"झाँसी की रानी" कक्षा छह की पुस्तक वसंत का दसवाँ पाठ है। यह प्रसिद्ध कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित वीर रस की एक अमर कविता है। इस कविता में कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई के वीरतापूर्ण जीवन, साहस और देशभक्ति का गुणगान किया है। "बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी" - यह प्रसिद्ध पंक्ति आज भी देश के हर कोने में देशभक्ति की भावना जगाती है। यह कविता स्वतंत्रता संग्राम की महान नायिका रानी लक्ष्मीबाई को श्रद्धांजलि है।
कविता में रानी लक्ष्मीबाई का बचपन से लेकर वीरगति तक का पूरा जीवन चित्रित है। रानी का बचपन का नाम मणिकर्णिका था। वे बचपन में ही वीरों के साथ खेलती थीं और उनमें साहस का विकास होता था। झाँसी के राजा गंगाधर राव से उनका विवाह हुआ। राजा की मृत्यु के बाद रानी ने झाँसी की बागडोर संभाली। जब अंग्रेज़ों ने झाँसी पर अधिकार करना चाहा, तो रानी ने अपनी वीरता से उनका सामना किया।
यह कविता वीर रस की सर्वोत्तम कविताओं में से एक है। इसमें युद्ध की घटनाओं, रानी के शौर्य और उनकी देशभक्ति का इतना सजीव वर्णन है कि पढ़ने वाले के मन में रोमांच और देशभक्ति की भावना जाग उठती है। रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में देश को अंग्रेज़ों से मुक्त कराने की कोशिश में हुआ। यह कविता उनकी वीरता को अमर करती है।
इस कविता की रचयिता सुभद्रा कुमारी चौहान हैं, जिनका जन्म सन् 1904 में इलाहाबाद (प्रयागराज) के निकट निहालपुर गाँव में हुआ था। वे हिंदी की प्रसिद्ध कवयित्री और स्वतंत्रता संग्राम की सेनानी भी थीं। उनकी कविताओं में देशभक्ति, वीरता, प्रकृति-प्रेम और मानवीय संवेदना का सुंदर संगम मिलता है। सन् 1948 में उनका निधन हुआ।
सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रमुख रचनाओं में कविता-संग्रह "मुकुल", "त्रिधारा" तथा गद्य रचनाएँ "बिखरे मोती", "सीधे-सादे चित्र" आदि उल्लेखनीय हैं। उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता "झाँसी की रानी" है, जिसे हिंदी की सबसे लोकप्रिय वीर-कविताओं में गिना जाता है। उनकी कविता "ठुकरा दो या प्यार करो" भी बहुत प्रसिद्ध है।
कवयित्री की कविताओं की विशेषता है कि वे सरल भाषा में गहरे भाव व्यक्त करती हैं। "झाँसी की रानी" में उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई के साहस, त्याग और देशभक्ति को इस तरह प्रस्तुत किया है कि हर भारतीय के हृदय में गर्व और श्रद्धा की भावना उत्पन्न होती है। उनका लेखन देशप्रेम की प्रेरणा से भरा है।
कविता की शुरुआत में कवयित्री बताती हैं कि बुंदेले हरबोलों (बुंदेलखंड के लोगों) के मुँह से उन्होंने झाँसी वाली रानी की कहानी सुनी थी। इसके बाद वे रानी लक्ष्मीबाई का परिचय देती हैं। रानी का बचपन का नाम मणिकर्णिका था। वे बचपन में शिव, दुर्गा, हनुमान आदि के सामने सिर झुकाती थीं और नाना साहब, तात्या टोपे, राव साहब जैसे वीरों के साथ खेलती थीं। इसी खेल में उनकी वीरता विकसित हुई।
रानी का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव से हुआ। राजा की मृत्यु के बाद झाँसी की रानी बनकर लक्ष्मीबाई ने राज्य की बागडोर संभाली। अंग्रेज़ों ने झाँसी को अपने अधिकार में लेने की योजना बनाई। इसी बीच सन् 1857 में देशभर में अंग्रेज़ों के खिलाफ विद्रोह फैला। रानी लक्ष्मीबाई ने विद्रोह का नेतृत्व किया और अंग्रेज़ों से युद्ध किया।
युद्ध में रानी ने अद्वितीय वीरता दिखाई। वे पुरुषों के वेश में युद्ध लड़ीं और अंग्रेज़ों को कई बार परास्त किया। लेकिन अंततः वीरगति को प्राप्त हुईं। कवयित्री का मानना है कि जो लोग अपने देश के लिए मरते हैं, वे अमर हो जाते हैं। रानी लक्ष्मीबाई की वीरता आज भी देश के हर नागरिक को प्रेरणा देती है। यही कविता का भाव है - वीर सदा अमर रहते हैं।
कविता का मूलभाव वीरता और देशभक्ति का गुणगान है। कवयित्री रानी लक्ष्मीबाई के माध्यम से यह बताना चाहती हैं कि देश के लिए बलिदान देने वाले वीर कभी मरते नहीं, वे अमर हो जाते हैं। रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी वीरता, साहस और त्याग से यह सिद्ध किया कि स्त्री किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं है। वे "खूब लड़ी मर्दानी" कहलाईं।
कविता का संदेश है कि हमें अपने देश और उसकी स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए। देश के लिए अपना सब कुछ त्यागने वाले वीरों की कहानियों से हमें प्रेरणा लेनी चाहिए। जब-जब देश पर संकट आया, वीरों ने अपने प्राणों की बाज़ी लगाकर देश की रक्षा की। रानी लक्ष्मीबाई उन्हीं महान वीरों में से एक हैं। उनके बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
कविता का एक और संदेश है कि साहस और निडरता से किसी भी विपत्ति का सामना किया जा सकता है। रानी ने जब अकेले राज्य की ज़िम्मेदारी संभाली, तो उन्होंने हार नहीं मानी। यह हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। साहस और दृढ़ संकल्प से ही विजय प्राप्त होती है।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| पाठ का नाम | झाँसी की रानी |
| कवयित्री | सुभद्रा कुमारी चौहान |
| विधा | वीर रस की कविता |
| नायिका | रानी लक्ष्मीबाई |
| बचपन का नाम | मणिकर्णिका |
| पति | राजा गंगाधर राव |
| मूलभाव | वीरता और देशभक्ति का गुणगान |
| घटना | वर्णन |
|---|---|
| बचपन | मणिकर्णिका वीरों के साथ खेलती थीं |
| विवाह | गंगाधर राव से झाँसी आईं |
| विधवा होना | राजा की मृत्यु के बाद राज्य संभाला |
| विद्रोह | 1857 के विद्रोह का नेतृत्व किया |
| वीरगति | अंग्रेज़ों से युद्ध में बलिदान |
| सीख | विवरण |
|---|---|
| देशभक्ति | देश के लिए बलिदान देना गर्व की बात है |
| साहस | कठिन समय में हिम्मत न हारें |
| नारी-शक्ति | स्त्री किसी से कम नहीं है |
| वीर-पूजा | देश के वीरों का सम्मान करें |
| निडरता | विपत्ति का सामना साहस से करें |
"झाँसी की रानी" कविता हिंदी साहित्य की सबसे महान वीर-कविताओं में से एक है। सुभद्रा कुमारी चौहान ने इस कविता के माध्यम से रानी लक्ष्मीबाई के साहस, त्याग और देशभक्ति को अमर कर दिया। यह कविता हमें सिखाती है कि देश के लिए बलिदान देने वाले वीर कभी मरते नहीं, वे हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनते हैं। रानी लक्ष्मीबाई की वीरता आज भी देश के हर नागरिक, विशेषकर हर बच्चे के हृदय में देशभक्ति की भावना जगाती है। यह कविता वीरता और नारी-शक्ति का अनमोल प्रतीक है।