स्वतंत्रता के बाद भारत के समक्ष आर्थिक विकास की गंभीर चुनौती थी। गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा और पिछड़ापन देश की प्रमुख समस्याएँ थीं। इन समस्याओं के समाधान के लिए भारत ने 'नियोजित विकास' (Planned Development) का मार्ग अपनाया, जिसमें आर्थिक विकास की दिशा और प्राथमिकताएँ राज्य द्वारा निर्धारित की जाती हैं। नियोजित विकास के तहत पाँच-वर्षीय योजनाएँ बनाई गईं, जिनका उद्देश्य औद्योगिकीकरण, कृषि विकास, बुनियादी ढाँचे का निर्माण और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देना था। इस अध्याय में हम नियोजित विकास की आवश्यकता, योजना आयोग की स्थापना, पहली पंचवर्षीय योजना, कृषि और औद्योगिक विकास, नीति मॉडलों में बहस और आलोचनाओं का अध्ययन करेंगे।
स्वतंत्रता के समय भारत की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान और पिछड़ी हुई थी। ब्रिटिश शासन के दौरान औद्योगिक विकास लगभग न के बराबर था। इसलिए भारत को अपनी अर्थव्यवस्था के विकास के लिए एक सुनियोजित रणनीति की आवश्यकता थी। इसके लिए 15 मार्च 1950 को 'योजना आयोग' (Planning Commission) की स्थापना की गई, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते थे। योजना आयोग ने पाँच-वर्षीय योजनाओं का निर्माण और क्रियान्वयन किया। योजना आयोग की स्थापना जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुई, जो नियोजित विकास के प्रबल समर्थक थे। योजना आयोग का मुख्य उद्देश्य संसाधनों का उचित आवंटन, आर्थिक विकास में तेज़ी और गरीबी उन्मूलन था। 2014 में योजना आयोग को भंग करके 'नीति आयोग' (NITI Aayog) की स्थापना की गई।
योजना आयोग ने 1951 में पहली पाँच-वर्षीय योजना (1951-56) शुरू की, जिसका मुख्य जोर कृषि और सिंचाई पर था। पहली योजना का मॉडल 'हैरोड-डोमर मॉडल' पर आधारित था। इस योजना का मुख्य उद्देश्य खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाना और कृषि क्षेत्र का विकास करना था। दूसरी पाँच-वर्षीय योजना (1956-61) ने औद्योगिकीकरण पर जोर दिया, जो 'महालनोबिस मॉडल' पर आधारित थी। प्रसिद्ध सांख्यिकीविद् पी.सी. महालनोबिस ने दूसरी योजना के मॉडल को तैयार किया। इस योजना का उद्देश्य भारी उद्योगों, इस्पात, मशीनरी और बुनियादी ढाँचे का विकास करना था। तीसरी पाँच-वर्षीय योजना (1961-66) का उद्देश्य कृषि और औद्योगिक विकास में संतुलन बनाना था, परंतु 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के कारण यह योजना सफल नहीं रही।
भारत में कृषि विकास के लिए 'हरित क्रांति' (Green Revolution) सबसे महत्वपूर्ण कदम था। 1960 के दशक के उत्तरार्ध में भारत ने कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकी, उच्च उपज देने वाले बीज (HYV), रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और सिंचाई सुविधाओं का उपयोग बढ़ाया। हरित क्रांति का श्रेय विशेष रूप से एम.एस. स्वामीनाथन को जाता है, जिन्हें 'हरित क्रांति का जनक' कहा जाता है। इस क्रांति से गेहूँ और चावल के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई और भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना। परंतु हरित क्रांति की कुछ सीमाएँ भी थीं, जैसे यह मुख्यतः पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे समृद्ध क्षेत्रों तक सीमित रही और छोटे किसानों को पर्याप्त लाभ नहीं मिला। क्षेत्रीय असमानता और किसानों के बीच असमानता इस क्रांति की आलोचना का विषय बनी।
भारत में औद्योगिक विकास के लिए औद्योगिक नीति संकल्प (1948 और 1956) जारी किए गए। 1956 के औद्योगिक नीति संकल्प ने 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' (Mixed Economy) का सिद्धांत अपनाया, जिसमें सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों की भूमिका थी। इस नीति के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र का प्रमुख उद्योगों में नियंत्रण रहा और निजी क्षेत्र को छोटे और मध्यम उद्योगों में भागीदारी दी गई। इसी अवधि में 'लाइसेंस-परमिट राज' (Licence-Permit Raj) की आलोचना हुई, क्योंकि निजी उद्यमों को सरकारी अनुमति के बिना विस्तार करने की अनुमति नहीं थी। आर्थिक नीति पर भारत में दो मुख्य दृष्टिकोण थे- एक पक्ष राज्य के नेतृत्व वाले विकास का समर्थक था (जैसे नेहरू), जबकि दूसरा पक्ष स्वतंत्र बाजार और निजी उद्यम को बढ़ावा देना चाहता था (जैसे सी. राजगोपालाचारी)। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच बहस नियोजित विकास की राजनीति का केंद्र थी।
नियोजित विकास का एक प्रमुख उद्देश्य गरीबी उन्मूलन और सामाजिक कल्याण था। इसके लिए अनेक कार्यक्रम चलाए गए, जैसे सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952), एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP) और बाद में रोज़गार सृजन योजनाएँ। संविधान में राज्य नीति के निर्देशक तत्वों (Directive Principles) के अंतर्गत सामाजिक न्याय, समान वितरण और न्यूनतम जीवन स्तर के लिए प्रावधान किए गए। परंतु गरीबी उन्मूलन पूर्ण रूप से सफल नहीं रहा, क्योंकि विकास की रणनीति ने आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन नहीं बनाया। कुछ विद्वानों का कहना है कि विकास की गति धीमी रही और लाभ बड़े किसानों तथा उद्योगपतियों तक सीमित रहे।
नियोजित विकास की कई आलोचनाएँ हुईं। प्रथम, केंद्रीय नियोजन में लालफीताशाही और भ्रष्टाचार बढ़ा। द्वितीय, 'लाइसेंस-परमिट राज' ने निजी उद्यम को हतोत्साहित किया और आर्थिक विकास की गति धीमी की। तृतीय, औद्योगिकीकरण के बावजूद कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की उपेक्षा हुई। चतुर्थ, आय असमानता बढ़ी और गरीबी उन्मूलन में पर्याप्त सफलता नहीं मिली। पंचम, हरित क्रांति से क्षेत्रीय असमानताएँ बढ़ीं। इन आलोचनाओं के परिणामस्वरूप 1991 में आर्थिक सुधारों के साथ नियोजित विकास की प्रक्रिया में बदलाव आया और उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्वीकरण (LPG) की नीतियाँ अपनाई गईं।
| योजना | वर्ष | मॉडल | मुख्य जोर |
|---|---|---|---|
| पहली | 1951-56 | हैरोड-डोमर | कृषि, सिंचाई |
| दूसरी | 1956-61 | महालनोबिस | औद्योगिकीकरण |
| तीसरी | 1961-66 | संतुलित विकास | कृषि + उद्योग |
| नीति/घटना | वर्ष | विशेषता |
|---|---|---|
| योजना आयोग | 1950 | पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण |
| सामुदायिक विकास कार्यक्रम | 1952 | ग्रामीण विकास |
| औद्योगिक नीति संकल्प | 1956 | मिश्रित अर्थव्यवस्था |
| हरित क्रांति | 1960 के दशक | कृषि उत्पादन में वृद्धि |
| नीति आयोग | 2015 | योजना आयोग का स्थान |
नियोजित विकास स्वतंत्र भारत की आर्थिक रणनीति का केंद्र था, जिसमें योजना आयोग (1950) ने पाँच-वर्षीय योजनाओं के माध्यम से विकास का निर्देशन किया। पहली योजना (1951-56) ने कृषि को प्राथमिकता दी, जबकि दूसरी योजना (1956-61) ने महालनोबिस मॉडल के आधार पर औद्योगिकीकरण पर जोर दिया। हरित क्रांति ने खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि कर भारत को आत्मनिर्भर बनाया, परंतु क्षेत्रीय असमानताएँ भी बढ़ाईं। 1956 के औद्योगिक नीति संकल्प ने मिश्रित अर्थव्यवस्था की नींव रखी। राज्य नेतृत्व वाले विकास और मुक्त बाजार के बीच की बहस भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण रही। नियोजित विकास की आलोचनाओं (लाइसेंस-परमिट राज, लालफीताशाही) के कारण 1991 में आर्थिक सुधार किए गए और LPG नीतियाँ अपनाई गईं। इस अध्याय से यह समझना आवश्यक है कि आर्थिक विकास की राजनीति और उसकी प्राथमिकताएँ ही भारत के विकास की दिशा तय करती हैं।