1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही शीत युद्ध और दो ध्रुवीय विश्व व्यवस्था का अंत हो गया। सोवियत संघ, जो एक समय विश्व की दूसरी सबसे बड़ी महाशक्ति थी, लगभग सत्तर वर्षों के अस्तित्व के बाद पंद्रह स्वतंत्र गणराज्यों में विभाजित हो गया। यह घटना केवल एक देश के पतन की कहानी नहीं थी, बल्कि साम्यवादी व्यवस्था, केंद्रीय नियोजन और समाजवादी आदर्शों के प्रति गहरे प्रश्नचिह्न लगाती है। इस अध्याय में हम सोवियत संघ के विघटन के कारणों, विघटन के परिणामों, नए स्वतंत्र देशों में लोकतंत्र की यात्रा, शॉक थेरेपी (सदमा चिकित्सा) की नीति और नई विश्व व्यवस्था की प्रकृति का अध्ययन करेंगे।
सोवियत संघ (यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक्स) का गठन 1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद 1922 में हुआ। व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में रूस में साम्यवादी शासन स्थापित हुआ और बाद में लियोन ट्रॉट्स्की, जोसेफ स्टालिन जैसे नेताओं ने सोवियत व्यवस्था को मजबूत किया। स्टालिन के नेतृत्व में सोवियत संघ औद्योगिक महाशक्ति बना और द्वितीय विश्व युद्ध में नाजी जर्मनी को पराजित करने में अहम भूमिका निभाई। सोवियत संघ में एक राजनीतिक दल (कम्युनिस्ट पार्टी) का शासन था, सभी प्रमुख उद्योगों पर राज्य का स्वामित्व था, और आर्थिक निर्णय केंद्रीय योजना (Five Year Plans) के माध्यम से लिए जाते थे। 1985 में मिखाइल गोर्बाचेव के राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने 'पेरेस्त्रोइका' (पुनर्संरचना) और 'ग्लासनोस्त' (खुलापन) की नीतियाँ शुरू कीं, जिसका उद्देश्य सोवियत अर्थव्यवस्था को सुधारना और शासन में पारदर्शिता लाना था। किंतु ये सुधार नियंत्रण से बाहर हो गए और अंततः सोवियत संघ 1991 में विघटित हो गया।
सोवियत संघ के विघटन के अनेक कारण थे। प्रथम, केंद्रीय नियोजित अर्थव्यवस्था में विशाल लालफीताशाही, कुशलता का अभाव और तकनीकी पिछड़ेपन के कारण आर्थिक संकट गहराता गया। सोवियत संघ को नागरिकों की बुनियादी ज़रूरतें जैसे खाद्यान्न भी पूरा करने में कठिनाई हो रही थी। द्वितीय, सोवियत संघ एक बहुराष्ट्रीय साम्राज्य जैसा था, जिसमें पंद्रह गणराज्य शामिल थे। रूसी गणराज्य का प्रभुत्व और अन्य गणराज्यों की सांस्कृतिक, राजनीतिक पहचानों की अनदेखी ने राष्ट्रवादी भावनाओं को जन्म दिया। तृतीय, 1980 के दशक में सोवियत संघ की अफगानिस्तान में सैन्य भागीदारी (1979-89) ने आर्थिक और मानवीय संसाधनों को बर्बाद किया। चतुर्थ, सैन्य और प्रौद्योगिकी खर्च ने अर्थव्यवस्था को और अधिक दबाव में डाला। पंचम, गोर्बाचेव द्वारा शुरू किए गए सुधार (पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त) ने जनता के बीच सत्ता के प्रति आस्था को कमजोर किया। इन सभी कारणों से 1991 में सोवियत संघ का अंत हो गया और पंद्रह नए स्वतंत्र देशों का जन्म हुआ, जिनमें रूस, यूक्रेन, बेलारूस, कजाकिस्तान, जॉर्जिया, अर्मेनिया, अजरबैजान आदि शामिल थे।
सोवियत संघ के विघटन के परिणाम स्वरूप विश्व में दो ध्रुवीय व्यवस्था समाप्त हो गई और अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति बनकर उभरा। शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के समर्थन पर निर्भर देशों ने अमेरिका के साथ संबंध बनाने शुरू किए। साम्यवादी व्यवस्था का पतन होने से समाजवाद की अवधारणा के प्रति निराशा फैली। पूर्व सोवियत गणराज्यों में राष्ट्रवाद का उदय हुआ और कई क्षेत्रों में जातीय संघर्ष एवं राजनीतिक अस्थिरता फैली। शीत युद्ध के दौरान विद्यमान वैश्विक संस्थाओं के चरित्र में परिवर्तन आया। साथ ही, सोवियत संघ के पतन के बाद जो देश उभरे, उनमें से अनेक देशों ने लोकतंत्र की ओर कदम बढ़ाया, लेकिन आर्थिक परिवर्तन की राह कठिन रही।
सोवियत संघ के विघटन के बाद पूर्वी यूरोपीय देशों और सोवियत संघ के उत्तराधिकारी रूस में आर्थिक सुधारों के लिए 'शॉक थेरेपी' (सदमा चिकित्सा) नामक नीति अपनाई गई। इस नीति में राज्य के स्वामित्व वाले उद्योगों का निजीकरण किया गया, मूल्यों पर से नियंत्रण हटाया गया, विदेशी व्यापार पर से प्रतिबंध समाप्त किए गए और न्यूनतम राज्य हस्तक्षेप वाली अर्थव्यवस्था को अपनाया गया। इस नीति के क्रियान्वयन में पूर्व कम्युनिस्ट अधिकारियों ने अपने निजी लाभ के लिए देश की संपत्ति को हथिया लिया, जिसे 'ओलिगार्की' (कुलीनतंत्र) का उदय कहा जाता है। शॉक थेरेपी के परिणामस्वरूप रूस में औद्योगिक उत्पादन में गिरावट आई, बेरोजगारी बढ़ी, गरीबी फैली और सामाजिक सुरक्षा प्रणाली ध्वस्त हुई। कई विशेषज्ञों ने इसे रूस की अर्थव्यवस्था के लिए 'आपदा' कहा। लगभग पचहत्तर प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा के नीचे चली गई थी। इस नीति को कई बार 'अमेरिकी नीति' भी कहा गया, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक ने इन देशों को सहायता देने की शर्तों के रूप में इन सुधारों को लागू करने पर जोर दिया।
सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस ने संविधान के अनुसार लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था अपनाई। रूस का पहला राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन बना, जिसके बाद व्लादिमीर पुतिन ने सत्ता संभाली। हालांकि रूस में औपचारिक रूप से लोकतांत्रिक संस्थाएँ स्थापित हुईं, परंतु राजनीतिक दल, चुनाव और नागरिक स्वतंत्रताएँ सीमित रहीं। रूस का राष्ट्रपति अत्यधिक शक्तिशाली होता गया और कुछ आलोचक इसे 'गाइडेड डेमोक्रेसी' या 'मैनेज्ड डेमोक्रेसी' कहते हैं। पूर्वी यूरोप के देशों जैसे पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, हंगरी आदि में लोकतांत्रिक संस्थाओं का निर्माण हुआ। वियतनाम, चीन, क्यूबा, लाओस, उत्तर कोरिया जैसे देशों में साम्यवादी व्यवस्था जारी रही, किंतु सोवियत संघ के पतन के बाद उनकी स्थिति भी बदल गई।
सोवियत संघ का विघटन भारत के लिए एक गंभीर चुनौती था, क्योंकि शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ भारत का विश्वसनीय मित्र था। भारत की गुटनिरपेक्ष विदेश नीति और सोवियत संघ के साथ मैत्री संधि (1971) ने विभिन्न संकटों में भारत की सहायता की थी। विघटन के बाद भारत को अपनी विदेश नीति को नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता पड़ी। भारत ने अमेरिका, इज़राइल, चीन और पश्चिमी यूरोप के देशों के साथ नए संबंध बनाने शुरू किए। सोवियत संघ के बाद उभरे नए स्वतंत्र गणराज्यों जैसे रूस, कजाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान आदि के साथ भारत ने राजनयिक और आर्थिक संबंध स्थापित किए। इस प्रकार सोवियत विघटन ने भारत की विदेश नीति में नए युग का आरंभ किया।
सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व राजनीति में एक ध्रुवीयता का युग आरंभ हुआ, जिसमें अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह 'अमेरिकी एकाधिकार' का युग था। वहीं, कुछ विश्लेषक यह मानते हैं कि विश्व में बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रहा है, जिसमें चीन, भारत, यूरोपीय संघ, जापान, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका आदि शक्तियाँ उभर रही हैं। सैमुएल हंटिंगटन ने 'क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन' (सभ्यताओं का टकराव) की भविष्यवाणी की थी, जबकि फ्रांसिस फुकुयामा ने 'एंड ऑफ हिस्ट्री' की अवधारणा प्रस्तुत की थी। इस प्रकार, सोवियत विघटन के बाद विश्व व्यवस्था की प्रकृति के बारे में अनेक दृष्टिकोण विकसित हुए, लेकिन सबसे स्पष्ट परिवर्तन यह था कि शीत युद्ध की दो ध्रुवीय प्रतिद्वंद्विता समाप्त हो गई थी।
| पूर्व सोवियत गणराज्य | वर्तमान स्वतंत्र देश | विशेषता |
|---|---|---|
| रूसी संघ | रूस | सबसे बड़ा उत्तराधिकारी, स्थायी सुरक्षा परिषद सदस्य |
| यूक्रेन | यूक्रेन | प्रमुख कृषि और औद्योगिक देश |
| बेलारूस | बेलारूस | रूस के निकट संबंध |
| कजाकिस्तान | कजाकिस्तान | मध्य एशिया का बड़ा देश |
| जॉर्जिया | जॉर्जिया | काकेशस क्षेत्र का देश |
| आर्मेनिया | आर्मेनिया | काकेशस क्षेत्र का देश |
| कारण | विवरण |
|---|---|
| आर्थिक पिछड़ापन | केंद्रीय योजना में कुशलता का अभाव, खाद्य संकट |
| राष्ट्रवाद का उदय | पंद्रह गणराज्यों की पहचान का दमन |
| अफगानिस्तान युद्ध | 1979-89 का युद्ध, संसाधनों की बर्बादी |
| सैन्य खर्च | हथियारों की दौड़ में अत्यधिक व्यय |
| गोर्बाचेव के सुधार | पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त ने नियंत्रण कमजोर किया |
| देश | क्षेत्र |
|---|---|
| चीन | पूर्वी एशिया |
| वियतनाम | दक्षिण-पूर्व एशिया |
| क्यूबा | कैरेबियन |
| लाओस | दक्षिण-पूर्व एशिया |
| उत्तर कोरिया | पूर्वी एशिया |
दो ध्रुवीयता का अंत 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ हुआ, जिसने विश्व राजनीति का चेहरा बदल दिया। इस विघटन ने साम्यवादी आदर्शों, केंद्रीय नियोजन और समाजवादी व्यवस्था के प्रति गहरे प्रश्न उठाए। सोवियत विघटन के बाद रूस और पूर्वी यूरोपीय देशों में लोकतांत्रिक संस्थाओं का विकास हुआ, परंतु शॉक थेरेपी के कारण इन देशों को भारी आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ा। विश्व व्यवस्था में एक ध्रुवीयता का युग आरंभ हुआ, हालाँकि चीन, भारत, यूरोपीय संघ जैसी शक्तियों के उदय के साथ बहुध्रुवीयता की संभावनाएँ भी बनीं। भारत के लिए यह परिवर्तन चुनौतीपूर्ण रहा, किंतु भारत ने अपनी विदेश नीति को नई विश्व व्यवस्था के अनुसार ढाल लिया। यह अध्याय शीत युद्ध के बाद की वैश्विक व्यवस्था को समझने की आधारशिला है।