15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, परंतु स्वतंत्रता के साथ ही भारत के समक्ष अनेक गंभीर चुनौतियाँ खड़ी हुईं। इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करना ही 'राष्ट्र निर्माण' (Nation Building) की प्रक्रिया थी। भारत को तीन प्रमुख चुनौतियों का सामना करना पड़ा। प्रथम, विभिन्न रियासतों का भारतीय संघ में विलय, जिससे एकीकृत भारत का निर्माण हुआ। द्वितीय, भारत का एक गणराज्य बनना और उसका संविधान बनाना। तृतीय, हिंदुस्तान की विविधता के बीच एक राष्ट्रीय पहचान का निर्माण करना। इसके अतिरिक्त, विभाजन (Partition) की त्रासदी, शरणार्थियों की समस्या, सांप्रदायिक हिंसा और राज्यों के पुनर्गठन की माँगें भी प्रमुख चुनौतियाँ थीं। इस अध्याय में हम इन सभी चुनौतियों और उनके समाधान का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
1947 में भारत के विभाजन के कारण सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी उत्पन्न हुई। विभाजन के समय लाखों लोग पलायन के दौरान मारे गए, घर-परिवार नष्ट हुए और सांप्रदायिक हिंसा फैली। पश्चिमी पंजाब से हिंदू और सिख शरणार्थी भारत आए, जबकि पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से हिंदू शरणार्थी पश्चिम बंगाल आए। शरणार्थियों के पुनर्वास की समस्या अत्यंत गंभीर थी, क्योंकि उन्हें आवास, रोज़गार और बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करनी थीं। भारत सरकार ने शरणार्थी पुनर्वास के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए, जैसे पंजाब में 'स्वर्णिम अवसर' और पश्चिम बंगाल में पुनर्वास योजनाएँ। विभाजन के दौरान महात्मा गांधी ने सांप्रदायिक सद्भाव के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया और अंततः 30 जनवरी 1948 को उनकी हत्या कर दी गई, जो विभाजन की त्रासदी की पराकाष्ठा थी।
ब्रिटिश भारत के विभाजन के समय भारत में लगभग 565 रियासतें थीं, जिन पर रियासती शासकों का नियंत्रण था। इन रियासतों के विलय के बिना भारत का एकीकरण असंभव था। इस कठिन कार्य की ज़िम्मेदारी सरदार वल्लभभाई पटेल को सौंपी गई, जिन्होंने गृह मंत्री के रूप में रियासतों के विलय में अद्वितीय योगदान दिया। उनके प्रयासों का नेतृत्व वी.पी. मेनन ने किया, जो विलय के मुख्य सचिव थे। अधिकांश रियासतों ने स्वेच्छा से विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए। परंतु कुछ रियासतों ने विलय में देरी की। हैदराबाद रियासत ने विलय में अनिच्छा दिखाई और वहाँ 'रजाकार' नामक अर्धसैनिक समूह ने आतंक फैलाया। अंततः सितंबर 1948 में भारतीय सेना के 'ऑपरेशन पोलो' के द्वारा हैदराबाद का विलय हुआ। जूनागढ़ रियासत में पाकिस्तान के साथ विलय की कोशिश की गई, परंतु जनता के विरोध के कारण जूनागढ़ भारत में विलीन हुआ। कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने पाकिस्तानी आक्रमण के बाद भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।
रियासतों के विलय के बाद भी देश की राजनीतिक संरचना में अनेक समस्याएँ थीं। विभिन्न क्षेत्रों में भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की माँग उठने लगी। 1953 में 'विशाल आंध्र' आंदोलन के परिणामस्वरूप आंध्र प्रदेश का निर्माण हुआ। इस आंदोलन के नेता पोट्टि श्रीरामुलु थे, जिन्होंने आंध्र राज्य की माँग को लेकर 1952 में आमरण अनशन किया। इसके बाद सरकार ने 'राज्य पुनर्गठन आयोग' (State Reorganisation Commission) का गठन किया, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति फ़ज़ल अली ने की। आयोग ने 1955 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और 1956 में 'राज्य पुनर्गठन अधिनियम' पारित हुआ, जिसके तहत भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया। इससे मुख्य रूप से 14 राज्य और 6 केंद्रशासित प्रदेश बने। हालाँकि, बंबई का विभाजन 1960 में हुआ, जिससे गुजरात और महाराष्ट्र राज्य बने।
रियासतों के विलय और राज्यों के पुनर्गठन के बाद भारत एकीकृत हुआ। संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को संविधान को अपनाया, जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, जब भारत एक गणराज्य बना। संविधान निर्माण में डॉ. भीमराव आंबेडकर की अध्यक्षता में प्रारूप समिति ने कार्य किया। संविधान ने भारत को एक संघीय व्यवस्था, संसदीय लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्याय, स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांतों पर आधारित गणराज्य के रूप में स्थापित किया। एक राष्ट्र के रूप में भारत की पहचान विविधता में एकता पर आधारित है। भारत ने यह स्वीकार किया कि हिंदुस्तान की भाषाएँ, धर्म, संस्कृतियाँ और परंपराएँ अलग-अलग हैं, परंतु यह सब भारतीय राष्ट्र का अभिन्न अंग हैं।
राष्ट्र निर्माण के बाद भी भारत के समक्ष अनेक चुनौतियाँ बनी रहीं। सांप्रदायिक हिंसा, जातिवाद, क्षेत्रीय असंतुलन, गरीबी और सामाजिक असमानता जैसी समस्याओं का समाधान करना आवश्यक था। इन चुनौतियों से निपटने के लिए संविधान में अनेक प्रावधान किए गए, जैसे अस्पृश्यता का उन्मूलन, अल्पसंख्यकों के अधिकार, अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण। इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने से भारत में लोकतंत्र की नींव मजबूत हुई। भारत के राष्ट्र निर्माण की यात्रा इस बात का प्रमाण है कि विविधता के बावजूद एकता संभव है।
| रियासत | शासक | विलय का वर्ष | विशेषता |
|---|---|---|---|
| हैदराबाद | निज़ाम | 1948 | ऑपरेशन पोलो |
| जूनागढ़ | नवाब | 1949 | जनमत से विलय |
| कश्मीर | महाराजा हरि सिंह | 1947 | पाकिस्तानी आक्रमण के बाद |
| चुनौती | समाधान |
|---|---|
| विभाजन की त्रासदी | शरणार्थियों का पुनर्वास |
| रियासतों का विलय | सरदार पटेल का नेतृत्व |
| राज्य पुनर्गठन | राज्य पुनर्गठन आयोग (1955) |
| एकीकरण | संविधान (26 जनवरी 1950) |
भारत का राष्ट्र निर्माण विश्व इतिहास की अद्वितीय घटना है। विभाजन की त्रासदी, शरणार्थी समस्या, सांप्रदायिक हिंसा, रियासतों के विलय, राज्यों के पुनर्गठन और एक नए संविधान के निर्माण जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करके भारत ने स्वयं को एक मजबूत और एकीकृत राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। सरदार वल्लभभाई पटेल का योगदान रियासतों के विलय में सबसे महत्वपूर्ण रहा, जिसके कारण 'लौह पुरुष' की उपाधि उन्हें मिली। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ भारत एक गणराज्य बना। राज्य पुनर्गठन ने विविध भाषाओं और संस्कृतियों को अपनी पहचान दी, जिससे राष्ट्रीय एकता और अधिक मजबूत हुई। भारत का राष्ट्र निर्माण यह सिद्ध करता है कि विविधता में एकता ही भारत की सबसे बड़ी शक्ति है। इस अध्याय का अध्ययन भारतीय राजनीति के विकास को समझने के लिए आधारभूत है।