स्वतंत्रता के बाद भारत में लोकतांत्रिक चुनावों की शुरुआत हुई, परंतु पहले लोकसभा चुनाव (1952) से लेकर लंबे समय तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दबदबा बना रहा। इस अवधि को 'एक दलीय प्रभुत्व का दौर' (Era of One-Party Dominance) कहा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत में केवल एक दल था, बल्कि इसका अर्थ है कि कांग्रेस पार्टी चुनावों में लगातार जीतती रही और सत्ता में बनी रही। भारतीय राजनीति की यह विशेषता थी कि यहाँ कई दल होते हुए भी कांग्रेस का प्रभुत्व बना रहा। यह शब्दावली राजनीतिक वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोग की गई। इस अध्याय में हम पहले तीन आम चुनावों (1952, 1957, 1962), कांग्रेस के प्रभुत्व के कारणों, विपक्षी दलों, चुनाव आयोग की भूमिका और राजनीतिक दलों के उदय का अध्ययन करेंगे।
स्वतंत्र भारत के पहले लोकसभा चुनाव 1951-52 में हुए। यह विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक चुनाव था, जिसमें लगभग 17 करोड़ मतदाताओं ने मतदान किया। इस चुनाव में 53 राजनीतिक दलों और कई निर्दलीय उम्मीदवारों ने भाग लिया। चुनाव आयोग की स्थापना 1950 में सुकुमार सेन की अध्यक्षता में की गई थी। इस चुनाव में कांग्रेस को लगभग 45 प्रतिशत मत मिले और 489 में से 364 सीटें मिलीं। प्रथम लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सबसे अधिक सीटें मिलीं, जबकि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) और सोशलिस्ट पार्टी मुख्य विपक्षी दल थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने। इस चुनाव ने सिद्ध किया कि भारत में लोकतंत्र की नींव मजबूत है और आम जनता चुनावों में भाग लेने में रुचि रखती है।
दूसरा लोकसभा चुनाव 1957 में हुआ, जिसमें कांग्रेस ने फिर से भारी बहुमत प्राप्त किया और 371 सीटें जीतीं। तीसरा लोकसभा चुनाव 1962 में हुआ, जिसमें कांग्रेस को 361 सीटें मिलीं। इन तीनों चुनावों में कांग्रेस की जीत स्पष्ट रूप से दिखाई दी, परंतु मत प्रतिशत में कांग्रेस का प्रभुत्व घटता-बढ़ता रहा। इस दौरान कांग्रेस के विरुद्ध विपक्षी दलों की संख्या और उनकी मजबूती बढ़ी, परंतु वे कांग्रेस को चुनौती देने में विफल रहे। 1962 के चुनाव के बाद नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस की सत्ता जारी रही। परंतु इसी अवधि में सरकार के समक्ष कई चुनौतियाँ भी आईं, जैसे 1962 का भारत-चीन युद्ध।
कांग्रेस के एक दलीय प्रभुत्व के कई कारण थे। प्रथम, स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका थी, जिसने उसे जनता के बीच लोकप्रिय बनाया। द्वितीय, कांग्रेस में विभिन्न विचारधाराओं, समुदायों और क्षेत्रों के लोग शामिल थे, जिससे वह एक 'बड़ा समावेशी' दल बन गई। नेहरू का नेतृत्व भी कांग्रेस की लोकप्रियता का प्रमुख कारण था। तृतीय, विपक्षी दल विभाजित और कमजोर थे, जिनमें वैचारिक मतभेद थे और वे राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट नहीं हो पाए। चतुर्थ, कांग्रेस ने विभिन्न समूहों के हितों को ध्यान में रखते हुए विकास और नीति निर्माण का नेतृत्व किया। इसके अतिरिक्त, कांग्रेस के पास संगठनात्मक संरचना, वित्तीय संसाधन और अनुभवी नेतृत्व था, जो विपक्षी दलों के पास नहीं था।
एक दलीय प्रभुत्व के बावजूद विपक्षी दलों ने भारतीय लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विपक्षी दलों में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI), सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और अन्य क्षेत्रीय दल शामिल थे। कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभाव केरल, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश में था। 1957 में केरल में ई.एम.एस. नम्बूदिरीपाद के नेतृत्व में कम्युनिस्ट सरकार बनी, जो भारत में चुनाव के द्वारा सत्ता में आने वाली पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी। सोशलिस्ट पार्टी जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे नेताओं के नेतृत्व में थी। भारतीय जनसंघ (BJS) श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में बनी, जो बाद में भारतीय जनता पार्टी का पूर्ववर्ती दल बना। स्वतंत्र पार्टी सी. राजगोपालाचारी के नेतृत्व में बनी, जो स्वतंत्र बाजार और कम सरकारी हस्तक्षेप की वकालत करती थी। विपक्षी दल कमजोर होते हुए भी लोकतंत्र में स्वस्थ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के प्रतीक थे।
भारतीय लोकतंत्र की सफलता में चुनाव आयोग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। चुनाव आयोग की स्थापना 1950 में की गई थी, जिसके पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन थे। चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए ज़िम्मेदार है। चुनाव आयोग ने वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराए, जिसमें हर वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार मिला। भारत में मतदाता पहचान पत्र और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) जैसी व्यवस्थाएँ चुनावी प्रक्रिया में सुधार के उदाहरण हैं। चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) भी लागू की, जो चुनाव के दौरान दलों और उम्मीदवारों के आचरण को नियंत्रित करती है।
राजनीतिक विश्लेषकों ने भारत के एक दलीय प्रभुत्व को 'कांग्रेस प्रणाली' (Congress System) नाम दिया। राजनीतिक वैज्ञानिक राजनी कार्तिकेयन और राजनीतिक विश्लेषक राजनीतिज्ञों ने इसे समझाने का प्रयास किया। कांग्रेस प्रणाली की मुख्य विशेषता यह थी कि कांग्रेस के अंदर ही विभिन्न विचारधाराएँ और समूह सक्रिय रहते थे, जिससे वास्तविक प्रतिस्पर्धा कांग्रेस के अंदर ही होती थी। यह व्यवस्था 'सहमति की राजनीति' (Consensus Politics) पर आधारित थी, जिसमें विभिन्न समुदायों और वर्गों के हितों को संतुलित किया जाता था। कांग्रेस प्रणाली ने भारतीय लोकतंत्र को स्थिरता और सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की परंपरा प्रदान की।
| चुनाव | वर्ष | कांग्रेस को मिली सीटें | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|---|
| प्रथम | 1951-52 | 364 | सबसे बड़ा चुनाव |
| द्वितीय | 1957 | 371 | कांग्रेस का दबदबा |
| तृतीय | 1962 | 361 | विपक्ष में वृद्धि |
| दल | नेता | विशेषता |
|---|---|---|
| कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) | ई.एम.एस. नम्बूदिरीपाद | केरल में सरकार बनी |
| सोशलिस्ट पार्टी | जयप्रकाश नारायण, लोहिया | समाजवादी विचारधारा |
| भारतीय जनसंघ | श्यामा प्रसाद मुखर्जी | बीजेपी का पूर्ववर्ती |
| स्वतंत्र पार्टी | सी. राजगोपालाचारी | मुक्त बाजार |
स्वतंत्रता के बाद के पहले दो दशकों में भारत में एक दलीय प्रभुत्व की व्यवस्था रही, जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस लगातार चुनाव जीतती रही। पहले तीन लोकसभा चुनावों (1951-52, 1957, 1962) में कांग्रेस को भारी बहुमत मिला। यह प्रभुत्व स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत, नेहरू के नेतृत्व, कांग्रेस की समावेशी प्रकृति और कमजोर विपक्ष के कारण था। विपक्षी दल (CPI, सोशलिस्ट पार्टी, जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी) कमजोर होते हुए भी लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा के प्रतीक थे। चुनाव आयोग ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराकर भारतीय लोकतंत्र को मजबूत किया। 'कांग्रेस प्रणाली' ने भारतीय राजनीति में स्थिरता और सहमति की राजनीति की नींव रखी। यह दौर भारतीय लोकतंत्र की सफलता और उसकी जड़ों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी नींव पर बाद में बहुदलीय प्रतिस्पर्धा का विकास हुआ।