सुरक्षा की अवधारणा समकालीन विश्व राजनीति का एक केंद्रीय मुद्दा है। परंपरागत रूप से सुरक्षा का अर्थ सैन्य सुरक्षा से लिया जाता था, जिसमें राज्य की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और जनसंख्या की रक्षा पर बल दिया जाता था। परंतु समकालीन विश्व में सुरक्षा की अवधारणा का विस्तार हुआ है। अब सुरक्षा को 'पारंपरिक सुरक्षा' (Traditional Security) और 'गैर-पारंपरिक सुरक्षा' (Non-Traditional Security) में विभाजित किया जाता है। सुरक्षा की नई धारणाओं में आतंकवाद, गरीबी, जलवायु परिवर्तन, महामारी, साइबर सुरक्षा और पर्यावरणीय खतरे जैसे मुद्दे शामिल हैं। इस अध्याय में हम सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं, खतरों के प्रकार, सामूहिक सुरक्षा, निरस्त्रीकरण, आतंकवाद और भारत की सुरक्षा नीति का विश्लेषण करेंगे।
पारंपरिक सुरक्षा की अवधारणा राज्य-केंद्रित होती है। इसमें मुख्य रूप से सैन्य शक्ति, सीमाओं की रक्षा, हथियारों की संख्या और संभावित आक्रमण से बचाव पर बल दिया जाता है। पारंपरिक सुरक्षा में मुख्य खतरे सैन्य आक्रमण, क्षेत्रीय अतिक्रमण, हथियारों की होड़ और परमाणु प्रसार से उत्पन्न होते हैं। पारंपरिक सुरक्षा की दृष्टि से राज्य अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाते हैं, सैन्य गठबंधन बनाते हैं और निरस्त्रीकरण की नीतियाँ अपनाते हैं। शीत युद्ध के दौरान सुरक्षा की यही अवधारणा प्रमुख थी, जिसमें दोनों महाशक्तियों ने अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने पर जोर दिया।
पारंपरिक सुरक्षा को बढ़ाने के लिए राज्य चार मुख्य उपाय अपनाते हैं- निरस्त्रीकरण (Disarmament), हथियारों का सीमित नियंत्रण (Arms Control), विश्वास-निर्माण उपाय (Confidence Building Measures) और सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था (Collective Security)। निरस्त्रीकरण का अर्थ है हथियारों को कम करना या समाप्त करना। हथियार नियंत्रण में हथियारों की संख्या और प्रकार पर सीमाएँ लगाई जाती हैं। विश्वास-निर्माण उपायों में सूचना का आदान-प्रदान और संचार बढ़ाना शामिल है। सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था में कई राज्य मिलकर किसी एक पर आक्रमण होने पर एकजुट होकर सुरक्षा प्रदान करते हैं, जैसे संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा व्यवस्था।
गैर-पारंपरिक सुरक्षा में सैन्य खतरों के अलावा अन्य प्रकार के खतरे शामिल हैं, जो राज्य और उसकी जनता दोनों के लिए खतरा बनते हैं। इसमें आतंकवाद, गरीबी, भुखमरी, महामारी (जैसे COVID-19), जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाएँ, पर्यावरणीय विनाश, अंतरराष्ट्रीय अपराध, मानव तस्करी, ड्रग तस्करी और साइबर हमले शामिल हैं। गैर-पारंपरिक सुरक्षा के खतरे सीमा पार के होते हैं और इनका समाधान भी अकेले कोई एक राज्य नहीं कर सकता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन वैश्विक स्तर पर गरीब देशों को सबसे अधिक प्रभावित करता है, क्योंकि इन देशों के पास अनुकूलन के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते।
2020 में फैली COVID-19 महामारी गैर-पारंपरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा उदाहरण है। इसने सिद्ध किया कि स्वास्थ्य सुरक्षा भी एक गंभीर सुरक्षा मुद्दा है। महामारी ने विश्व की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं, अर्थव्यवस्थाओं और समाज को गहराई से प्रभावित किया। इससे स्पष्ट हुआ कि गैर-पारंपरिक सुरक्षा के खतरों का समाधान अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बिना संभव नहीं है।
सुरक्षा के खतरों को विभिन्न प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम, सैन्य खतरे (Military Threats) जो राज्य की संप्रभुता को चुनौती देते हैं। द्वितीय, आर्थिक खतरे (Economic Threats) जिनमें गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और संसाधनों की कमी शामिल है। तृतीय, सामाजिक और सांस्कृतिक खतरे जिनमें जातीय संघर्ष, धार्मिक कट्टरता और सांस्कृतिक पहचान का क्षरण शामिल है। चतुर्थ, पर्यावरणीय खतरे जिनमें जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाएँ और संसाधनों का अतिदोहन शामिल है। पंचम, स्वास्थ्य खतरे जिनमें महामारी और संक्रामक रोग शामिल हैं। इन सभी खतरों का स्रोत राज्य या गैर-राज्य अभिनेता हो सकते हैं। आतंकवाद एक विशेष प्रकार का खतरा है, जो गैर-राज्य अभिनेताओं द्वारा फैलाया जाता है और इसका सामना करने के लिए वैश्विक सहयोग आवश्यक है।
आतंकवाद एक गंभीर सुरक्षा खतरा है, जिसमें निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाकर भय फैलाया जाता है। आतंकवादी संगठन अपने राजनीतिक, धार्मिक या वैचारिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए हिंसा का प्रयोग करते हैं। 9/11 के हमलों के बाद विश्व में आतंकवाद के विरुद्ध जागरूकता बढ़ी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत किया गया। संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक सहयोग के लिए अनेक प्रस्ताव पारित किए गए। भारत आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार देश रहा है और उसने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के विरुद्ध ठोस कार्रवाई की माँग की है। भारत ने 'आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक केंद्र' और व्यापक अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद कन्वेंशन (Comprehensive Convention on International Terrorism - CCIT) का प्रस्ताव रखा है।
भारत की सुरक्षा नीति विभिन्न पहलुओं पर आधारित है। भारत ने पारंपरिक सुरक्षा के लिए सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण किया है और परमाणु नीति में 'पहले प्रयोग नहीं करेंगे' (No First Use) की प्रतिबद्धता व्यक्त की है। भारत गुटनिरपेक्षता के मूल्यों पर आधारित अपनी विदेश नीति के साथ सभी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखता है। भारत ने गैर-पारंपरिक सुरक्षा के क्षेत्र में भी कदम उठाए हैं- जैसे महामारी नियंत्रण, जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन, आतंकवाद-विरोधी सहयोग और साइबर सुरक्षा। भारत की सुरक्षा नीति में आंतरिक सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है, जिसमें उग्रवाद, सीमा सुरक्षा और नक्सलवाद जैसी समस्याओं का समाधान शामिल है। भारत का मानना है कि सुरक्षा केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि विकास, शांति और मानव सुरक्षा से भी जुड़ी है।
| पहलू | पारंपरिक सुरक्षा | गैर-पारंपरिक सुरक्षा |
|---|---|---|
| केंद्र | राज्य | राज्य और जनता |
| मुख्य खतरे | सैन्य आक्रमण, युद्ध | आतंकवाद, गरीबी, महामारी, जलवायु |
| समाधान | सैन्य शक्ति, गठबंधन | अंतरराष्ट्रीय सहयोग |
| उदाहरण | परमाणु प्रसार, सीमा विवाद | COVID-19, साइबर हमले |
| उपाय | विवरण |
|---|---|
| निरस्त्रीकरण | हथियारों में कमी या समाप्ति |
| हथियार नियंत्रण | हथियारों पर सीमाएँ |
| विश्वास-निर्माण उपाय | सूचना साझा करना, संचार |
| सामूहिक सुरक्षा | सभी मिलकर एक की रक्षा करें |
समकालीन विश्व में सुरक्षा की अवधारणा का विस्तार हुआ है। पारंपरिक सुरक्षा राज्य की सीमाओं और संप्रभुता की रक्षा पर केंद्रित है, जबकि गैर-पारंपरिक सुरक्षा में आतंकवाद, गरीबी, महामारी, जलवायु परिवर्तन और साइबर हमले जैसे खतरे शामिल हैं। निरस्त्रीकरण, हथियार नियंत्रण, विश्वास-निर्माण और सामूहिक सुरक्षा जैसे उपायों से राज्य अपनी सुरक्षा बढ़ाते हैं। आतंकवाद आज विश्व की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौतियों में से एक है, जिसका समाधान केवल अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ही संभव है। भारत अपनी सुरक्षा नीति में पारंपरिक और गैर-पारंपरिक दोनों पहलुओं पर ध्यान देता है। इस अध्याय से यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक विश्व में सुरक्षा केवल सैन्य शक्ति का प्रश्न नहीं है, बल्कि मानव सुरक्षा, विकास और वैश्विक सहयोग का भी प्रश्न है।