प्रकृति और हमारे आस-पास की अनेक वस्तुओं में हमें एक विशेष सुंदरता और संतुलन दिखाई देता है। तितली के दोनों पंख, मानव शरीर के दोनों हाथ, कुछ पत्तियों के दोनों हिस्से, अनेक इमारतों के दोनों भाग - इन सभी में बाईं ओर और दाईं ओर के हिस्से लगभग समान दिखते हैं। इस गुण को सममिति (Symmetry) कहते हैं। जब किसी आकृति या वस्तु को एक सीधी रेखा से दो ऐसे भागों में बाँटा जा सकता है जो एक-दूसरे का दर्पण प्रतिबिंब हों, तो वह आकृति सममित कहलाती है और वह रेखा सममिति रेखा या दर्पण रेखा कहलाती है।
सममिति की अवधारणा को समझने का सबसे सरल तरीका दर्पण का उपयोग है। किसी आकृति के किनारे दर्पण रखने पर यदि आकृति और उसका प्रतिबिंब मिलकर पूरी आकृति बना लें, तो दर्पण की स्थिति की रेखा सममिति रेखा होती है। वर्णमाला के कई अक्षर, जैसे A, H, I, M, O, T, U, V, W, X, Y, सममित होते हैं। इस अध्याय में हम सममिति की अवधारणा, सममिति रेखाएँ, सममित आकृतियों की पहचान और विभिन्न आकृतियों की सममिति रेखाओं की संख्या का अध्ययन करेंगे।
वह सीधी रेखा जिसके दोनों ओर की आकृति के भाग समान दिखते हैं, सममिति रेखा कहलाती है। सममिति रेखा के दोनों ओर के भाग एक-दूसरे का दर्पण प्रतिबिंब होते हैं। सममिति रेखा को हम दर्पण रेखा भी कहते हैं। किसी आकृति में एक से अधिक सममिति रेखाएँ भी हो सकती हैं। कुछ आकृतियों में सममिति रेखा नहीं भी हो सकती। उदाहरण के लिए, अक्षर A में ऊर्ध्वाधर (लंबवत) सममिति रेखा होती है, जबकि अक्षर B में क्षैतिज सममिति रेखा होती है। अक्षर R में कोई सममिति रेखा नहीं होती।
सममिति रेखा किसी भी दिशा में हो सकती है - ऊर्ध्वाधर, क्षैतिज या तिरछी। ऊर्ध्वाधर सममिति रेखा ऊपर से नीचे की ओर जाती है, क्षैतिज सममिति रेखा बाईं से दाईं ओर जाती है। कुछ आकृतियों में तिरछी सममिति रेखाएँ भी होती हैं। किसी आकृति की सभी सममिति रेखाओं को खोजना एक महत्वपूर्ण कौशल है। इसके लिए आकृति को देखकर विभिन्न स्थितियों में कल्पना करनी होती है कि किस रेखा के दोनों ओर के भाग समान हैं।
विभिन्न ज्यामितीय आकृतियों में सममिति रेखाओं की संख्या भिन्न-भिन्न होती है। वर्ग में चार सममिति रेखाएँ होती हैं - दो ऊर्ध्वाधर/क्षैतिज (मध्य से होकर) और दो विकर्ण। आयत में दो सममिति रेखाएँ होती हैं - एक ऊर्ध्वाधर मध्य रेखा और एक क्षैतिज मध्य रेखा। वृत्त में अनंत सममिति रेखाएँ होती हैं, क्योंकि वृत्त के केंद्र से होकर गुजरने वाली प्रत्येक रेखा वृत्त को सममित रूप से विभाजित करती है। समबाहु त्रिभुज में तीन सममिति रेखाएँ होती हैं। समद्विबाहु त्रिभुज में एक सममिति रेखा होती है। विषमबाहु त्रिभुज में कोई सममिति रेखा नहीं होती।
वर्णमाला के अक्षरों में भी सममिति देखी जाती है। ऊर्ध्वाधर सममिति वाले अक्षर: A, H, I, M, O, T, U, V, W, X, Y। क्षैतिज सममिति वाले अक्षर: B, C, D, E, H, I, K, O, X। दोनों प्रकार की सममिति वाले अक्षर: H, I, O, X। कुछ अक्षर, जैसे F, G, J, L, N, P, Q, R, S, Z, सममित नहीं होते। वर्णमाला की सममिति को पहचानना एक रोचक अभ्यास है जो अवधारणा को मजबूत करता है।
किसी आकृति की सममिति की जाँच करने के लिए हम उसे दर्पण की सहायता से देख सकते हैं। दर्पण को आकृति के किसी किनारे पर रखने पर यदि आकृति का बाकी भाग और दर्पण में दिखने वाला प्रतिबिंब मिलकर पूरी आकृति बना लें, तो वह रेखा सममिति रेखा है। दूसरी विधि है - कागज को मोड़ना। किसी आकृति के चित्र को काटकर किसी रेखा पर मोड़ने पर यदि दोनों हिस्से पूर्णतः संपाती हो जाते हैं, तो वह रेखा सममिति रेखा होती है। इस विधि से छात्र स्वयं विभिन्न आकृतियों की सममिति रेखाएँ खोज सकते हैं। मोड़ने पर जो रेखा बनती है, वही सममिति रेखा होती है।
अंग्रेज़ी वर्णमाला में कई अक्षर सममित हैं। यदि हम अक्षर को दर्पण में देखें, तो कुछ अक्षर अपने प्रतिबिंब के समान दिखते हैं। A, H, I, M, O, T, U, V, W, X, Y अक्षरों में ऊर्ध्वाधर सममिति रेखा होती है। B, C, D, E, H, I, K, O, X अक्षरों में क्षैतिज सममिति रेखा होती है। H, I, O, X में ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज दोनों प्रकार की सममिति रेखाएँ होती हैं। कुछ अक्षर, जैसे J, N, P, Q, R, S, Z, में कोई सममिति रेखा नहीं होती। सममिति का ज्ञान वर्णमाला, अंकों और विभिन्न चिह्नों को समझने में सहायक है।
सममिति केवल गणित तक सीमित नहीं है, बल्कि कला, वास्तुकला, विज्ञान और प्रकृति में भी इसका विशेष महत्व है। इमारतों के डिज़ाइन में सममिति का उपयोग होता है। ताजमहल जैसे भवन सममित हैं। रंगोली, कढ़ाई, टाइलों के डिज़ाइन में सममिति सौंदर्य बढ़ाती है। विज्ञान में अणुओं की संरचना, क्रिस्टलों के आकार में सममिति देखी जाती है। प्रकृति में पत्तियाँ, फूल, तितली के पंख सममित होते हैं। इस प्रकार सममिति का ज्ञान कला और विज्ञान दोनों को जोड़ता है।
सममिति का अभ्यास करने के लिए हम कुछ गतिविधियाँ कर सकते हैं। पहली - विभिन्न आकृतियों (वर्ग, आयत, त्रिभुज, वृत्त) की सममिति रेखाओं की संख्या गिनना। दूसरी - वर्णमाला और अंकों में सममिति रेखाएँ खोजना। तीसरी - कागज मोड़कर सममित आकृतियाँ बनाना (जिसमें मोड़ने पर दोनों भाग संपाती हों)। चौथी - दर्पण की सहायता से आकृतियों की सममिति की जाँच करना। इन गतिविधियों से सममिति की अवधारणा पूर्णतः स्पष्ट हो जाती है।
| आकृति | सममिति रेखाओं की संख्या |
|---|---|
| वृत्त | अनंत |
| वर्ग | 4 |
| आयत | 2 |
| समबाहु त्रिभुज | 3 |
| समद्विबाहु त्रिभुज | 1 |
| विषमबाहु त्रिभुज | 0 |
| समांतर चतुर्भुज | 0 |
| सममिति का प्रकार | अक्षर |
|---|---|
| ऊर्ध्वाधर सममिति | A, H, I, M, O, T, U, V, W, X, Y |
| क्षैतिज सममिति | B, C, D, E, H, I, K, O, X |
| दोनों प्रकार | H, I, O, X |
| कोई सममिति नहीं | F, G, J, L, N, P, Q, R, S, Z |
| विधि | वर्णन |
|---|---|
| दर्पण विधि | दर्पण रखने पर पूरी आकृति बननी चाहिए |
| मोड़ने की विधि | रेखा पर मोड़ने पर भाग संपाती होने चाहिए |
| कल्पना विधि | रेखा के दोनों ओर के भाग समान होने चाहिए |
इस अध्याय में हमने सममिति की अवधारणा को विस्तार से समझा। सममिति रेखा के दोनों ओर के भाग एक-दूसरे का दर्पण प्रतिबिंब होते हैं। विभिन्न ज्यामितीय आकृतियों - वृत्त, वर्ग, आयत, त्रिभुज - में सममिति रेखाओं की संख्या भिन्न-भिन्न होती है। वर्णमाला के अक्षरों में भी सममिति का अध्ययन रोचक रहा। दर्पण और कागज मोड़ने की विधियों से सममिति की जाँच की जा सकती है। सममिति का ज्ञान कला, वास्तुकला और विज्ञान में सौंदर्य और संतुलन को समझने में सहायक है। यह अवधारणा आगे की कक्षाओं में सममित आकृतियों, निर्देशांक ज्यामिति और परावर्तन के अध्ययन का आधार है।