नेहरू के निधन (1964) के बाद भारतीय राजनीति में नया चरण शुरू हुआ। कांग्रेस, जो स्वतंत्रता के बाद से एक दलीय प्रभुत्व में थी, को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने, जिनके नेतृत्व में कांग्रेस ने सफलता प्राप्त की। 1966 में शास्त्री के निधन के बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक संकट, 'सिंडिकेट' का प्रभाव और अंततः 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ। इस अध्याय में हम नेहरू के बाद की राजनीति, शास्त्री का योगदान, इंदिरा गांधी का उदय, कांग्रेस का विभाजन (1969), 'गरीबी हटाओ' का नारा, 1971 के चुनाव में कांग्रेस की पुनर्स्थापना और 'कांग्रेस प्रणाली' के परिवर्तन का अध्ययन करेंगे।
जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु 27 मई 1964 को हुई। उनके निधन के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर उत्तराधिकार का प्रश्न उठा। इस बार पार्टी ने नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री चुना। शास्त्री जी ने कम शब्दों में बड़े निर्णय लिए। उनके कार्यकाल में 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ और 'जय जवान, जय किसान' का नारा दिया गया। शास्त्री ने किसानों और सैनिकों के महत्व को रेखांकित किया। 1966 में ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर के दौरान शास्त्री जी का निधन हो गया। उनके आकस्मिक निधन के बाद पार्टी के भीतर फिर से उत्तराधिकार का संकट उत्पन्न हुआ और इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया।
इंदिरा गांधी को 1966 में प्रधानमंत्री बनाया गया। उस समय कांग्रेस पार्टी पर 'सिंडिकेट' (Syndicate) का नियंत्रण था, जो पार्टी के वरिष्ठ नेताओं (के. कामराज, एस.के. पाटिल, एस. निजलिंगप्पा, अतुल्य घोष आदि) का समूह था। सिंडिकेट ने इंदिरा गांधी को कमज़ोर उम्मीदवार समझकर प्रधानमंत्री बनाया, परंतु इंदिरा गांधी ने जल्दी ही अपनी स्थिति मजबूत कर ली। उन्होंने बैंकों के राष्ट्रीयकरण (1969) और 'गरीबी हटाओ' जैसे लोकप्रिय नारों के माध्यम से जनता के बीच अपनी पहचान बनाई। सिंडिकेट के नेताओं के साथ टकराव बढ़ा और अंततः 1969 में कांग्रेस का विभाजन हो गया। इंदिरा गांधी के समर्थकों का समूह 'कांग्रेस (आर)' (R) और विरोधी नेताओं का समूह 'कांग्रेस (ओ)' (O) कहलाया। सिंडिकेट द्वारा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार वी.वी. गिरि राष्ट्रपति चुनाव में विजयी हुए, परंतु यह विभाजन कांग्रेस के इतिहास में निर्णायक घटना थी।
1969 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विभाजन हुआ। इस विभाजन का प्रमुख कारण पार्टी नेतृत्व और सिंडिकेट के बीच टकराव था। इंदिरा गांधी ने पार्टी अनुशासन का उल्लंघन करते हुए वी.वी. गिरि का राष्ट्रपति चुनाव में समर्थन किया। इसके परिणामस्वरूप पार्टी दो गुटों में विभाजित हुई- इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली 'कांग्रेस (आर)' और वरिष्ठ नेताओं की 'कांग्रेस (ओ)'। राष्ट्रपति चुनाव में वी.वी. गिरि विजयी हुए। 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आर) को भारी बहुमत मिला, जबकि कांग्रेस (ओ) को बहुत कम सीटें मिलीं। इस प्रकार 1969 का विभाजन इंदिरा गांधी के पक्ष में हुआ, जिनकी लोकप्रियता बढ़ती गई।
1971 के लोकसभा चुनाव से पहले इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ' (Remove Poverty) का प्रचार किया। यह नारा गरीब जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुआ, क्योंकि इसमें आर्थिक विकास और समाजवादी नीतियों का वादा था। 1971 के चुनाव में कांग्रेस (आर) ने भारी जीत हासिल की और 352 सीटें जीतीं। यह चुनाव इंदिरा गांधी के नेतृत्व और 'गरीबी हटाओ' के नारे की जीत थी। इस चुनाव के बाद कांग्रेस ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण, कृषि सुधारों और गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया। 1971 के चुनाव को 'कांग्रेस प्रणाली' की पुनर्स्थापना का चुनाव भी कहा जाता है, क्योंकि इससे कांग्रेस फिर से केंद्र की सत्ता में भारी बहुमत के साथ लौटी।
1967 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस चुनाव में कांग्रेस का वर्चस्व पहली बार चुनौतीपूर्ण हुआ। कांग्रेस ने भले ही केंद्र में बहुमत बनाए रखा, परंतु कई राज्यों में उसे हार का सामना करना पड़ा। 1967 के चुनाव के बाद नौ राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं, जिनमें तमिलनाडु में डीएमके, केरल में वाम मोर्चा और पंजाब में अकाली दल शामिल थे। इस घटना को 'गैर-कांग्रेसवाद' (Non-Congressism) का उदय कहा गया। संयुक्त विधायक दल (SVD) सरकारें बनाई गईं, जिनमें कई विपक्षी दल मिलकर सरकार बनाते थे। 1967 के चुनाव के बाद कांग्रेस के एक दलीय प्रभुत्व में पहली बार गिरावट दिखी, जिससे 'कांग्रेस प्रणाली' में बदलाव की शुरुआत हुई।
नेहरू युग में 'कांग्रेस प्रणाली' एक दलीय प्रभुत्व पर आधारित थी, जिसमें प्रतिस्पर्धा पार्टी के अंदर होती थी। परंतु 1967 के बाद यह प्रणाली बदलने लगी, जब गैर-कांग्रेसवाद और विपक्षी दलों की मजबूती हुई। 1969 में कांग्रेस का विभाजन और 1971 में इंदिरा गांधी की जीत ने कांग्रेस प्रणाली को नया रूप दिया। अब कांग्रेस का प्रभुत्व वैचारिक आधार पर नहीं, बल्कि इंदिरा गांधी की लोकप्रियता और 'गरीबी हटाओ' के नारे पर आधारित हो गया। इस परिवर्तन से भारतीय राजनीति में व्यक्ति-केंद्रित नेतृत्व, लोकलुभावन नारों और केंद्र-राज्य संबंधों में परिवर्तन आया। इस प्रकार कांग्रेस प्रणाली ने एक नए युग में प्रवेश किया, जिसमें पार्टी की तुलना में नेता अधिक महत्वपूर्ण हो गए।
| वर्ष | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1964 | नेहरू का निधन | शास्त्री प्रधानमंत्री बने |
| 1965 | भारत-पाकिस्तान युद्ध | जय जवान, जय किसान |
| 1966 | शास्त्री का निधन | इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री |
| 1967 | लोकसभा चुनाव | गैर-कांग्रेसवाद का उदय |
| 1969 | कांग्रेस विभाजन | कांग्रेस (आर) और कांग्रेस (ओ) |
| 1971 | लोकसभा चुनाव | गरीबी हटाओ, कांग्रेस को 352 सीटें |
| नेता | भूमिका |
|---|---|
| के. कामराज | कांग्रेस अध्यक्ष |
| एस. निजलिंगप्पा | कांग्रेस अध्यक्ष |
| एस.के. पाटिल | वरिष्ठ नेता |
| अतुल्य घोष | वरिष्ठ नेता |
नेहरू के निधन के बाद भारतीय राजनीति में कांग्रेस प्रणाली को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लाल बहादुर शास्त्री ने 'जय जवान, जय किसान' के नारे से राष्ट्र को जोड़ा। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सिंडिकेट के साथ टकराव बढ़ा और 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ। इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ' के नारे से जनता का समर्थन प्राप्त किया और 1971 के चुनाव में कांग्रेस को 352 सीटें मिलीं, जो कांग्रेस प्रणाली की पुनर्स्थापना का प्रतीक थी। परंतु इस बार कांग्रेस का प्रभुत्व नेहरू युग की तरह पार्टी-केंद्रित नहीं, बल्कि इंदिरा गांधी की लोकप्रियता पर आधारित था। 1967 के चुनाव में गैर-कांग्रेसवाद के उदय से भारतीय राजनीति में बहुदलीय प्रतिस्पर्धा की शुरुआत हुई। इस अध्याय से यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस प्रणाली में परिवर्तन और उसकी पुनर्स्थापना भारतीय लोकतंत्र के विकास की कहानी है।