यह कविता 'वोकेशन' महान कवि और नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) द्वारा रचित है, जिसे मूल बांग्ला से अंग्रेज़ी में अनुवादित किया गया है। कविता में एक बच्चे की आँखों से देखा गया संसार है, जहाँ वह अपनी दिनचर्या से ऊबा हुआ है और अन्य लोगों के कार्यों में स्वतंत्रता देखकर उनकी नौकरी (vocation) को अपनाना चाहता है। बच्चे को लगता है कि फेरीवाला (hawker), माली (gardener) और चौकीदार (watchman) पूर्ण स्वतंत्रता से अपना काम करते हैं, जबकि उसका जीवन स्कूल, होमवर्क और नियमों से बँधा हुआ है।
कविता में तीन दृश्य हैं — सुबह स्कूल जाते समय बच्चा चूड़ियाँ बेचने वाले फेरीवाले को देखता है, जो बिना किसी निश्चित समय के स्वतंत्र रूप से घूमता है। दोपहर में स्कूल से लौटते समय वह माली को बगीचा खोदते हुए देखता है, जो अपनी कुदाल से जो चाहता है वही करता है। और रात में सोते समय वह चौकीदार को सड़क पर टहलते हुए देखता है, जिसे कोई सोने का आदेश नहीं देता। बच्चा इन तीनों की स्वतंत्रता से प्रभावित होकर सोचता है — काश! मैं भी ऐसा होता।
यह कविता बच्चों की मासूम मनोदशा को दर्शाती है। बच्चे अक्सर वयस्कों की स्वतंत्रता देखकर सोचते हैं कि बड़ों का जीवन आज़ाद है, जबकि उन्हें यह नहीं दिखता कि हर काम की अपनी मजबूरियाँ होती हैं।
रवींद्रनाथ टैगोर (1861–1941) भारत के महानतम कवियों, लेखकों और दार्शनिकों में से एक हैं। वे पहले भारतीय थे जिन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार (1913) मिला, जो उनकी रचना 'गीतांजलि' के लिए प्रदान किया गया। उन्होंने कविताएँ, कहानियाँ, नाटक, उपन्यास और गीत लिखे। उनकी रचनाएँ प्रकृति, मानवता और स्वतंत्रता के प्रति गहरी संवेदना से भरी हैं।
'वोकेशन' जैसी कविताओं में टैगोर ने बच्चों की मनोदशा और उनकी मासूम इच्छाओं को अत्यंत सहजता से चित्रित किया है। वे बच्चों के हृदय की गहराई को समझते थे, यही कारण है कि उनकी बाल-कविताएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।
सुबह स्कूल जाते समय बच्चा सड़क पर चूड़ियाँ बेचने वाले फेरीवाले को देखता है, जो ऊँची आवाज़ में "चूड़ियाँ, क्रिस्टल चूड़ियाँ!" पुकारता है। बच्चा सोचता है कि फेरीवाले के पास कोई निश्चित विद्यालय नहीं है, कोई बाध्यता नहीं है — वह स्वतंत्र रूप से घूमता और बेचता है। बच्चा कहता है — काश! मैं भी एक फेरीवाला होता।
दोपहर में स्कूल से लौटते समय बच्चा अपने घर के द्वार से बाहर माली को ज़मीन खोदते हुए देखता है। माली अपनी कुदाल (spade) से जो चाहता है वही करता है — कोई उसे रोकता नहीं, कोई उसे नहीं डाँटता। बच्चा सोचता है — काश! मैं भी माली होता, जो अपनी इच्छा से काम करता।
रात में जब बच्चा बिस्तर पर लेटा होता है, तो वह खिड़की से चौकीदार को देखता है, जो गली में ऊपर-नीचे टहलता रहता है। चौकीदार को कोई सोने का आदेश नहीं देता, वह स्वतंत्र है। बच्चा सोचता है — काश! मैं भी चौकीदार होता, जो रात भर स्वतंत्र रूप से टहलता।
इस कविता का मूलभाव बच्चे की स्वतंत्रता की इच्छा है। बच्चा अपने नियमों और बाध्यताओं (स्कूल, होमवर्क, सोने का समय) से ऊबा हुआ है और अन्य लोगों के व्यवसायों में स्वतंत्रता देखता है। उसे लगता है कि फेरीवाला, माली और चौकीदार किसी के अधीन नहीं हैं।
कविता का संदेश यह है कि हर व्यक्ति के काम की अपनी कठिनाइयाँ होती हैं, परंतु बच्चों को वह दिखाई नहीं देतीं। बच्चा दूसरों की स्वतंत्रता देखकर अपनी बाध्यताओं से भागना चाहता है, परंतु यह केवल मासूम कल्पना है। यह कविता हमें बच्चों की भावनाओं को समझने और उनकी दुनिया को उनकी दृष्टि से देखने की प्रेरणा देती है।
| समय | बच्चा किसे देखता है | बच्चे की इच्छा |
|---|---|---|
| सुबह (स्कूल जाते समय) | फेरीवाला (चूड़ीवाला) | फेरीवाला बनना |
| दोपहर (स्कूल से लौटते समय) | माली | माली बनना |
| रात (सोते समय) | चौकीदार | चौकीदार बनना |
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| कवि | रवींद्रनाथ टैगोर |
| कविता का विषय | बच्चे की स्वतंत्रता की इच्छा |
| मुख्य प्रतीक | फेरीवाला, माली, चौकीदार |
| केंद्रीय भाव | बच्चे को वयस्कों का जीवन स्वतंत्र लगता है |
'वोकेशन' कविता बचपन की मासूम कल्पनाओं और स्वतंत्रता की इच्छा का सुंदर चित्रण है। स्कूल जाते, लौटते और सोते समय बच्चा क्रमशः फेरीवाले, माली और चौकीदार को देखता है और उनके जीवन को पूर्ण स्वतंत्र मानकर उनके व्यवसाय को अपनाना चाहता है। कविता हमें सिखाती है कि हर व्यक्ति के काम की अपनी कठिनाइयाँ और ज़िम्मेदारियाँ होती हैं, जो बाहर से दिखाई नहीं देतीं। यह कविता बच्चों की भावनाओं को समझने और उन्हें सही दिशा दिखाने की प्रेरणा देती है।