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1. परिचय

स्वतंत्रता के बाद भारत के समक्ष आर्थिक विकास की गंभीर चुनौती थी। गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा और पिछड़ापन देश की प्रमुख समस्याएँ थीं। इन समस्याओं के समाधान के लिए भारत ने 'नियोजित विकास' (Planned Development) का मार्ग अपनाया, जिसमें आर्थिक विकास की दिशा और प्राथमिकताएँ राज्य द्वारा निर्धारित की जाती हैं। नियोजित विकास के तहत पाँच-वर्षीय योजनाएँ बनाई गईं, जिनका उद्देश्य औद्योगिकीकरण, कृषि विकास, बुनियादी ढाँचे का निर्माण और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देना था। इस अध्याय में हम नियोजित विकास की आवश्यकता, योजना आयोग की स्थापना, पहली पंचवर्षीय योजना, कृषि और औद्योगिक विकास, नीति मॉडलों में बहस और आलोचनाओं का अध्ययन करेंगे।

2. नियोजित विकास की आवश्यकता और योजना आयोग

स्वतंत्रता के समय भारत की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान और पिछड़ी हुई थी। ब्रिटिश शासन के दौरान औद्योगिक विकास लगभग न के बराबर था। इसलिए भारत को अपनी अर्थव्यवस्था के विकास के लिए एक सुनियोजित रणनीति की आवश्यकता थी। इसके लिए 15 मार्च 1950 को 'योजना आयोग' (Planning Commission) की स्थापना की गई, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते थे। योजना आयोग ने पाँच-वर्षीय योजनाओं का निर्माण और क्रियान्वयन किया। योजना आयोग की स्थापना जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुई, जो नियोजित विकास के प्रबल समर्थक थे। योजना आयोग का मुख्य उद्देश्य संसाधनों का उचित आवंटन, आर्थिक विकास में तेज़ी और गरीबी उन्मूलन था। 2014 में योजना आयोग को भंग करके 'नीति आयोग' (NITI Aayog) की स्थापना की गई।

3. पाँच-वर्षीय योजनाएँ और पहली योजना

योजना आयोग ने 1951 में पहली पाँच-वर्षीय योजना (1951-56) शुरू की, जिसका मुख्य जोर कृषि और सिंचाई पर था। पहली योजना का मॉडल 'हैरोड-डोमर मॉडल' पर आधारित था। इस योजना का मुख्य उद्देश्य खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाना और कृषि क्षेत्र का विकास करना था। दूसरी पाँच-वर्षीय योजना (1956-61) ने औद्योगिकीकरण पर जोर दिया, जो 'महालनोबिस मॉडल' पर आधारित थी। प्रसिद्ध सांख्यिकीविद् पी.सी. महालनोबिस ने दूसरी योजना के मॉडल को तैयार किया। इस योजना का उद्देश्य भारी उद्योगों, इस्पात, मशीनरी और बुनियादी ढाँचे का विकास करना था। तीसरी पाँच-वर्षीय योजना (1961-66) का उद्देश्य कृषि और औद्योगिक विकास में संतुलन बनाना था, परंतु 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के कारण यह योजना सफल नहीं रही।

4. कृषि विकास: हरित क्रांति

भारत में कृषि विकास के लिए 'हरित क्रांति' (Green Revolution) सबसे महत्वपूर्ण कदम था। 1960 के दशक के उत्तरार्ध में भारत ने कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकी, उच्च उपज देने वाले बीज (HYV), रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और सिंचाई सुविधाओं का उपयोग बढ़ाया। हरित क्रांति का श्रेय विशेष रूप से एम.एस. स्वामीनाथन को जाता है, जिन्हें 'हरित क्रांति का जनक' कहा जाता है। इस क्रांति से गेहूँ और चावल के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई और भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना। परंतु हरित क्रांति की कुछ सीमाएँ भी थीं, जैसे यह मुख्यतः पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे समृद्ध क्षेत्रों तक सीमित रही और छोटे किसानों को पर्याप्त लाभ नहीं मिला। क्षेत्रीय असमानता और किसानों के बीच असमानता इस क्रांति की आलोचना का विषय बनी।

5. औद्योगिक विकास और नीति निर्माण में बहस

भारत में औद्योगिक विकास के लिए औद्योगिक नीति संकल्प (1948 और 1956) जारी किए गए। 1956 के औद्योगिक नीति संकल्प ने 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' (Mixed Economy) का सिद्धांत अपनाया, जिसमें सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों की भूमिका थी। इस नीति के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र का प्रमुख उद्योगों में नियंत्रण रहा और निजी क्षेत्र को छोटे और मध्यम उद्योगों में भागीदारी दी गई। इसी अवधि में 'लाइसेंस-परमिट राज' (Licence-Permit Raj) की आलोचना हुई, क्योंकि निजी उद्यमों को सरकारी अनुमति के बिना विस्तार करने की अनुमति नहीं थी। आर्थिक नीति पर भारत में दो मुख्य दृष्टिकोण थे- एक पक्ष राज्य के नेतृत्व वाले विकास का समर्थक था (जैसे नेहरू), जबकि दूसरा पक्ष स्वतंत्र बाजार और निजी उद्यम को बढ़ावा देना चाहता था (जैसे सी. राजगोपालाचारी)। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच बहस नियोजित विकास की राजनीति का केंद्र थी।

6. गरीबी उन्मूलन और सामाजिक कल्याण

नियोजित विकास का एक प्रमुख उद्देश्य गरीबी उन्मूलन और सामाजिक कल्याण था। इसके लिए अनेक कार्यक्रम चलाए गए, जैसे सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952), एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP) और बाद में रोज़गार सृजन योजनाएँ। संविधान में राज्य नीति के निर्देशक तत्वों (Directive Principles) के अंतर्गत सामाजिक न्याय, समान वितरण और न्यूनतम जीवन स्तर के लिए प्रावधान किए गए। परंतु गरीबी उन्मूलन पूर्ण रूप से सफल नहीं रहा, क्योंकि विकास की रणनीति ने आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन नहीं बनाया। कुछ विद्वानों का कहना है कि विकास की गति धीमी रही और लाभ बड़े किसानों तथा उद्योगपतियों तक सीमित रहे।

7. नियोजित विकास की आलोचनाएँ

नियोजित विकास की कई आलोचनाएँ हुईं। प्रथम, केंद्रीय नियोजन में लालफीताशाही और भ्रष्टाचार बढ़ा। द्वितीय, 'लाइसेंस-परमिट राज' ने निजी उद्यम को हतोत्साहित किया और आर्थिक विकास की गति धीमी की। तृतीय, औद्योगिकीकरण के बावजूद कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की उपेक्षा हुई। चतुर्थ, आय असमानता बढ़ी और गरीबी उन्मूलन में पर्याप्त सफलता नहीं मिली। पंचम, हरित क्रांति से क्षेत्रीय असमानताएँ बढ़ीं। इन आलोचनाओं के परिणामस्वरूप 1991 में आर्थिक सुधारों के साथ नियोजित विकास की प्रक्रिया में बदलाव आया और उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्वीकरण (LPG) की नीतियाँ अपनाई गईं।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: प्रमुख पंचवर्षीय योजनाएँ

योजना वर्ष मॉडल मुख्य जोर
पहली 1951-56 हैरोड-डोमर कृषि, सिंचाई
दूसरी 1956-61 महालनोबिस औद्योगिकीकरण
तीसरी 1961-66 संतुलित विकास कृषि + उद्योग

तालिका 2: प्रमुख आर्थिक नीतियाँ

नीति/घटना वर्ष विशेषता
योजना आयोग 1950 पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण
सामुदायिक विकास कार्यक्रम 1952 ग्रामीण विकास
औद्योगिक नीति संकल्प 1956 मिश्रित अर्थव्यवस्था
हरित क्रांति 1960 के दशक कृषि उत्पादन में वृद्धि
नीति आयोग 2015 योजना आयोग का स्थान

माइंड मैप

graph TD A["नियोजित विकास की राजनीति"] --> B["योजना आयोग"] A --> C["पंचवर्षीय योजनाएँ"] A --> D["कृषि विकास"] A --> E["औद्योगिक विकास"] A --> F["आलोचनाएँ"] B --> B1["1950 स्थापना"] B --> B2["नेहरू अध्यक्ष"] C --> C1["पहली: कृषि"] C --> C2["दूसरी: उद्योग"] D --> D1["हरित क्रांति"] D --> D2["एम.एस. स्वामीनाथन"] E --> E1["औद्योगिक नीति 1956"] E --> E2["मिश्रित अर्थव्यवस्था"] F --> F1["लाइसेंस-परमिट राज"] F --> F2["क्षेत्रीय असमानता"] A --> G["1991: LPG सुधार"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

आरेख 1: नियोजित विकास की संरचना

नियोजित विकास की संरचना योजना आयोग (1950) कृषि विकास हरित क्रांति सिंचाई, उर्वरक औद्योगिकीकरण भारी उद्योग इस्पात, मशीनरी सामाजिक कल्याण गरीबी उन्मूलन सामुदायिक विकास मिश्रित अर्थव्यवस्था (1956) सार्वजनिक क्षेत्र + निजी क्षेत्र राज्य नेतृत्व वाला विकास बनाम मुक्त बाजार Golden Rule: योजना आयोग (1950), पहली योजना (1951-56) और नीति आयोग (2015) की तिथियाँ याद रखें।

आरेख 2: विकास मॉडल में बहस

विकास मॉडल में बहस विकास के दो दृष्टिकोण राज्य नेतृत्व वाला विकास नेहरू का दृष्टिकोण केंद्रीय नियोजन सार्वजनिक क्षेत्र का प्रभुत्व मुक्त बाजार दृष्टिकोण सी. राजगोपालाचारी निजी उद्यम कम सरकारी हस्तक्षेप लाइसेंस-परमिट राज की आलोचना निजी उद्यमों को सरकारी अनुमति 1991 में LPG सुधारों से व्यवस्था बदली स्वर्ण नियम: दोनों दृष्टिकोणों के समर्थक नेताओं (नेहरू और राजगोपालाचारी) को याद रखें।

सामान्य गलतियाँ

  1. योजना आयोग की स्थापना 1950 में हुई, इसे 1947 या 1951 में मान लेना गलत है।
  2. पहली पंचवर्षीय योजना (1951-56) कृषि पर केंद्रित थी और हैरोड-डोमर मॉडल पर आधारित थी, जबकि दूसरी (1956-61) महालनोबिस मॉडल पर आधारित औद्योगिकीकरण पर केंद्रित थी। इन्हें भ्रमित करना सामान्य गलती है।
  3. 'हरित क्रांति का जनक' एम.एस. स्वामीनाथन को कहा जाता है, इसे किसी अन्य से जोड़ देना गलत है।
  4. नीति आयोग की स्थापना 2015 में हुई, जिसने योजना आयोग का स्थान लिया। इसे भूल जाना गलत है।
  5. 1956 का औद्योगिक नीति संकल्प 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' के सिद्धांत पर आधारित था, इसे पूर्ण समाजवादी मॉडल मान लेना गलत है।
  6. हरित क्रांति केवल पंजाब, हरियाणा जैसे समृद्ध क्षेत्रों तक सीमित रही, इसे पूरे देश में समान लाभ मान लेना गलत है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. योजना आयोग की स्थापना (1950), पहली तीन पंचवर्षीय योजनाओं की अवधि, मॉडल और उद्देश्यों को एक तालिका में याद करें।
  2. महालनोबिस मॉडल और हैरोड-डोमर मॉडल के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए; यह बोर्ड में बार-बार पूछा जाता है।
  3. हरित क्रांति के लाभ, सीमाएँ और क्षेत्रीय असमानता के प्रभाव का विश्लेषणात्मक उत्तर लिखिए।
  4. राज्य नेतृत्व वाले विकास (नेहरू) और मुक्त बाजार (राजगोपालाचारी) के बीच की बहस को तर्क सहित समझाइए।
  5. नियोजित विकास की आलोचनाओं और 1991 के LPG सुधारों के संबंध को स्पष्ट रूप से जोड़िए, क्योंकि यह दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों में महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

नियोजित विकास स्वतंत्र भारत की आर्थिक रणनीति का केंद्र था, जिसमें योजना आयोग (1950) ने पाँच-वर्षीय योजनाओं के माध्यम से विकास का निर्देशन किया। पहली योजना (1951-56) ने कृषि को प्राथमिकता दी, जबकि दूसरी योजना (1956-61) ने महालनोबिस मॉडल के आधार पर औद्योगिकीकरण पर जोर दिया। हरित क्रांति ने खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि कर भारत को आत्मनिर्भर बनाया, परंतु क्षेत्रीय असमानताएँ भी बढ़ाईं। 1956 के औद्योगिक नीति संकल्प ने मिश्रित अर्थव्यवस्था की नींव रखी। राज्य नेतृत्व वाले विकास और मुक्त बाजार के बीच की बहस भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण रही। नियोजित विकास की आलोचनाओं (लाइसेंस-परमिट राज, लालफीताशाही) के कारण 1991 में आर्थिक सुधार किए गए और LPG नीतियाँ अपनाई गईं। इस अध्याय से यह समझना आवश्यक है कि आर्थिक विकास की राजनीति और उसकी प्राथमिकताएँ ही भारत के विकास की दिशा तय करती हैं।