भारत एक बहुराष्ट्रीय, बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश है, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों की अपनी-अपनी आकांक्षाएँ और माँगें हैं। इन आकांक्षाओं को 'क्षेत्रीय आकांक्षाएँ' (Regional Aspirations) कहा जाता है। इन आकांक्षाओं में स्वायत्तता की माँग, राज्य का दर्जा, विशेष राजनीतिक पहचान और सांस्कृतिक अधिकार जैसे मुद्दे शामिल हैं। भारत सरकार ने संवैधानिक और राजनीतिक उपायों के माध्यम से इन आकांक्षाओं का समाधान करने का प्रयास किया है। पंजाब में आत्मसम्मान आंदोलन (एकाली), पूर्वोत्तर में विद्रोही आंदोलन, कश्मीर में स्वायत्तता की माँग और गोवा का विलय इस अध्याय के प्रमुख विषय हैं। इस अध्याय में हम क्षेत्रीय आकांक्षाओं की प्रकृति, पंजाब की समस्या, पूर्वोत्तर के विद्रोह, कश्मीर की माँगें, गोवा का विलय और भारत सरकार के समाधानों का अध्ययन करेंगे।
क्षेत्रीय आकांक्षाएँ भारतीय राजनीति का स्थायी तत्व हैं। स्वतंत्रता के बाद से विभिन्न क्षेत्रों ने अपनी भाषाई, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान की माँग की है। 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम के तहत भाषा के आधार पर राज्यों का गठन किया गया, जिससे कई क्षेत्रीय आकांक्षाएँ पूरी हुईं। परंतु कुछ क्षेत्रों में आकांक्षाएँ अधिक गहरी थीं, जैसे पंजाब में सिख पहचान के आधार पर आत्मसम्मान और अधिक स्वायत्तता की माँग, पूर्वोत्तर में जातीय समूहों की आत्मनिर्णय की माँग और कश्मीर में विशेष दर्जे की माँग। क्षेत्रीय आकांक्षाओं का समाधान लोकतांत्रिक संवाद, संवैधानिक उपायों और विकास योजनाओं के माध्यम से किया गया। भारत की 'विविधता में एकता' की नीति ने इन आकांक्षाओं को राष्ट्रीय ढाँचे में समायोजित किया।
पंजाब क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सबसे जटिल उदाहरण रहा है। 1966 में पंजाब का पुनर्गठन हुआ, जिससे हरियाणा का निर्माण हुआ और पंजाब में सिख बहुमत हो गया। 1973 में 'आनंदपुर साहिब प्रस्ताव' (Anandpur Sahib Resolution) में शिरोमणि अकाली दल ने पंजाब को अधिक स्वायत्तता देने की माँग की। परंतु इन माँगों ने धीरे-धीरे उग्र रूप ले लिया और 1980 के दशक में 'खालिस्तान' (अलग राष्ट्र) की माँग उठी। 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ, जिसमें सेना ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर से उग्रवादियों को निकाला। इस घटना के बाद 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। 1985 में 'राजीव-लोंगोवाल समझौता' (Rajiv-Longowal Accord) संपन्न हुआ, जिसमें पंजाब की स्वायत्तता और विवादों के समाधान पर सहमति बनी। बाद में पंजाब में उग्रवाद का अंत हुआ और लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल हुई।
1973 में शिरोमणि अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया, जिसमें पंजाब को अधिक स्वायत्तता, सिख समुदाय की पहचान की रक्षा और केंद्र-राज्य संबंधों में सुधार की माँग की गई।
पूर्वोत्तर भारत में कई जातीय समूह और समुदाय निवास करते हैं, जिनमें से कई ने स्वतंत्रता के बाद से विद्रोही आंदोलन चलाए। असम में 'आसम आंदोलन' (1979-85) के दौरान अवैध प्रवासियों के निष्कासन की माँग उठी। इस आंदोलन के परिणामस्वरूप 1985 में 'असम समझौता' (Assam Accord) संपन्न हुआ। नागालैंड और मिज़ोरम में अलग राष्ट्र की माँग करने वाले विद्रोही आंदोलन चले। मिज़ोरम में लालडेंगा के नेतृत्व में विद्रोह हुआ, जिसका समाधान 1986 में 'मिज़ो समझौते' (Mizo Accord) से हुआ, जिसमें लालडेंगा को मुख्यमंत्री बनाया गया। नागालैंड में शिलांग समझौते (1975) के बाद भी विद्रोह जारी रहा। बोडोलैंड (असम में) जैसे क्षेत्रों में भी जातीय आकांक्षाएँ रही हैं। पूर्वोत्तर में समाधान के लिए भारत सरकार ने स्वायत्त परिषदों, संवैधानिक संशोधनों और विकास कार्यक्रमों का उपयोग किया।
कश्मीर में क्षेत्रीय आकांक्षाओं का स्वरूप विशेष रहा है। 1947 में कश्मीर भारत में विलीन हुआ और संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत उसे विशेष दर्जा मिला। कश्मीर में 'हुर्रियत कॉन्फ्रेंस' और अन्य संगठनों ने अधिक स्वायत्तता और जनमत संग्रह की माँग की। पाकिस्तान के समर्थन से कश्मीर में घुसपैठ और आतंकवाद बढ़ा, जिसके परिणामस्वरूप 1989 के बाद कश्मीर में उग्रवाद फैला। 1990 के दशक में कश्मीर में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन और सुरक्षा चुनौतियाँ सामने आईं। भारत सरकार ने कश्मीर की समस्या के समाधान के लिए विभिन्न दृष्टिकोण अपनाए, जिनमें सुरक्षा अभियान, विकास कार्यक्रम और राजनीतिक संवाद शामिल हैं। 2019 में अनुच्छेद 370 का विशेष प्रावधान संशोधित किया गया और जम्मू-कश्मीर दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित हुआ।
गोवा पुर्तगाली उपनिवेश था, जो भारत की स्वतंत्रता के बाद भी पुर्तगाल के शासन में था। गोवा में विलय की माँग उठी और 1961 में भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन विजय' के माध्यम से गोवा को पुर्तगाली शासन से मुक्त कराया। 1987 में गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। गोवा का विलय भारत के उपनिवेशवाद-विरोधी रुख और क्षेत्रीय एकीकरण का प्रतीक था।
भारत सरकार ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं के समाधान के लिए अनेक उपाय किए। संवैधानिक ढाँचे में बदलाव किए गए, जैसे राज्य पुनर्गठन (1956), असम समझौता (1985), मिज़ो समझौता (1986) और राजीव-लोंगोवाल समझौता (1985)। पूर्वोत्तर में स्वायत्त परिषदों का गठन किया गया। विकास कार्यक्रमों के माध्यम से पिछड़े क्षेत्रों को सहायता दी गई। लोकतांत्रिक संवाद और राजनीतिक वार्ताओं के माध्यम से विद्रोही आंदोलनों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया गया। भारत सरकार की नीति का मूल सिद्धांत यह रहा है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं का समाधान राष्ट्रीय एकता के ढाँचे के भीतर किया जाए। इन उपायों से भारत ने अपनी विविधता को संरक्षित रखते हुए राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया है।
| वर्ष | घटना/समझौता | विवरण |
|---|---|---|
| 1961 | ऑपरेशन विजय | गोवा का विलय |
| 1966 | पंजाब पुनर्गठन | हरियाणा का निर्माण |
| 1973 | आनंदपुर साहिब प्रस्ताव | अकाली दल की स्वायत्तता माँग |
| 1985 | राजीव-लोंगोवाल समझौता | पंजाब समाधान |
| 1985 | असम समझौता | अवैध प्रवासियों का मुद्दा |
| 1986 | मिज़ो समझौता | विद्रोह का अंत |
| क्षेत्र | आंदोलन/माँग | समाधान |
|---|---|---|
| असम | आसम आंदोलन (1979-85) | असम समझौता (1985) |
| मिज़ोरम | लालडेंगा विद्रोह | मिज़ो समझौता (1986) |
| नागालैंड | आत्मनिर्णय की माँग | शिलांग समझौता (1975) |
क्षेत्रीय आकांक्षाएँ भारतीय राजनीति का स्थायी और स्वाभाविक तत्व हैं, जो देश की विविधता को दर्शाती हैं। पंजाब में सिख पहचान और स्वायत्तता की माँग, पूर्वोत्तर में जातीय आत्मनिर्णय की माँग, कश्मीर में विशेष दर्जे की माँग और गोवा का विलय क्षेत्रीय आकांक्षाओं के प्रमुख उदाहरण हैं। भारत सरकार ने इन आकांक्षाओं का समाधान संवैधानिक उपायों, लोकतांत्रिक संवाद और विकास योजनाओं के माध्यम से किया है। आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973), राजीव-लोंगोवाल समझौता (1985), असम समझौता (1985) और मिज़ो समझौता (1986) जैसे समझौतों ने क्षेत्रीय विवादों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत की नीति का सिद्धांत 'विविधता में एकता' रहा है, जिसमें क्षेत्रीय पहचान को राष्ट्रीय ढाँचे के भीतर संरक्षित किया जाता है। इस अध्याय से यह समझना आवश्यक है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं का लोकतांत्रिक समाधान ही भारतीय राष्ट्र की मजबूती की कुंजी है।