"ऐसे-ऐसे" कक्षा छह की पुस्तक वसंत का आठवाँ पाठ है। यह हिंदी के श्रेष्ठ व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई द्वारा रचित एक हास्य-व्यंग्यात्मक एकांकी (नाटक) है। इस एकांकी का केंद्र कुंदन नामक एक लड़का है, जो स्कूल न जाने के लिए बीमार होने का बहाना बनाता है। वह कहता है कि उसे "ऐसे-ऐसे" पेट में दर्द है, "ऐसे-ऐसे" सिर में दर्द है। माँ उसके बहानों पर विश्वास कर लेती है और चिंतित हो जाती है, जबकि उसकी बहन रजनी समझ जाती है कि कुंदन स्कूल से बचने के लिए नाटक कर रहा है।
यह एकांकी बच्चों की मासूम शरारत, उनके बहानेबाज़ी और माँ-बाप की चिंता का बड़ा ही हास्यपूर्ण चित्रण करती है। परसाई जी की लेखनी की विशेषता है कि वे साधारण घटनाओं में भी व्यंग्य का ऐसा तड़का लगाते हैं कि पाठक हँसते-हँसते सोचने पर मजबूर हो जाता है। "ऐसे-ऐसे" में भी वे बताते हैं कि बच्चे अपनी शरारतों से कैसे माँ-बाप को परेशान करते हैं, लेकिन अंत में सच्चाई सामने आ ही जाती है।
इस पाठ के माध्यम से विद्यार्थी एकांकी विधा से परिचित होते हैं। एकांकी एक छोटा नाटक होता है, जिसमें कम पात्र और एक ही केंद्रीय घटना होती है। "ऐसे-ऐसे" में पात्र कम हैं और घटना सरल है, इसलिए यह बच्चों के लिए सरलता से समझ में आता है। पाठ का हास्य पक्ष बच्चों को आकर्षित करता है और व्यंग्य पक्ष उन्हें सोचने पर मजबूर करता है कि स्कूल जाना कितना आवश्यक है।
इस एकांकी के रचयिता हरिशंकर परसाई हैं, जिनका जन्म सन् 1924 में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में हुआ था। वे हिंदी के सबसे प्रसिद्ध व्यंग्य लेखक माने जाते हैं। उनके व्यंग्य में सामाजिक बुराइयों, ढोंग और पाखंड पर गहरा प्रहार होता है, लेकिन उसका अंदाज़ हास्यपूर्ण होता है। सन् 1995 में उनका निधन हुआ।
हरिशंकर परसाई की प्रमुख रचनाओं में "ज्वाला प्रसाद जी की दिनचर्या", "रानी नागफनी की कहानी", "ठेले पर हिमालय", "तब की बात और थी", "विकलांग श्रद्धा का दौर" और "सदाचार का ताबीज" आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनकी रचनाओं में जीवन की विडंबनाओं को हास्य के माध्यम से इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि पाठक हँसते हुए भी गंभीर सत्य को समझ लेता है।
परसाई जी की लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सूक्ष्म दृष्टि है। वे रोज़मर्रा के जीवन की साधारण घटनाओं में छिपे व्यंग्य को पकड़ लेते हैं। "ऐसे-ऐसे" में भी उन्होंने बच्चों के स्कूल-भागने के बहानों को इतना सजीव और हास्यपूर्ण बना दिया है कि यह आज के बच्चों के लिए भी पूरी तरह प्रासंगिक है। उनकी भाषा सरल, सहज और संवादात्मक है।
एकांकी की शुरुआत में सुबह का समय है। कुंदन की माँ उसे स्कूल के लिए जगाती है। लेकिन कुंदन उठना नहीं चाहता, क्योंकि उसे स्कूल जाना पसंद नहीं है। वह बहाना बनाता है कि उसे "ऐसे-ऐसे" पेट में दर्द हो रहा है। माँ चिंतित हो जाती है और पूछती है कि दर्द कैसा है। कुंदन "ऐसे-ऐसे" कहकर अपने पेट की तरफ इशारा करता है, लेकिन वास्तव में उसे कोई दर्द नहीं होता।
माँ कुंदन के बहाने पर विश्वास कर लेती है। इसी बीच रजनी (कुंदन की बहन) कमरे में आती है और समझ जाती है कि कुंदन स्कूल न जाने के लिए नाटक कर रहा है। वह कुंदन की नकल उड़ाती है और उसे चिढ़ाती है। कुंदन की माँ दोनों बच्चों की बातें सुनती है। कुंदन के बहानों की वजह से माँ का विश्वास भी टूटने लगता है।
अंत में डॉक्टर को बुलाया जाता है। डॉक्टर कुंदन की जाँच करता है और बताता है कि कुंदन को कोई बीमारी नहीं है, वह पूरी तरह स्वस्थ है। इस प्रकार कुंदन का नाटक पकड़ा जाता है और उसे स्कूल जाना ही पड़ता है। इस हास्यपूर्ण अंत के साथ एकांकी समाप्त होती है और यह सीख मिलती है कि बहानेबाज़ी से काम नहीं चलता, सच्चाई हमेशा सामने आती है।
एकांकी का मूलभाव बच्चों की शरारत और बहानेबाज़ी का हास्यपूर्ण चित्रण है। परसाई जी दिखाते हैं कि बच्चे कितनी सफाई से बहाने बना सकते हैं, लेकिन सच्चाई को छिपाना असंभव है। "ऐसे-ऐसे" कहकर बहाना बनाने वाला कुंदन अंत में पकड़ा जाता है। यह व्यंग्य उन सभी बच्चों पर है जो स्कूल या पढ़ाई से बचने के लिए बहाने बनाते हैं।
एकांकी का संदेश है कि स्कूल जाना कितना आवश्यक है। पढ़ाई-लिखाई से ही बच्चों का भविष्य उज्ज्वल होता है। स्कूल जाने से बचने के लिए बहाने बनाना गलत है। माँ-बाप बच्चों की परवाह करते हैं, इसलिए वे उनकी बीमारी की बात पर चिंतित होते हैं, लेकिन बच्चों को झूठ नहीं बोलना चाहिए। झूठ और बहानेबाज़ी से काम नहीं चलता, सच्चाई हमेशा सामने आती है।
एकांकी का एक और संदेश यह है कि हमें हमेशा सच बोलना चाहिए। कुंदन का झूठ उसे अंत में शर्मिंदगी में डालता है। बच्चों को यह समझना चाहिए कि किसी भी काम से बचने के लिए झूठ बोलना सही नहीं है। यदि कोई काम कठिन लगता है, तो उससे भागने के बजाय उसका सामना करना चाहिए। यही जीवन में सफलता का मार्ग है।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| पाठ का नाम | ऐसे-ऐसे |
| लेखक | हरिशंकर परसाई |
| विधा | हास्य-व्यंग्यात्मक एकांकी |
| मुख्य पात्र | कुंदन, माँ, रजनी, डॉक्टर |
| केंद्रीय घटना | कुंदन का स्कूल से बचने का नाटक |
| मूलभाव | बहानेबाज़ी का हास्यपूर्ण चित्रण |
| संदेश | झूठ और बहाने से काम नहीं चलता, स्कूल जाना आवश्यक है |
| पात्र | स्वभाव | एकांकी में भूमिका |
|---|---|---|
| कुंदन | शरारती, बहानेबाज़ | बीमार होने का नाटक करता है |
| माँ | स्नेहपूर्ण, चिंतित | बेटे के बहाने पर पहले विश्वास करती है |
| रजनी | समझदार, चुस्त | कुंदन का नाटक पहचानती है |
| डॉक्टर | ज्ञानी, कुशल | कुंदन को स्वस्थ बताकर नाटक पकड़ता है |
| सीख | विवरण |
|---|---|
| सच बोलना | झूठ अंत में पकड़ा ही जाता है |
| स्कूल का महत्व | पढ़ाई से ही भविष्य उज्ज्वल होता है |
| बहानेबाज़ी से बचना | किसी काम से भागना सही नहीं |
| माँ-बाप का स्नेह | वे चिंता करते हैं, उनसे झूठ न बोलें |
| सामना करना | कठिन काम से भागने के बजाय सामना करें |
"ऐसे-ऐसे" हरिशंकर परसाई की हास्य-व्यंग्यात्मक शैली का सुंदर उदाहरण है। इस एकांकी के माध्यम से लेखक ने बच्चों की बहानेबाज़ी और स्कूल-भागने की आदत पर इतना जीवंत और हास्यपूर्ण व्यंग्य किया है कि पाठक हँसते हुए भी गंभीर सीख लेता है। कुंदन का "ऐसे-ऐसे" बहाना अंत में पकड़ा जाता है, जो हमें सिखाता है कि झूठ और बहानेबाज़ी से काम नहीं चलता, सच्चाई हमेशा सामने आती है। यह एकांकी बच्चों को स्कूल जाने के महत्व और सच बोलने की सीख देती है, इसलिए यह कक्षा छह के पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है।