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1. परिचय

सोवियत संघ के विघटन (1991) के बाद विश्व राजनीति में एक ध्रुवीय व्यवस्था का जन्म हुआ, परंतु यह स्थिति अधिक समय तक स्थायी नहीं रही। धीरे-धीरे विश्व में नई शक्तियाँ उभरने लगीं, जो अमेरिकी वर्चस्व को संतुलित कर सकती थीं। चीन, यूरोपीय संघ, रूस, जापान और भारत जैसे देशों ने आर्थिक और राजनैतिक रूप से अपनी स्थिति मजबूत की। इन्हें 'सत्ता के वैकल्पिक केंद्र' (Alternative Centres of Power) कहा जाता है। ये केंद्र किसी एक विचारधारा पर आधारित नहीं थे, बल्कि विश्व व्यवस्था को और अधिक बहुध्रुवीय बनाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। इस अध्याय में हम चीन के उदय, यूरोपीय संघ की संरचना, आसियान (ASEAN) की भूमिका, रूस-यूक्रेन संबंध, भारत की बढ़ती भूमिका और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की संभावनाओं का विश्लेषण करेंगे।

2. चीन का उदय

चीन वर्तमान समय में विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। 1978 में डेंग शियाओपिंग ने चीन में 'उदारीकरण और आर्थिक सुधार' की नीतियाँ शुरू कीं, जिससे चीन की अर्थव्यवस्था ने तीव्र गति से विकास किया। चीन ने विदेशी निवेश को आकर्षित किया, विश्व व्यापार संगठन (WTO) में 2001 में शामिल हुआ और आज चीन विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। चीन की कुल जनसंख्या विश्व की सबसे बड़ी है, जो उसे बाजार और श्रम शक्ति की दृष्टि से विशेष लाभ देती है। चीन स्थायी सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है और उसके पास परमाणु हथियार भी हैं। चीन ने अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपना आर्थिक और राजनैतिक प्रभाव बढ़ाया है। 'एक चीन नीति' के अनुसार चीन ताइवान को अपना अंग मानता है। चीन का सैन्य खर्च भी लगातार बढ़ रहा है, जो उसकी महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है।

चीन की चुनौतियाँ

चीन की सैन्य, आर्थिक और जनसांख्यिकीय शक्ति के बावजूद उसके समक्ष अनेक चुनौतियाँ हैं। चीन की राजनीतिक व्यवस्था में लोकतांत्रिक संस्थाओं का अभाव है, जनता की स्वतंत्रताएँ सीमित हैं और मानवाधिकारों के मुद्दे उठते रहते हैं। चीन के तटीय प्रांत अधिक विकसित हैं जबकि आंतरिक प्रांत पिछड़े हुए हैं। तेज़ी से बढ़ती उम्रवार जनसंख्या और एक बच्चे की नीति के दीर्घकालिक प्रभाव भी चीन के समक्ष चुनौतियाँ हैं। इसके अलावा चीन को पर्यावरण प्रदूषण की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है।

3. यूरोपीय संघ (European Union)

यूरोपीय संघ (EU) विश्व की एक प्रमुख आर्थिक शक्ति है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोपीय देशों के बीच आपसी सहयोग से बनी। इसकी स्थापना 1992 की मास्ट्रिच संधि से एक संघ के रूप में हुई, हालाँकि इसकी शुरुआत 1950 के दशक में यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय से हुई थी। यूरोपीय संघ की अपनी संसद (यूरोपीय संसद), कमीशन, परिषद और सर्वोच्च न्यायालय (यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस) है। यूरोपीय संघ ने 'यूरो' नामक साझी मुद्रा को अपनाया है, जिसका उपयोग कई सदस्य देश करते हैं। यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में से अधिकांश ने अपनी सीमाओं की जाँच में ढील दी है, जिससे यूरोप में मुक्त आवागमन संभव हुआ। यूरोपीय संघ संयुक्त राष्ट्र में प्रभावशाली भूमिका निभाता है और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का महत्वपूर्ण सदस्य है। ब्रेक्सिट (Brexit) यानी ब्रिटेन का 2020 में यूरोपीय संघ से अलग होना यूरोपीय संघ की एकता के लिए एक बड़ी चुनौती रही है।

4. आसियान (ASEAN)

दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (ASEAN) की स्थापना 1967 में हुई। इसके संस्थापक सदस्य इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर और थाईलैंड थे। आसियान का मुख्य उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति, क्षेत्रीय स्थिरता और आपसी सहयोग को बढ़ावा देना था। बाद में ब्रुनेई, वियतनाम, लाओस, म्यांमार और कंबोडिया भी आसियान के सदस्य बने। आसियान के प्रमुख सिद्धांत 'आसियान तरीका' (ASEAN Way) में सहमति, गैर-हस्तक्षेप और क्षेत्रीय शांति पर जोर दिया जाता है। आसियान ने चीन, जापान, दक्षिण कोरिया आदि के साथ सहयोग के लिए 'आसियान प्लस थ्री' और 'पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन' जैसे मंच बनाए हैं। दक्षिण चीन सागर जैसे विवादास्पद क्षेत्रों में आसियान सदस्यों और चीन के बीच टकराव की स्थिति रहती है।

5. रूस, जापान और भारत की भूमिका

सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस ने अपनी महाशक्ति की स्थिति खो दी, परंतु वह सैन्य क्षमता, परमाणु शस्त्रागार और ऊर्जा संसाधनों की दृष्टि से विश्व की प्रमुख शक्ति बना हुआ है। रूस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है और उसके पास वीटो शक्ति है। रूस-यूक्रेन विवाद (2022 में युद्ध) ने रूस की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को दर्शाया। जापान द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आर्थिक रूप से शक्तिशाली बना और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभरा। जापान की तकनीकी शक्ति, औद्योगिक उत्पादन और विशाल विदेशी निवेश उसे आर्थिक महाशक्ति बनाते हैं। भारत भी अपनी आर्थिक वृद्धि, सॉफ्टवेयर और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की प्रगति, परमाणु क्षमता और अपनी बढ़ती सैन्य शक्ति के कारण विश्व में सत्ता के एक नए केंद्र के रूप में उभरा है। इन देशों के साथ-साथ ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, मैक्सिको जैसे देश भी आर्थिक रूप से प्रगति कर रहे हैं और वैश्विक शासन में अधिक भूमिका की माँग करते हैं।

6. बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की संभावनाएँ

सत्ता के वैकल्पिक केंद्रों के उदय ने विश्व व्यवस्था को बहुध्रुवीय बनाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। वर्तमान में विश्व की अर्थव्यवस्था, व्यापार, सैन्य शक्ति और प्रौद्योगिकी में अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ, रूस, जापान और भारत जैसी शक्तियाँ सक्रिय भूमिका निभाती हैं। गुटनिरपेक्ष आंदोलन, ब्रिक्स (BRICS) समूह, शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे मंच भी बहुध्रुवीय व्यवस्था को बढ़ावा देते हैं। भारत चीन, रूस और अमेरिका जैसी शक्तियों के साथ संतुलित संबंध रखते हुए अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। हालाँकि, बहुध्रुवीय व्यवस्था में भी अमेरिकी वर्चस्व पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि उसका स्वरूप बदल रहा है। इस प्रकार, समकालीन विश्व राजनीति में एक साथ कई शक्तियों का उदय विश्व को बहुध्रुवीय बनाने की दिशा में अग्रसर कर रहा है।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: प्रमुख वैकल्पिक केंद्र

केंद्र स्थापना/विशेषता मुख्य शक्ति
चीन 1978 में आर्थिक सुधार, 2001 में WTO सदस्य आर्थिक शक्ति, जनसंख्या
यूरोपीय संघ 1992 मास्ट्रिच संधि, यूरो मुद्रा आर्थिक सहयोग, साझा नीतियाँ
आसियान 1967 में स्थापना, 5 संस्थापक क्षेत्रीय सहयोग, व्यापार
रूस सोवियत विघटन के बाद सैन्य शक्ति, ऊर्जा
जापान द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तकनीकी, आर्थिक शक्ति

तालिका 2: चीन के उदय की विशेषताएँ और चुनौतियाँ

पक्ष विशेषताएँ
उपलब्धियाँ दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, तेज़ विकास, सैन्य विस्तार
चुनौतियाँ लोकतांत्रिक संस्थाओं का अभाव, मानवाधिकार, प्रदूषण, उम्रवार जनसंख्या

तालिका 3: आसियान के सदस्य

स्थापना वर्ष सदस्य
1967 इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड
बाद में ब्रुनेई, वियतनाम, लाओस, म्यांमार, कंबोडिया

माइंड मैप

graph TD A["सत्ता के वैकल्पिक केंद्र"] --> B["चीन"] A --> C["यूरोपीय संघ"] A --> D["आसियान"] A --> E["रूस"] A --> F["जापान"] A --> G["भारत"] B --> B1["1978 आर्थिक सुधार"] B --> B2["WTO सदस्य 2001"] B --> B3["दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था"] C --> C1["मास्ट्रिच संधि 1992"] C --> C2["यूरो मुद्रा"] C --> C3["यूरोपीय संसद"] D --> D1["1967 स्थापना"] D --> D2["आसियान तरीका"] E --> E1["स्थायी सदस्य + वीटो"] E --> E2["ऊर्जा संसाधन"] G --> G1["आईटी क्षेत्र"] G --> G2["परमाणु क्षमता"] A --> H["बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

आरेख 1: विश्व में सत्ता के वैकल्पिक केंद्र

सत्ता के वैकल्पिक केंद्र अमेरिका मुख्य शक्ति चीन आर्थिक महाशक्ति यूरोपीय संघ यूरो, साझी नीतियाँ रूस सैन्य, ऊर्जा जापान तकनीकी शक्ति भारत आईटी, परमाणु आसियान क्षेत्रीय सहयोग Golden Rule: विश्व में अब कई शक्तियाँ उभर रही हैं, इसलिए बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है।

आरेख 2: यूरोपीय संघ की संरचना

यूरोपीय संघ की संरचना यूरोपीय संघ यूरोपीय संसद सदस्य देशों की जनता चुनकर भेजती है यूरोपीय कमीशन कार्यकारी निकाय, दैनिक प्रशासन यूरोपीय न्यायालय कानून की व्याख्या और न्याय प्रमुख उपलब्धियाँ यूरो साझी मुद्रा, मुक्त आवागमन, साझा व्यापार नीति, विशाल बाजार चुनौती: ब्रेक्सिट (ब्रिटेन 2020 में अलग) स्वर्ण नियम: यूरोपीय संघ के संस्थान और यूरो मुद्रा को याद रखें, साथ में ब्रेक्सिट भी।

सामान्य गलतियाँ

  1. यह मान लेना कि यूरोपीय संघ की स्थापना 1957 में हुई, जबकि इसकी स्थापना संघ के रूप में 1992 की मास्ट्रिच संधि से हुई (हालाँकि इसका आरंभ कोयला-इस्पात समुदाय से था)।
  2. आसियान की स्थापना 1967 में हुई, परंतु अनेक विद्यार्थी इसे 1957 या 1992 समझ लेते हैं। आसियान के 5 संस्थापक सदस्य याद रखें।
  3. ब्रेक्सिट को यूरोपीय संघ का अंत मान लेना गलत है; ब्रेक्सिट केवल ब्रिटेन का यूरोपीय संघ से अलग होना है, जो 2020 में पूर्ण हुआ।
  4. चीन के आर्थिक सुधारों का श्रेय डेंग शियाओपिंग को देने के बजाय किसी और को देना। 1978 में डेंग शियाओपिंग ने सुधार शुरू किए।
  5. यह भूलना कि चीन 2001 में विश्व व्यापार संगठन (WTO) का सदस्य बना।
  6. आसियान के 'आसियान तरीके' (ASEAN Way) के सिद्धांतों- सहमति और गैर-हस्तक्षेप को समझे बिना आसियान की भूमिका को केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित कर देना।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. सत्ता के वैकल्पिक केंद्रों (चीन, EU, ASEAN, रूस, जापान, भारत) के उदय के कारणों को आर्थिक, सैन्य और राजनैतिक पक्षों से सूचीबद्ध करें।
  2. चीन के उदय की उपलब्धियों और चुनौतियों दोनों को संतुलित रूप में लिखें, क्योंकि परीक्षा में विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं।
  3. यूरोपीय संघ की संरचना (संसद, कमीशन, न्यायालय) और उसकी उपलब्धियों (यूरो, मुक्त आवागमन) को तैयार करें।
  4. आसियान की स्थापना, उद्देश्य, सदस्य और 'आसियान तरीके' के सिद्धांतों का अभ्यास करें।
  5. बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के पक्ष और विपक्ष में तर्क तैयार रखें, क्योंकि इस पर निबंधात्मक प्रश्न आ सकते हैं।

निष्कर्ष

सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व में एक ध्रुवीयता का युग शुरू हुआ, परंतु धीरे-धीरे चीन, यूरोपीय संघ, आसियान, रूस, जापान और भारत जैसी शक्तियों के उदय ने विश्व व्यवस्था को बहुध्रुवीय बनाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया। चीन की आर्थिक महाशक्ति बनने की यात्रा, यूरोपीय संघ का सफल एकीकरण, आसियान की क्षेत्रीय भूमिका और भारत की बढ़ती स्थिति इस परिवर्तन के प्रमुख उदाहरण हैं। वैश्विक शासन में संतुलन बनाने के लिए बहुध्रुवीय व्यवस्था को एक स्वस्थ विकल्प माना जा सकता है। हालाँकि, यह स्थिति भी अस्थिर है और विश्व शक्तियों के बीच सहयोग तथा प्रतिस्पर्धा दोनों बनी रहती है। इस अध्याय के ज्ञान से विद्यार्थी समकालीन विश्व राजनीति की जटिलताओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।