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1. परिचय

पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण समकालीन विश्व राजनीति का एक गंभीर मुद्दा है। प्राकृतिक संसाधनों में जल, वायु, भूमि, खनिज, वन, वन्यजीव, तेल और गैस जैसे संसाधन शामिल हैं, जो मानव जीवन और आर्थिक विकास के लिए आवश्यक हैं। परंतु इन संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, औद्योगिकीकरण और जनसंख्या वृद्धि के कारण पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँची है। जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत का क्षरण, प्रदूषण और जैव विविधता का ह्रास जैसे मुद्दे आज वैश्विक चिंता के विषय हैं। इस अध्याय में हम पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के सम्मेलन, संसाधनों के प्रकार, संसाधनों पर विवाद और भारत की पर्यावरण नीति का अध्ययन करेंगे।

2. प्राकृतिक संसाधनों के प्रकार

प्राकृतिक संसाधनों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है- नवीकरणीय संसाधन (Renewable Resources) और अनवीकरणीय संसाधन (Non-Renewable Resources)। नवीकरणीय संसाधन वे होते हैं जिन्हें प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनः उत्पन्न किया जा सकता है, जैसे जल, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, वन और वन्यजीव। अनवीकरणीय संसाधन वे होते हैं जिनका एक बार उपयोग हो जाने के बाद पुनः निर्माण नहीं होता या बहुत धीमी गति से होता है, जैसे कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और खनिज। तेल और गैस जैसे संसाधनों पर विश्व भर में सबसे अधिक राजनीतिक विवाद होते हैं, क्योंकि ये आर्थिक विकास के प्रमुख आधार हैं। मध्य पूर्व क्षेत्र तेल के विशाल भंडार के कारण वैश्विक राजनीति का केंद्र बना हुआ है।

जल संसाधन और विवाद

जल एक मौलिक प्राकृतिक संसाधन है, जिसकी उपलब्धता जीवन के लिए अनिवार्य है। परंतु जल संसाधनों का वितरण असमान है और कई क्षेत्रों में जल की कमी (जल संकट) विकट समस्या बन गई है। नदियों के जल के बँटवारे को लेकर विभिन्न देशों के बीच विवाद होते हैं, जैसे भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल विवाद और मिस्र-इथियोपिया के बीच नील नदी विवाद। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के पैटर्न में बदलाव से जल संकट और गहरा सकता है।

3. जलवायु परिवर्तन और वैश्विक सहयोग

जलवायु परिवर्तन मानव इतिहास का सबसे बड़ा पर्यावरणीय संकट है। ग्रीनहाउस गैसों (कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन आदि) के उत्सर्जन के कारण ग्लोबल वार्मिंग हो रही है, जिससे पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप हिमनद पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर बढ़ रहा है और चरम मौसमी घटनाएँ (बाढ़, सूखा, तूफान) बढ़ रही हैं। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विश्व भर में कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुए हैं। 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल में विकसित देशों के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्य निर्धारित किए गए। 2015 के पेरिस समझौते में सभी देशों ने वैश्विक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने का लक्ष्य रखा। 2021 में ग्लासगो जलवायु सम्मेलन (COP26) भी आयोजित हुआ।

क्योटो प्रोटोकॉल (1997)

क्योटो प्रोटोकॉल को जापान के क्योटो में 1997 में अपनाया गया, जिसमें विकसित (औद्योगिक) देशों ने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने के कानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्य स्वीकार किए। यह जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध पहला महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौता था।

पेरिस समझौता (2015)

पेरिस समझौते में विकसित और विकासशील दोनों प्रकार के देशों ने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने के प्रयासों पर सहमति व्यक्त की। इसका लक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे, अधिमानतः 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना है।

4. पर्यावरण की प्रमुख चुनौतियाँ

पर्यावरण की प्रमुख चुनौतियों में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन सबसे गंभीर हैं। इसके अतिरिक्त, ओजोन परत का क्षरण, जो क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) गैसों के कारण होता है और जिससे सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणें पृथ्वी तक पहुँचती हैं, एक बड़ी चुनौती है। वायु, जल और मृदा प्रदूषण, जैव विविधता का ह्रास, वनों की कटाई, मरुस्थलीकरण और समुद्री प्रदूषण भी गंभीर समस्याएँ हैं। औद्योगिक क्रांति के बाद से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता में भारी वृद्धि हुई है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बिना इन चुनौतियों का समाधान असंभव है, क्योंकि पर्यावरणीय समस्याएँ किसी एक देश की सीमाओं में सीमित नहीं रहतीं।

5. संसाधनों पर विवाद और उनका राजनीतिक महत्व

प्राकृतिक संसाधनों पर विवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण पहलू है। तेल और गैस संसाधनों पर नियंत्रण के लिए मध्य पूर्व में अनेक संघर्ष हुए हैं। जल संसाधनों पर देशों के बीच विवाद, जैसे सिंधु जल विवाद, तेजी से महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। खनिज संसाधनों की प्राप्ति के लिए अफ्रीका में भी संघर्ष हुए हैं। सऊदी अरब, रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका और वेनेजुएला जैसे देश तेल उत्पादन में प्रमुख हैं। ओपेक (OPEC) तेल उत्पादक देशों का संगठन है, जो तेल की कीमतों और आपूर्ति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। संसाधनों पर विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से हल करना वैश्विक स्थिरता के लिए आवश्यक है।

6. भारत की पर्यावरण नीति

भारत पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। भारत के संविधान में पर्यावरण संरक्षण को मौलिक कर्तव्यों (अनुच्छेद 51A) में शामिल किया गया है। भारत सरकार ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (1986), वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972) और वन (संरक्षण) अधिनियम (1980) जैसे कानून बनाए हैं। भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेरिस समझौते को स्वीकार किया है और 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन (Net Zero Emission) का लक्ष्य रखा है। भारत ने 'अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन' (International Solar Alliance) की स्थापना की पहल की है, जिसका मुख्यालय गुरुग्राम में है। भारत में स्वच्छ ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा और सतत विकास को बढ़ावा दिया जा रहा है। भारत का मानना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण को साथ-साथ चलाना आवश्यक है।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: संसाधनों के प्रकार

प्रकार उदाहरण विशेषता
नवीकरणीय जल, सौर ऊर्जा, पवन, वन पुनः उत्पन्न हो सकते हैं
अनवीकरणीय कोयला, पेट्रोलियम, गैस एक बार उपयोग के बाद समाप्त

तालिका 2: प्रमुख जलवायु सम्मेलन

सम्मेलन वर्ष मुख्य निर्णय
क्योटो प्रोटोकॉल 1997 विकसित देशों के लिए उत्सर्जन कटौती
पेरिस समझौता 2015 तापमान वृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे
ग्लासगो COP26 2021 जलवायु लक्ष्यों में तेजी

माइंड मैप

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महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

आरेख 1: जलवायु परिवर्तन के प्रभाव

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव जलवायु परिवर्तन हिमनदों का पिघलना हिमालय सहित विश्व के हिमनद समुद्र स्तर में वृद्धि तटीय क्षेत्रों में जलमग्न होने का खतरा चरम मौसमी घटनाएँ बाढ़, सूखा, चक्रवात जलवायु परिवर्तन का कारण ग्रीनहाउस गैसों (CO2, मीथेन) का बढ़ता उत्सर्जन औद्योगिकीकरण, जनसंख्या वृद्धि, वनों की कटाई Golden Rule: ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन का मूल कारण है, यह याद रखें।

आरेख 2: जलवायु सम्मेलनों की समयरेखा

प्रमुख जलवायु सम्मेलन 1997 क्योटो प्रोटोकॉल विकसित देशों को उत्सर्जन कटौती 2015 पेरिस समझौता तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे 2021 ग्लासगो COP26 जलवायु लक्ष्यों में तेज़ी लाना भारत का योगदान पेरिस समझौते की स्वीकृति 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की पहल स्वर्ण नियम: क्योटो (1997) और पेरिस (2015) के वर्ष और लक्ष्य सदैव साथ में याद रखें।

सामान्य गलतियाँ

  1. क्योटो प्रोटोकॉल (1997) और पेरिस समझौते (2015) के वर्षों को भ्रमित करना। क्योटो पहले था, पेरिस बाद में।
  2. क्योटो प्रोटोकॉल केवल विकसित देशों के लिए बाध्यकारी था, इसे सभी देशों के लिए मान लेना गलत है।
  3. नवीकरणीय और अनवीकरणीय संसाधनों की पहचान में गलती करना; जैसे जल को अनवीकरणीय मान लेना गलत है।
  4. ओजोन परत के क्षरण का कारण CFC गैसें हैं, इसे कार्बन डाइऑक्साइड मान लेना गलत है।
  5. अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की स्थापना भारत की पहल पर हुई, इसे किसी अन्य देश का प्रयास मान लेना गलत है।
  6. ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को एक-दूसरे के विपरीत समझ लेना गलत है; ग्लोबल वार्मिंग जलवायु परिवर्तन का एक पहलू है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते के उद्देश्यों, वर्षों और बाध्यकारी प्रकृति में अंतर स्पष्ट रूप से लिखिए।
  2. जलवायु परिवर्तन के कारण, प्रभाव और उपायों को तीन श्रेणियों में विभाजित करके उत्तर लिखें।
  3. भारत की पर्यावरण नीति के कानूनों (पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 आदि) को याद रखें।
  4. संसाधनों पर विवादों (तेल, जल) के उदाहरण दीजिए और उनके राजनीतिक महत्व को समझाइए।
  5. अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और भारत के 2070 के नेट जीरो लक्ष्य को विशेष रूप से अभ्यास करें, क्योंकि भारत संबंधी प्रश्न अधिक अंकों के होते हैं।

निष्कर्ष

पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण आज विश्व की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है। नवीकरणीय और अनवीकरणीय संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी और सतत विकास की नीतियाँ अपनाना अनिवार्य है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए क्योटो प्रोटोकॉल, पेरिस समझौता और COP सम्मेलन जैसे वैश्विक प्रयास चल रहे हैं, परंतु इनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सभी देशों के सहयोग की आवश्यकता है। भारत ने पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिनमें पेरिस समझौते की स्वीकृति, 2070 का नेट जीरो लक्ष्य और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन प्रमुख हैं। पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन बनाना भविष्य की सबसे बड़ी ज़रूरत है। इस अध्याय से विद्यार्थी वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों और उनके राजनीतिक निहितार्थों को समझ सकते हैं।