1980 के दशक के उत्तरार्ध और 1990 के दशक में भारतीय राजनीति में गहरे बदलाव हुए। इन बदलावों में कांग्रेस के वर्चस्व का अंत, गठबंधन की राजनीति का उदय, क्षेत्रीय दलों का प्रभाव, जातीय और सामाजिक आंदोलनों का उभरना और आर्थिक सुधार शामिल थे। राजीव गांधी की सरकार (1984-89) के बाद भारत में गठबंधन सरकारों का युग शुरू हुआ। 1989 के चुनाव के बाद 'राष्ट्रीय मोर्चा' की गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। इसके बाद 1991 में नरसिंह राव की सरकार ने आर्थिक सुधार शुरू किए। 1996 के बाद संयुक्त मोर्चा सरकारें बनीं। 1998 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार बनी। 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की सरकार बनी। इस अध्याय में हम इन सभी राजनीतिक बदलावों का अध्ययन करेंगे।
1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। इस चुनाव के बाद 'राष्ट्रीय मोर्चा' (National Front) के नेतृत्व में विपक्षी दलों का गठबंधन सरकार बनाने में सफल रहा, जिसके प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह बने। 1989 का चुनाव भारतीय राजनीति में 'गठबंधन युग' (Coalition Era) की शुरुआत थी। इसके बाद भारत में एक दल के बहुमत की जगह गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ। 1990 में वी.पी. सिंह की सरकार ने 'मंडल आयोग की रिपोर्ट' लागू की, जिसमें अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की गई थी। मंडल आयोग के क्रियान्वयन से जातीय राजनीति तेज़ हुई और सामाजिक न्याय के मुद्दे केंद्र में आए।
गठबंधन युग में क्षेत्रीय दलों की भूमिका काफी बढ़ी। तमिलनाडु में डीएमके और एआईएडीएमके, आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम (टीडीपी), पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा, बिहार में जनता दल, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) जैसे क्षेत्रीय दल प्रभावी हुए। ये क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय स्तर पर भी गठबंधन सरकारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। क्षेत्रीय दलों के उदय से भारतीय राजनीति का केंद्रीकरण कम हुआ और संघीय व्यवस्था मजबूत हुई। क्षेत्रीय दलों ने अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं, भाषा, संस्कृति और आर्थिक मुद्दों को राष्ट्रीय मंच पर उठाया।
1980 के दशक में जातीय और सामाजिक आंदोलनों ने भी राजनीति को प्रभावित किया। दलित आंदोलन, किसान आंदोलन और महिला आंदोलन ने सामाजिक न्याय की माँग उठाई। 1989 में मंडल आयोग की रिपोर्ट के क्रियान्वयन के बाद आरक्षण का मुद्दा राजनीति का केंद्र बन गया। इन आंदोलनों ने भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी और प्रतिनिधित्वात्मक बनाया।
1991 में पी.वी. नरसिंह राव की सरकार ने भारी आर्थिक संकट का सामना करते हुए आर्थिक सुधारों की शुरुआत की। विदेशी मुद्रा भंडार घटकर बहुत कम रह गया था। इस संकट से उबरने के लिए वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) की नीतियाँ अपनाईं। इन सुधारों में लाइसेंस-परमिट राज का अंत, विदेशी निवेश को खोलना, व्यापार उदारीकरण और सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका में बदलाव शामिल थे। आर्थिक सुधारों से भारतीय अर्थव्यवस्था तेज़ी से विकसित हुई और विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ी। ये सुधार भारतीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव थे, क्योंकि इन्होंने अर्थव्यवस्था की दिशा बदल दी।
1996 के चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला, जिसके बाद 'संयुक्त मोर्चा' (United Front) सरकार बनी, जो बाहर से कांग्रेस के समर्थन पर निर्भर थी। इस सरकार के प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा और बाद में इंद्र कुमार गुजराल बने। 1998 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और 'राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन' (NDA) के नेतृत्व में सरकार बनाई, जिसके प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बने। 1999 के चुनाव में NDA को स्पष्ट बहुमत मिला और वाजपेयी फिर से प्रधानमंत्री बने। 2004 के चुनाव में 'संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन' (UPA) की सरकार बनी, जिसके प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह बने। इन गठबंधन सरकारों ने भारतीय राजनीति में स्थिरता और सहयोग की परंपरा स्थापित की।
मंडल आयोग (1979) की रिपोर्ट का क्रियान्वयन 1990 में वी.पी. सिंह की सरकार ने किया। मंडल आयोग की सिफारिश के अनुसार अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के लिए सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया। इस निर्णय के कारण पूरे देश में जातीय राजनीति तेज़ हुई और सामाजिक न्याय का मुद्दा केंद्र में आया। मंडल आयोग के क्रियान्वयन से पिछड़े वर्गों को राजनीतिक सशक्तिकरण मिला। इसी तरह, 'मंडल बनाम कमंडल' की राजनीति में सांप्रदायिक मुद्दों ने भी राजनीति को प्रभावित किया। 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस एक बड़ी घटना थी, जिसने धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सद्भाव के मुद्दों को सामने रखा।
2004 और 2009 के चुनावों में UPA की सरकारें बनीं, जिनमें डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे। 2014 के चुनाव में BJP को अपने दम पर बहुमत मिला और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। 2019 के चुनाव में भी BJP की जीत हुई। वर्तमान भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय स्तर पर BJP का प्रभुत्व है, जबकि क्षेत्रीय दल राज्य स्तर पर सक्रिय हैं। भारतीय राजनीति में सुधारों, आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दे बहस का केंद्र हैं। आज भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जिसमें निरंतर राजनीतिक परिवर्तन और विकास हो रहा है। यह अध्याय भारतीय राजनीति के हालिया बदलावों को समझने का आधार है।
| वर्ष | सरकार/गठबंधन | प्रधानमंत्री |
|---|---|---|
| 1989 | राष्ट्रीय मोर्चा | वी.पी. सिंह |
| 1991 | कांग्रेस | पी.वी. नरसिंह राव |
| 1996 | संयुक्त मोर्चा | एच.डी. देवेगौड़ा |
| 1998 | NDA | अटल बिहारी वाजपेयी |
| 2004 | UPA | डॉ. मनमोहन सिंह |
| 2014 | NDA (बहुमत) | नरेंद्र मोदी |
| बदलाव | विवरण |
|---|---|
| गठबंधन युग | 1989 से बहुदलीय सरकारें |
| आर्थिक सुधार | 1991 LPG नीतियाँ |
| मंडल राजनीति | 1990 आरक्षण क्रियान्वयन |
| क्षेत्रीय दलों का उदय | राज्य स्तर पर दल |
1989 के बाद से भारतीय राजनीति में गहरे बदलाव हुए हैं। कांग्रेस के वर्चस्व का अंत हुआ और गठबंधन सरकारों का युग शुरू हुआ। क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ा और संघीय व्यवस्था मजबूत हुई। 1991 के आर्थिक सुधारों (LPG) ने भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा बदल दी और भारत को विश्व अर्थव्यवस्था से जोड़ा। मंडल आयोग की रिपोर्ट (1990) के क्रियान्वयन ने सामाजिक न्याय और जातीय राजनीति को नई दिशा दी। 1998 में NDA और 2004 में UPA की सरकारों ने गठबंधन की राजनीति में स्थिरता स्थापित की। 2014 के बाद BJP को अपने दम पर बहुमत मिला। भारतीय लोकतंत्र, जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, ने इन सभी बदलावों को समाहित करते हुए निरंतर विकास किया है। यह अध्याय भारतीय राजनीति के हालिया विकास को समझने और उसकी जटिलताओं का विश्लेषण करने की नींव प्रदान करता है।