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1. परिचय

द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) की समाप्ति के बाद विश्व राजनीति में दो महाशक्तियों, संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और सोवियत संघ (USSR) का उदय हुआ। इन दोनों महाशक्तियों के बीच जो सैन्य, वैचारिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता शुरू हुई, उसे 'शीत युद्ध' (Cold War) कहा गया। यह युद्ध 'गर्म' (hot) नहीं था क्योंकि दोनों पक्ष सीधे तौर पर एक-दूसरे के विरुद्ध युद्ध नहीं लड़े। परंतु दोनों ने अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने के लिए परोक्ष युद्धों (proxy wars), हथियारों की दौड़, जासूसी, प्रचार और आर्थिक सहायता जैसे साधनों का प्रयोग किया। शीत युद्ध की अवधि लगभग 1945 से 1991 तक मानी जाती है, जो सोवियत संघ के विघटन के साथ समाप्त हुई।

2. शीत युद्ध के कारण

शीत युद्ध के मुख्य कारणों में पूँजीवादी अमेरिका और साम्यवादी सोवियत संघ के बीच वैचारिक भिन्नता प्रमुख थी। अमेरिका निजी संपत्ति, स्वतंत्र बाजार और उदार लोकतंत्र में विश्वास करता था, जबकि सोवियत संघ वर्गहीन समाज, राज्य के स्वामित्व वाले उद्योगों और समाजवादी क्रांति में विश्वास करता था। दोनों महाशक्तियाँ अपनी-अपनी विचारधारा को विश्व में सर्वोच्च मानती थीं। इसके अतिरिक्त, दोनों ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व पर प्रभुत्व कायम करने की कोशिश की। साम्राज्यवादी औपनिवेशिक शक्तियों के कमजोर पड़ने के बाद जो नए स्वतंत्र राष्ट्र उभरे, दोनों महाशक्तियाँ उन्हें अपने पक्ष में करना चाहती थीं। सुरक्षा की दुविधा (security dilemma) ने भी इस दौड़ को तेज किया, क्योंकि एक पक्ष की सुरक्षा बढ़ाने वाला कदम दूसरे पक्ष के लिए खतरा बन जाता था।

3. शीत युद्ध की शुरुआत और प्रमुख घटनाएँ

शीत युद्ध की शुरुआत 1947 में अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन द्वारा घोषित 'ट्रूमैन सिद्धांत' (Truman Doctrine) से मानी जाती है, जिसके तहत अमेरिका ने साम्यवाद को रोकने (containment) के लिए दुनिया भर की कमजोर सरकारों को सहायता देने का वचन दिया। इसी वर्ष 'मार्शल योजना' (Marshall Plan) के तहत अमेरिका ने युद्ध-तबाह यूरोप के पुनर्निर्माण के लिए वित्तीय सहायता दी। सोवियत संघ ने इसका विरोध करते हुए पूर्वी यूरोप के देशों पर अपना नियंत्रण मजबूत किया और 1949 में 'सोवियत संघ के नेतृत्व वाला आर्थिक संगठन COMECON' बनाया। 1948-49 में बर्लिन की नाकाबंदी और पश्चिमी शक्तियों द्वारा बर्लिन एयरलिफ्ट शीत युद्ध का प्रतीक बन गई। 1949 में नाटो (NATO - North Atlantic Treaty Organisation) की स्थापना हुई, जबकि सोवियत संघ के जवाब में 1955 में वारसा पैक्ट (Warsaw Pact) बना। 1949 में चीन में साम्यवादी क्रांति की सफलता, 1950-53 का कोरियाई युद्ध और 1962 का क्यूबा मिसाइल संकट शीत युद्ध की प्रमुख घटनाएँ थीं।

बर्लिन की नाकाबंदी (1948-49)

जून 1948 में सोवियत संघ ने पश्चिमी बर्लिन तक जाने वाले सभी सड़क, रेल और जल मार्गों को अवरुद्ध कर दिया। पश्चिमी शक्तियों ने लगभग एक वर्ष तक बर्लिन एयरलिफ्ट द्वारा नगर की आपूर्ति की। अंततः मई 1949 में नाकाबंदी हटाई गई, किंतु इस घटना ने दोनों खेमों के बीच की खाई को गहरा कर दिया।

क्यूबा मिसाइल संकट (1962)

क्यूबा मिसाइल संकट शीत युद्ध का सबसे खतरनाक क्षण था, जब विश्व परमाणु युद्ध के कगार पर आ गया था। सोवियत संघ ने क्यूबा में परमाणु मिसाइलें स्थापित करनी शुरू कीं, जिससे अमेरिका की सीमा सीधे खतरे में आ गई। अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी ने नौसेना की नाकाबंदी करते हुए सोवियत जहाजों को रोकने की चेतावनी दी। तेरह दिनों तक तनाव बना रहा। अंततः सोवियत संघ ने मिसाइलें वापस ले लीं और बदले में अमेरिका ने तुर्की से अपनी मिसाइलें हटाने का आश्वासन दिया। इस संकट के बाद 1963 में 'हॉटलाइन' (Hotline) की स्थापना हुई, जिससे दोनों नेताओं के बीच सीधा संवाद संभव हो सका।

4. गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement)

शीत युद्ध के दौरान कई नए स्वतंत्र देशों ने किसी भी गुट में शामिल होने से इनकार कर दिया। इन देशों ने गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) का मार्ग चुना, जिसका अर्थ था कि वे न तो अमेरिकी गुट में जाएंगे और न ही सोवियत गुट में। भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति जोसिप ब्रोज़ टीटो, मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर, इंडोनेशिया के सुकर्णो और घाना के क्वामे नक्रूमा इस आंदोलन के मुख्य संस्थापक थे। 1961 में बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में पहला गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। गुटनिरपेक्ष देशों का उद्देश्य था- विश्व शांति को बढ़ावा देना, उपनिवेशवाद और नस्लभेद का विरोध करना, विकासशील देशों का आर्थिक विकास करना और शीत युद्ध में महाशक्तियों के प्रभाव से स्वतंत्र रहना। नेहरू के दृष्टिकोण में गुटनिरपेक्षता निष्क्रिय तटस्थता नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता और विश्व शांति के लिए एक सक्रिय विदेश नीति थी।

5. दो ध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Bipolar World Order)

शीत युद्ध के दौरान विश्व दो खेमों में बंट गया था- अमेरिकी नेतृत्व वाला पूँजीवादी खेमा और सोवियत नेतृत्व वाला समाजवादी खेमा। अमेरिका ने नाटो, दक्षिण-पूर्व एशियाई संधि संगठन (SEATO), सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (CENTO) जैसे सैन्य संगठन बनाए, जबकि सोवियत संघ ने वारसा पैक्ट का निर्माण किया। हथियारों की दौड़ में दोनों महाशक्तियों ने भारी मात्रा में परमाणु और पारंपरिक हथियारों का संग्रह किया। 'संतुलित विनाश की क्षमता' (Mutually Assured Destruction - MAD) की अवधारणा का विकास हुआ, जिसके अनुसार यदि एक पक्ष परमाणु हमला करता तो दूसरा पक्ष भी उसे बराबर या अधिक विनाश का जवाब दे सकता था। इस भय ने दोनों महाशक्तियों को सीधे युद्ध से रोके रखा। 'क्षेत्रीय खेलों' में भी इन दोनों महाशक्तियों का प्रभाव दिखता था, जैसे कोरिया, वियतनाम, अफगानिस्तान और कई अफ्रीकी देशों में हुए परोक्ष युद्धों में।

6. शीत युद्ध में भारत की भूमिका

भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई। नेहरू का मानना था कि भारत को किसी भी सैन्य गुट से जुड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि इससे भारत की स्वतंत्र विदेश नीति प्रभावित होगी। भारत ने सोवियत संघ के यूरोप में विस्तार, चीन में क्रांति, कोरियाई युद्ध, क्यूबा मिसाइल संकट जैसे मुद्दों पर अपनी स्वतंत्र स्थिति बनाई। भारत को कश्मीर विवाद जैसे मुद्दों पर ब्रिटेन और अमेरिका से संयुक्त राष्ट्र में निराशा हुई, क्योंकि पाकिस्तान इन गुटों का सदस्य बन गया था। फिर भी भारत ने सक्रिय रूप से दोनों महाशक्तियों से संबंध बनाए रखे और कई मुद्दों पर विश्व में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश की।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: शीत युद्ध की प्रमुख घटनाएँ

वर्ष घटना महत्व
1947 ट्रूमैन सिद्धांत अमेरिका ने साम्यवाद को रोकने की नीति अपनाई
1947 मार्शल योजना अमेरिका ने यूरोपीय पुनर्निर्माण हेतु आर्थिक सहायता दी
1948-49 बर्लिन नाकाबंदी बर्लिन एयरलिफ्ट, पश्चिमी बर्लिन की रक्षा
1949 नाटो की स्थापना अमेरिकी नेतृत्व वाला सैन्य गठबंधन
1955 वारसा पैक्ट सोवियत नेतृत्व वाला सैन्य गठबंधन
1961 बेलग्रेड शिखर सम्मेलन गुटनिरपेक्ष आंदोलन का प्रारंभ
1962 क्यूबा मिसाइल संकट विश्व परमाणु युद्ध के कगार पर
1991 सोवियत संघ का विघटन शीत युद्ध की समाप्ति

तालिका 2: महाशक्तियों की तुलना

पहलू संयुक्त राज्य अमेरिका सोवियत संघ
विचारधारा पूँजीवाद, उदार लोकतंत्र साम्यवाद, समाजवाद
आर्थिक व्यवस्था निजी स्वामित्व, मुक्त बाजार राज्य स्वामित्व, केंद्रीय योजना
सैन्य गठबंधन नाटो, SEATO, CENTO वारसा पैक्ट
प्रमुख सिद्धांत ट्रूमैन सिद्धांत साम्यवादी विस्तार नीति
प्रभाव क्षेत्र पश्चिमी यूरोप, जापान पूर्वी यूरोप, क्यूबा

माइंड मैप

graph TD A["शीत युद्ध का दौर"] --> B["शीत युद्ध के कारण"] A --> C["दो महाशक्तियाँ: USA और USSR"] A --> D["प्रमुख घटनाएँ"] A --> E["गुटनिरपेक्ष आंदोलन"] A --> F["दो ध्रुवीय विश्व व्यवस्था"] D --> D1["ट्रूमैन सिद्धांत (1947)"] D --> D2["बर्लिन नाकाबंदी (1948-49)"] D --> D3["नाटो (1949) और वारसा पैक्ट (1955)"] D --> D4["क्यूबा मिसाइल संकट (1962)"] E --> E1["नेहरू, टीटो, नासिर, सुकर्णो, नक्रूमा"] E --> E2["1961 बेलग्रेड शिखर सम्मेलन"] F --> F1["परमाणु हथियारों की दौड़"] F --> F2["MAD सिद्धांत"] A --> G["1991: सोवियत संघ का विघटन"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

आरेख 1: दो ध्रुवीय विश्व की संरचना

दो ध्रुवीय विश्व व्यवस्था की संरचना अमेरिकी गुट (पूँजीवादी) नेता: संयुक्त राज्य अमेरिका नाटो, SEATO, CENTO सोवियत गुट (समाजवादी) नेता: सोवियत संघ वारसा पैक्ट, COMECON गुटनिरपेक्ष देश भारत, मिस्र, यूगोस्लाविया स्वर्ण नियम: शीत युद्ध केवल महाशक्तियों के बीच प्रतिद्वंद्विता नहीं थी, वरन् पूरा विश्व दो विचारधाराओं और दो सैन्य गुटों में विभाजित हो गया था।

आरेख 2: शीत युद्ध की समयरेखा

शीत युद्ध की समयरेखा (1947-1991) 1947 ट्रूमैन सिद्धांत 1949 नाटो की स्थापना 1961 बेलग्रेड शिखर सम्मेलन 1962 क्यूबा मिसाइल संकट 1991 सोवियत संघ का विघटन क्यूबा मिसाइल संकट का महत्व विश्व परमाणु युद्ध के कगार पर आया; बाद में हॉटलाइन स्थापित हुई Golden Rule: घटनाओं के क्रम (1947 से 1991) को याद रखें, क्योंकि परीक्षा में वर्ष आधारित प्रश्न आते हैं।

सामान्य गलतियाँ

  1. यह मान लेना कि शीत युद्ध में दोनों महाशक्तियों ने सीधे युद्ध किया, जबकि यह 'शीत' (cold) इसीलिए था कि दोनों पक्षों के बीच सीधा गर्म युद्ध नहीं हुआ।
  2. गुटनिरपेक्षता को तटस्थता समझना गलत है। गुटनिरपेक्षता निष्क्रिय नीति नहीं थी, बल्कि विश्व शांति के लिए सक्रिय विदेश नीति थी।
  3. नाटो की स्थापना 1949 में हुई और वारसा पैक्ट 1955 में- अनेक विद्यार्थी इनके वर्षों को आपस में बदल देते हैं।
  4. यह भूलना कि क्यूबा मिसाइल संकट 1962 में हुआ था, न कि 1952 या 1960 में। यह शीत युद्ध का सर्वाधिक खतरनाक क्षण था।
  5. गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापकों के नाम भूलना। ये हैं- नेहरू (भारत), टीटो (यूगोस्लाविया), नासिर (मिस्र), सुकर्णो (इंडोनेशिया) और नक्रूमा (घाना)।
  6. MAD (Mutually Assured Destruction) को मार्शल योजना समझ लेना गलत है। MAD परमाणु विनाश की अवधारणा है, जबकि मार्शल योजना यूरोप के पुनर्निर्माण के लिए अमेरिकी आर्थिक सहायता कार्यक्रम था।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. प्रमुख तिथियों की एक सूची बनाएँ और उन्हें कहानी के रूप में याद करें, जैसे- 1947 (ट्रूमैन) → 1948-49 (बर्लिन) → 1949 (नाटो) → 1955 (वारसा पैक्ट) → 1961 (बेलग्रेड) → 1962 (क्यूबा) → 1991 (विघटन)।
  2. 'शीत युद्ध', 'गुटनिरपेक्षता', 'दो ध्रुवीयता', 'साम्यवाद', 'पूँजीवाद' जैसे प्रमुख शब्दों की सटीक परिभाषाएँ याद रखें, क्योंकि अवधारणात्मक प्रश्न अधिक अंक के होते हैं।
  3. क्यूबा मिसाइल संकट और बर्लिन नाकाबंदी के कारण-परिणाम को विस्तार से लिखने का अभ्यास करें; ये बोर्ड परीक्षा के लोकप्रिय विषय हैं।
  4. गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत और नेहरू की भूमिका पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि इससे भारत के संदर्भ में प्रश्न बनाए जाते हैं।
  5. MAD सिद्धांत और परमाणु हथियारों की दौड़ के निहितार्थ को समझें, क्योंकि यह शीत युद्ध की आंतरिक तर्कशक्ति को समझने के लिए आवश्यक है।

निष्कर्ष

शीत युद्ध का दौर (1945-1991) विश्व राजनीति का वह युग था, जिसमें अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वैचारिक, सैन्य और आर्थिक प्रतिद्वंद्विता चली। इस दौरान विश्व दो ध्रुवों में विभाजित हो गया और अनेक सैन्य गठबंधन, हथियारों की दौड़ और परोक्ष युद्ध हुए। साथ ही, गुटनिरपेक्ष आंदोलन जैसे वैकल्पिक रास्ते भी विकसित हुए, जिनमें भारत ने प्रमुख भूमिका निभाई। शीत युद्ध के विद्यार्थी के लिए यह आवश्यक है कि वह इस युग की प्रमुख घटनाओं, उनके कारणों और परिणामों को कालक्रम में समझे, क्योंकि यही ज्ञान आगे के अध्यायों (दो ध्रुवीयता का अंत, अमेरिकी वर्चस्व आदि) को समझने की नींव तैयार करता है। इस अध्याय की अवधारणाएँ वैश्विक राजनीति की बुनियाद हैं, जिन्हें रटने के बजाय तार्किक ढंग से आत्मसात करना चाहिए।