जल पृथ्वी पर उपलब्ध सबसे अनमोल प्राकृतिक संसाधन है। सभी सजीवों को जीवित रहने के लिए जल की आवश्यकता होती है। मनुष्य, जानवर, पक्षी, पेड़-पौधे सभी जल पर निर्भर हैं। हमारे शरीर का लगभग दो-तिहाई भाग जल से बना है। जल के बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं है।
पृथ्वी की सतह का लगभग तीन-चौथाई भाग जल से ढका है, लेकिन पीने योग्य मीठा जल बहुत कम है। अधिकांश जल समुद्रों और महासागरों में खारा है। मीठा जल नदियों, तालाबों, झीलों, कुओं और भूमिगत स्रोतों में पाया जाता है। इसलिए जल का संरक्षण हम सबका कर्तव्य है।
इस अध्याय में हम जल के स्रोत, जल की उपयोगिता, जल चक्र, बादल और वर्षा, तथा जल संरक्षण के उपायों के बारे में विस्तार से अध्ययन करेंगे।
जल के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं:
वर्षा जल: वर्षा जल मीठे जल का प्रमुख स्रोत है। बादलों से बरसने वाला जल नदियों, तालाबों और भूमिगत स्रोतों को भरता है।
नदियाँ और झीलें: ये मीठे जल के प्रमुख सतही स्रोत हैं। नदियाँ पहाड़ों से समुद्र की ओर बहती हैं और बीच में तालाबों तथा झीलों को जल देती हैं।
भूमिगत जल: वर्षा का कुछ जल मिट्टी में रिसकर भूमिगत स्तरों तक पहुँचता है, जिसे भूमिगत जल कहते हैं। कुएँ, नलकूप और हस्तचालित पंप भूमिगत जल से जल निकालते हैं।
तालाब और कुएँ: गाँवों और शहरों में तालाब तथा कुएँ मीठे जल के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
जल के अनेक उपयोग हैं:
पीने के लिए: सभी सजीव जीवित रहने के लिए जल पीते हैं। हमारे शरीर को दिन में कई बार जल की आवश्यकता होती है।
घरेलू उपयोग: खाना पकाना, कपड़े धोना, बर्तन साफ करना, स्नान करना और घर की सफाई के लिए जल आवश्यक है।
कृषि के लिए: फसलों को उगाने के लिए सिंचाई के रूप में जल चाहिए। खेतों की सिंचाई में बहुत सारा जल लगता है।
औद्योगिक उपयोग: कारखानों में कई उत्पाद बनाने के लिए जल की आवश्यकता होती है।
परिवहन और मनोरंजन: नावें, जहाज जल मार्ग से चलते हैं। तैराकी और जल क्रीड़ाएँ जल में होती हैं।
जल पृथ्वी पर एक ही रूप में स्थिर नहीं रहता। जल लगातार एक प्रक्रिया में घूमता रहता है, जिसे जल चक्र कहते हैं। जल चक्र में निम्नलिखित चरण होते हैं:
वाष्पीकरण (Evaporation): सूर्य की गर्मी से समुद्र, नदियों, तालाबों और झीलों का जल वाष्प बनकर आकाश में उठता है।
संघनन (Condensation): ठंडी हवा में वाष्प संघनित होकर छोटी-छोटी बूँदों में बदल जाता है, जिससे बादल बनते हैं।
वर्षा (Rainfall): जब बादल भारी हो जाते हैं, तो जल की बूँदें वर्षा के रूप में धरती पर गिरती हैं। कभी-कभी ओले भी गिरते हैं।
संग्रहण (Collection): वर्षा का जल नदियों, तालाबों, झीलों और समुद्रों में इकट्ठा हो जाता है। कुछ जल मिट्टी में रिसकर भूमिगत जल बनता है। इस प्रकार जल चक्र चलता रहता है।
जल के वाष्पित होने पर वाष्प ठंडी हवा में पहुँचकर छोटी-छोटी बूँदों में बदल जाता है। इन्हीं बूँदों के समूह को बादल कहते हैं। जब बूँदें भारी होकर बादल से नहीं टिक पातीं, तो वर्षा के रूप में नीचे गिरती हैं। कभी-कभी बहुत ऊँचे बादलों में जल की बूँदें जम जाती हैं और ओलों के रूप में गिरती हैं। वर्षा किसी क्षेत्र के लिए लाभदायक होती है, लेकिन अत्यधिक वर्षा से बाढ़ और कम वर्षा से सूखा पड़ता है।
जल बहुमूल्य है और इसकी मात्रा सीमित है, इसलिए जल संरक्षण आवश्यक है। जल बचाने के कुछ उपाय:
जल की कमी से कई समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। सूखे के कारण फसलें बर्बाद हो जाती हैं, पशु और मनुष्य प्यासे रहते हैं। भूमिगत जल स्तर गिरने से कुएँ सूख जाते हैं। जल की कमी से स्वच्छता बनाए रखना भी कठिन हो जाता है। इसलिए जल का विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण ही स्थायी समाधान है।
| स्रोत का प्रकार | उदाहरण | विशेषता |
|---|---|---|
| सतही जल | नदियाँ, तालाब, झीलें | मीठा जल |
| भूमिगत जल | कुएँ, नलकूप | वर्षा जल का रिसाव |
| वायुमंडलीय जल | बादल, वाष्प | वर्षा के रूप में लौटता है |
| खारा जल | समुद्र, महासागर | पीने योग्य नहीं |
| चरण | प्रक्रिया | परिणाम |
|---|---|---|
| वाष्पीकरण | सूर्य की गर्मी से जल वाष्प | वाष्प आकाश में |
| संघनन | वाष्प का ठंडा होना | बादल बनना |
| वर्षा | बूँदों का गिरना | धरती पर जल |
| संग्रहण | नदियों, समुद्रों में एकत्र | जल चक्र पूर्ण |
जल सभी सजीवों के लिए अनिवार्य है। जल के स्रोत वर्षा, नदियाँ, झीलें, तालाब और भूमिगत जल हैं। जल चक्र में वाष्पीकरण, संघनन, वर्षा और संग्रहण के द्वारा जल पृथ्वी पर घूमता रहता है। पीने योग्य मीठा जल सीमित है, इसलिए जल संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। रेन वाटर हार्वेस्टिंग, नल बंद रखना और जल की बर्बादी रोकना जल बचाने के उपाय हैं। जल ही जीवन है, इसलिए हमें जल का विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे संरक्षित करना चाहिए।