सोवियत संघ के विघटन (1991) के बाद विश्व राजनीति में संयुक्त राज्य अमेरिका एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा। अमेरिकी वर्चस्व (US Hegemony) से अभिप्राय है अमेरिका की वह प्रमुख स्थिति, जिसमें वह आर्थिक, सैन्य, तकनीकी और सांस्कृतिक रूप से विश्व की अन्य सभी शक्तियों से कहीं आगे है। 'हेगमनी' (Hegemony) शब्द यूनानी भाषा के 'हेगेमोनिया' से बना है, जिसका अर्थ है 'नेतृत्व' या 'प्रमुखता'। यह प्रमुखता केवल बलपूर्वक नहीं, बल्कि आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनयिक प्रभाव के माध्यम से भी स्थापित होती है। इस अध्याय में हम अमेरिकी वर्चस्व के विभिन्न आयामों- सैन्य शक्ति, आर्थिक शक्ति, तकनीकी वर्चस्व, राजनैतिक प्रभाव, साथ ही इस वर्चस्व की सीमाएँ और चुनौतियों का अध्ययन करेंगे।
अमेरिकी वर्चस्व को समझने के लिए उसके विभिन्न आयामों पर विचार करना आवश्यक है। सर्वप्रथम, सैन्य आयाम में अमेरिका के पास विश्व का सबसे बड़ा रक्षा बजट है, जो अगले कई देशों के रक्षा बजटों के योग से भी अधिक है। अमेरिका के पास विश्व भर में सैन्य अड्डे हैं और उसकी नौसेना, वायुसेना तथा परमाणु क्षमता सर्वाधिक आधुनिक है। द्वितीय, आर्थिक आयाम में अमेरिका के पास विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसकी जीडीपी लगभग पाँचवाँ हिस्सा विश्व की कुल अर्थव्यवस्था की है। विश्व के अधिकांश बड़े बहुराष्ट्रीय निगम अमेरिका से संबंधित हैं और अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय व्यापार की प्रमुख मुद्रा है। तृतीय, तकनीकी आयाम में अमेरिका इंटरनेट, कंप्यूटर प्रौद्योगिकी, माइक्रोचिप, आधुनिक विज्ञान और नवाचार के क्षेत्र में अग्रणी है। चतुर्थ, सांस्कृतिक आयाम में हॉलीवुड फिल्में, अमेरिकी संगीत, फास्ट फूड और पॉप संस्कृति का प्रभाव विश्व भर में फैला हुआ है। राजनैतिक आयाम में अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है और विश्व बैंक तथा आईएमएफ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उसका निर्णायक प्रभाव है।
अमेरिकी वर्चस्व को 'हार्ड पावर' (सैन्य और आर्थिक शक्ति) और 'सॉफ्ट पावर' (सांस्कृतिक और वैचारिक प्रभाव) दोनों के आधार पर समझा जा सकता है। जोसेफ नाइ ने 'सॉफ्ट पावर' की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें देश दूसरों को बलपूर्वक नहीं, बल्कि अपने मूल्यों, संस्कृति और नीतियों की आकर्षकता से प्रभावित करता है। हालाँकि, अमेरिकी वर्चस्व की भी सीमाएँ हैं। विश्व के कई देश अमेरिकी एकाधिकार का विरोध करते हैं और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की माँग करते हैं। चीन, रूस, भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों ने अमेरिकी प्रभुत्व को संतुलित करने के लिए विभिन्न गठबंधन बनाए हैं। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट ने अमेरिकी आर्थिक वर्चस्व की कमजोरियों को उजागर किया। इसके अलावा, अमेरिका की विदेश नीति की कुछ निर्णय, जैसे इराक युद्ध (2003) और अफगानिस्तान में लंबे युद्ध, ने अमेरिकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाया। अमेरिका का यह वर्चस्व स्थायी नहीं है, क्योंकि आंतरिक आर्थिक समस्याएँ, विदेश नीति की असफलताएँ और नई शक्तियों का उदय इसके भविष्य के लिए चुनौती पेश करते हैं।
2001 में अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमलों (9/11) के बाद अमेरिका ने 'आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध' (War on Terror) की घोषणा की। 2003 में अमेरिका ने इराक में सामूहिक विनाश के हथियार होने का आरोप लगाकर, बिना संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के सैन्य आक्रमण किया। यह अमेरिकी वर्चस्व का एक प्रमुख उदाहरण था। हालाँकि, बाद में इराक में ऐसे हथियार नहीं मिले, जिससे अमेरिकी नीति की नैतिकता और वैधता पर सवाल उठे। इराक युद्ध ने अमेरिकी वर्चस्व की सीमाओं को भी दर्शाया, क्योंकि अमेरिका को इराक में वर्षों तक भारी सैन्य और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा।
11 सितंबर 2001 को आतंकवादियों ने अमेरिका में विमानों के साथ वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के दो टावरों और पेंटागन पर हमला किया। इस घटना में हजारों लोग मारे गए। इसके बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में सैन्य कार्रवाई की और तालिबान शासन को उखाड़ फेंका। इस हमले ने अमेरिकी वर्चस्व के सामने सुरक्षा की नई चुनौतियाँ खड़ी कीं।
अमेरिकी वर्चस्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती पारंपरिक राज्य नहीं, बल्कि आतंकवादी संगठनों जैसे अल-कायदा, हमास और इस्लामिक स्टेट जैसे गैर-राज्य अभिनेता हैं। ये संगठन किसी एक देश के द्वारा नियंत्रित नहीं होते और आधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग करते हुए वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा बनते हैं। यही कारण है कि अमेरिकी वर्चस्व केवल पारंपरिक सैन्य शक्ति से परे साइबर युद्ध, खुफिया जानकारी और सहयोग की रणनीतियों पर भी निर्भर करता है।
अमेरिकी वर्चस्व के प्रति विश्व में विभिन्न दृष्टिकोण हैं। कुछ लोग अमेरिका को 'वैश्विक पुलिसमैन' या 'वैश्विक शांति-रक्षक' मानते हैं, जो विश्व में व्यवस्था और लोकतंत्र को बढ़ावा देता है। दूसरी ओर, कुछ देश अमेरिका की 'एकाधिकारवादी' और 'साम्राज्यवादी' नीतियों का विरोध करते हैं और उसे आतंकवाद का प्रमुख कारण मानते हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी वर्चस्व ने विश्व में शांति और स्थिरता बनाए रखने में सहायता की है, जबकि अन्य इसे विश्व असमानता का कारण मानते हैं। भारत का दृष्टिकोण अमेरिका के साथ संतुलित संबंध रखने का रहा है, जिसमें आर्थिक सहयोग और सैन्य साझेदारी बढ़ी है, लेकिन भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति भी बनाए रखी है।
| आयाम | उदाहरण |
|---|---|
| सैन्य | सबसे बड़ा रक्षा बजट, विश्व भर में सैन्य अड्डे, परमाणु क्षमता |
| आर्थिक | सबसे बड़ी जीडीपी, डॉलर मुद्रा, बहुराष्ट्रीय निगम |
| तकनीकी | इंटरनेट, कंप्यूटर, माइक्रोचिप, नवाचार |
| सांस्कृतिक | हॉलीवुड, पॉप संस्कृति, फास्ट फूड |
| राजनैतिक | सुरक्षा परिषद स्थायी सदस्य, आईएमएफ-विश्व बैंक में प्रभाव |
| वर्ष | घटना | परिणाम |
|---|---|---|
| 1991 | सोवियत संघ का विघटन | अमेरिका एकमात्र महाशक्ति |
| 2001 | 9/11 आतंकवादी हमले | आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध |
| 2001 | अफगानिस्तान पर आक्रमण | तालिबान शासन का अंत |
| 2003 | इराक युद्ध | अमेरिकी वर्चस्व की सीमाओं का पर्दाफाश |
| 2008 | वैश्विक वित्तीय संकट | अमेरिकी आर्थिक कमजोरी का पता चला |
सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा, जिसका वर्चस्व सैन्य, आर्थिक, तकनीकी, सांस्कृतिक और राजनैतिक आयामों पर आधारित था। अमेरिकी वर्चस्व ने विश्व व्यवस्था को नई दिशा दी, परंतु 9/11 के हमले, इराक युद्ध की असफलता, 2008 के वित्तीय संकट और चीन जैसी शक्तियों के उदय ने इसकी सीमाएँ भी प्रकट कीं। अमेरिकी वर्चस्व विश्व के लिए व्यवस्था और स्थिरता का स्रोत भी बना और विवाद तथा आलोचना का केंद्र भी। भारत जैसे देश अमेरिका के साथ संतुलित और लाभकारी संबंध बनाने में सफल रहे हैं। वर्तमान विश्व व्यवस्था में अमेरिकी वर्चस्व के साथ-साथ बहुध्रुवीयता की प्रवृत्ति भी विकसित हो रही है, जिसका अध्ययन आगे के अध्यायों में किया जाएगा।