1970 का दशक भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सबसे कठिन दौर था। इस दशक में आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता, आपातकाल (1975-77) और लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमज़ोरी जैसी घटनाएँ घटीं। इन घटनाओं के कारण लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गहरा संकट आया। 1971 की जीत के बाद इंदिरा गांधी की सरकार के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ आईं, जिनमें आर्थिक मंदी, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार के आरोप और न्यायपालिका से टकराव शामिल थे। 1974 में नवनिर्माण आंदोलन (गुजरात) और 1975 में बिहार आंदोलन (जेपी आंदोलन) ने सरकार को चुनौती दी। अंततः 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा की गई। इस अध्याय में हम लोकतांत्रिक संकट के कारणों, नवनिर्माण आंदोलन, जेपी आंदोलन, आपातकाल, आपातकाल के दौरान की घटनाएँ, 1977 के चुनाव और उसके परिणामों का अध्ययन करेंगे।
लोकतांत्रिक संकट के कई कारण थे। प्रथम, आर्थिक समस्याएँ- 1970 के दशक में महंगाई, बेरोज़गारी, आर्थिक मंदी और खाद्यान्न की कमी जैसी समस्याएँ गंभीर रूप से बढ़ीं। द्वितीय, राजनीतिक अस्थिरता- इंदिरा गांधी की सरकार की वैधता पर सवाल उठे। 1971 के चुनाव के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1975 में इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया, जिससे उनकी स्थिति संकट में आ गई। तृतीय, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव- 1973 में न्यायमूर्ति ए.एन. रे को वरिष्ठतम न्यायाधीशों को दरकिनार कर मुख्य न्यायाधीश बनाया गया, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठे। चतुर्थ, विपक्षी आंदोलन- जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति आंदोलन ने सरकार को चुनौती दी। इन सभी कारणों से लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गहरा संकट उत्पन्न हुआ।
1974 में गुजरात में 'नवनिर्माण आंदोलन' शुरू हुआ, जिसका नेतृत्व छात्रों ने किया। यह आंदोलन महंगाई, भ्रष्टाचार और शिक्षा सुधारों की माँगों से जुड़ा था। इस आंदोलन के कारण गुजरात में राज्य विधानसभा भंग हो गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ।
1975 में बिहार में जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में 'संपूर्ण क्रांति' (Total Revolution) आंदोलन शुरू हुआ। जेपी ने भ्रष्टाचार, सत्तावाद और अलोकतांत्रिक व्यवहार के विरुद्ध आवाज उठाई। उन्होंने सरकार से इस्तीफा देने की माँग की और सामूहिक आंदोलनों का आह्वान किया। जेपी आंदोलन ने सरकार के विरुद्ध देशव्यापी असंतोष फैलाया। जेपी को 'लोक नायक' कहा जाता है। इन आंदोलनों ने इंदिरा गांधी की सरकार पर गंभीर दबाव बनाया और आपातकाल की घोषणा का मार्ग प्रशस्त किया।
25 जून 1975 की रात को राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल की घोषणा की। इसकी सिफारिश प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने की थी। आपातकाल के दौरान संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आंतरिक आपातकाल लगाया गया। आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई, विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया और चुनाव स्थगित कर दिए गए। इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी ने '20 सूत्री कार्यक्रम' चलाया और परिवार नियोजन के आक्रामक अभियान (नसबंदी) चलाए गए। आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की नींव पर गहरा प्रहार हुआ। मार्च 1977 में आपातकाल हटाया गया और चुनावों की घोषणा की गई।
आपातकाल के बाद मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव हुए। विपक्षी दलों ने एकजुट होकर 'जनता पार्टी' (Janata Party) का गठन किया। जनता पार्टी ने चुनाव में भारी जीत हासिल की और इंदिरा गांधी की कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। यह भारत के इतिहास में पहला ऐसा अवसर था जब केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। जनता पार्टी के नेता मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। 1977 के चुनाव ने सिद्ध किया कि भारतीय जनता लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध है और आपातकाल जैसी घटनाओं का विरोध करती है। जनता पार्टी की सरकार ने संविधान में संशोधन कर आपातकाल के दुरुपयोग को रोकने के प्रयास किए, जिसके तहत 44वाँ संविधान संशोधन किया गया।
आपातकाल के कई दीर्घकालिक परिणाम हुए। प्रथम, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर गहरा प्रहार हुआ। द्वितीय, जनता ने आपातकाल के अनुभव से सीखा कि सत्ता का दुरुपयोग लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। तृतीय, आपातकाल के बाद संविधान में कई संशोधन किए गए, जिनमें 44वाँ संशोधन (1978) प्रमुख है, जिसने आपातकाल की घोषणा को कठिन बना दिया। चतुर्थ, आपातकाल ने नागरिक स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के प्रति जागरूकता बढ़ाई। पंचम, आपातकाल के बाद सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ संघीय व्यवस्था को मजबूत करने की माँग उठी। इन सबके परिणामस्वरूप भारतीय लोकतंत्र ने आपातकाल के कठिन अनुभव से सीख ली और अधिक परिपक्व हुआ।
1977 के चुनाव और जनता पार्टी की सरकार ने भारतीय लोकतंत्र की पुनर्स्थापना को सिद्ध किया। 1980 में हुए चुनाव में इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आई) फिर से सत्ता में लौटी। इन घटनाओं से यह स्पष्ट हुआ कि भारतीय लोकतंत्र संकटों से उबरने में सक्षम है। आपातकाल के बाद लोकतांत्रिक संस्थाएँ, नागरिक स्वतंत्रताएँ और चुनावी प्रक्रिया फिर से मजबूत हुईं। भारत में सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण लोकतंत्र की सफलता का प्रमाण है। इस प्रकार, 1970 के दशक का संकट भारतीय लोकतंत्र के लिए एक परीक्षा था, जिसे लोकतंत्र ने सफलतापूर्वक पार कर लिया।
| वर्ष | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1974 | नवनिर्माण आंदोलन | गुजरात में छात्र आंदोलन |
| 1975 | जेपी आंदोलन | संपूर्ण क्रांति |
| 1975 | आपातकाल की घोषणा | 25 जून 1975 |
| 1975 | इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय | इंदिरा गांधी का चुनाव अमान्य |
| 1977 | लोकसभा चुनाव | जनता पार्टी की जीत |
| उपाय | विवरण |
|---|---|
| मौलिक अधिकार निलंबन | मौलिक अधिकार समाप्त |
| प्रेस सेंसरशिप | समाचार पर नियंत्रण |
| विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी | राजनीतिक दबाव |
| 20 सूत्री कार्यक्रम | संजय गांधी द्वारा |
1970 का दशक भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे कठिन परीक्षा था। आर्थिक संकट, इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय (1975), न्यायपालिका से टकराव और जेपी आंदोलन जैसे कारणों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गहरा दबाव डाला। 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा ने मौलिक अधिकारों, प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर गंभीर प्रहार किया। परंतु मार्च 1977 में हुए चुनाव में जनता पार्टी की जीत ने सिद्ध किया कि भारतीय जनता लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध है। आपातकाल के बाद 44वें संविधान संशोधन (1978) के माध्यम से आपातकाल के दुरुपयोग को रोकने के उपाय किए गए। इस प्रकार भारतीय लोकतंत्र ने इस संकट से सीख ली और अधिक परिपक्व, मजबूत और संस्थागत रूप से सुरक्षित हुआ। यह अध्याय भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आपातकाल के महत्व और लोकतंत्र की लचीलापन को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।