हुए समझौते (1954) में शामिल थे। ये सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय संबंधों में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का आधार बने और बाद में 'बांडुंग सम्मेलन' (1955) में इन्हें मान्यता मिली।
1955 में इंडोनेशिया के बांडुंग में एशियाई-अफ्रीकी देशों का सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें 29 देशों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में पंचशील के सिद्धांतों को व्यापक रूप से मान्यता मिली और उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष तथा विकासशील देशों के सहयोग पर जोर दिया गया। बांडुंग सम्मेलन ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव तैयार की।
भारत और पाकिस्तान के बीच 1947 में विभाजन के बाद से ही जटिल संबंध रहे हैं। प्रमुख मुद्दों में कश्मीर विवाद, सिंधु जल विवाद, शरणार्थी समस्या और सीमा विवाद शामिल हैं। 1947-48 और 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध हुए। 1965 के युद्ध के बाद 1966 में 'ताशकंद समझौता' संपन्न हुआ, जिसमें भारत की ओर से लाल बहादुर शास्त्री ने हस्ताक्षर किए। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के संकट के कारण युद्ध हुआ और बांग्लादेश का निर्माण हुआ। 1972 में 'शिमला समझौता' इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच संपन्न हुआ, जिसमें दोनों देशों ने विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से हल करने पर सहमति व्यक्त की। 1999 में कारगिल युद्ध भी हुआ। इन सभी घटनाओं के बावजूद दोनों देशों के बीच शांति और सहयोग के प्रयास भी चलते रहे, जैसे 1999 की लाहौर घोषणा।
भारत और चीन के बीच संबंध पंचशील के सिद्धांतों पर शुरू हुए, परंतु सीमा विवाद के कारण संबंधों में तनाव आया। 1954 में भारत-चीन समझौते में पंचशील के सिद्धांतों को शामिल किया गया। परंतु 1962 में भारत-चीन सीमा विवाद (मैकमोहन रेखा और एक्सेल चिन क्षेत्र) के कारण युद्ध हुआ, जिसमें भारत को सैन्य पराजय का सामना करना पड़ा। 1962 के युद्ध ने भारत-चीन संबंधों को गहराई से प्रभावित किया और भारत ने अपनी सुरक्षा नीति पर पुनर्विचार किया। 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चीन की यात्रा की, जिससे दोनों देशों के संबंधों में सुधार की शुरुआत हुई। वर्तमान में भारत और चीन आर्थिक सहयोग बढ़ा रहे हैं, परंतु सीमा विवाद (जैसे 2020 का गलवान घाटी संघर्ष) बना हुआ है।
शीत युद्ध के दौरान भारत और सोवियत संघ के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध रहे। 1971 में भारत-सोवियत मैत्री संधि हुई, जो भारत के लिए सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण थी। सोवियत संघ ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का समर्थन किया और आर्थिक सहायता प्रदान की। सोवियत संघ के विघटन (1991) के बाद भारत और अमेरिका के बीच संबंधों में सुधार हुआ। 1991 के बाद भारत ने 'पूर्व की ओर देखो नीति' (Look East Policy) शुरू की और आर्थिक सुधारों के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ा। 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौता (Indo-US Nuclear Deal) संपन्न हुआ, जिसने दोनों देशों के संबंधों में नया अध्याय जोड़ा। वर्तमान में भारत अमेरिका, रूस, चीन, यूरोपीय संघ, जापान, आसियान और मध्य पूर्व के देशों के साथ बहुआयामी संबंध विकसित कर रहा है।
भारत की विदेश नीति में समय के साथ बदलाव आए हैं। गुटनिरपेक्षता के युग से भारत अब 'बहुध्रुवीय विश्व' में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। भारत ने 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' (Act East Policy) के तहत आसियान देशों के साथ संबंध मजबूत किए। भारत ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन (SCO), क्वाड (Quad) जैसे मंचों का सदस्य है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की माँग भी की है। भारत की विदेश नीति में राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक शासन में सुधार प्रमुख प्राथमिकताएँ हैं। भारत विकासशील देशों की आवाज बनकर 'ग्लोबल साउथ' का प्रतिनिधित्व भी करता है।
| वर्ष | घटना/समझौता | विवरण |
|---|---|---|
| 1954 | पंचशील समझौता | भारत-चीन शांति सिद्धांत |
| 1955 | बांडुंग सम्मेलन | एशियाई-अफ्रीकी सहयोग |
| 1962 | भारत-चीन युद्ध | सीमा विवाद |
| 1966 | ताशकंद समझौता | भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद |
| 1971 | भारत-सोवियत मैत्री संधि | सुरक्षा सहयोग |
| 1972 | शिमला समझौता | इंदिरा गांधी-भुट्टो |
| सिद्धांत | विवरण |
|---|---|
| गुटनिरपेक्षता | किसी गुट में शामिल न होना |
| पंचशील | शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के 5 सिद्धांत |
| उपनिवेशवाद-विरोध | उपनिवेशवाद और नस्लभेद का विरोध |
| निरस्त्रीकरण | विश्व शांति का समर्थन |
भारत की विदेश नीति स्वतंत्रता के बाद से ही गुटनिरपेक्षता, पंचशील, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और उपनिवेशवाद-विरोध जैसे सिद्धांतों पर आधारित रही है। नेहरू के नेतृत्व में भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई और बांडुंग सम्मेलन (1955) में विकासशील देशों की आवाज उठाई। भारत-पाकिस्तान संबंध कश्मीर विवाद से प्रभावित रहे, जबकि भारत-चीन संबंधों में 1962 का युद्ध निर्णायक था। शीत युद्ध के दौरान भारत-सोवियत मैत्री संधि (1971) ने भारत की सुरक्षा में योगदान दिया। सोवियत विघटन के बाद भारत ने अमेरिका के साथ संबंध सुधारे और 2008 के परमाणु समझौते से नया अध्याय जुड़ा। वर्तमान में भारत 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' और बहुध्रुवीय विश्व में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। भारत की विदेश नीति का उद्देश्य हमेशा से राष्ट्रीय हित, विश्व शांति और आर्थिक विकास रहा है, जो आज भी कायम है।