हमारा शरीर एक अद्भुत मशीन है, जो विभिन्न प्रकार की गतियाँ करता है। हम दौड़ते हैं, कूदते हैं, तैरते हैं, झुकते हैं और घूमते हैं। इन सभी गतियों को करने के लिए हमारे शरीर के अंगों को किसी न किसी प्रकार का सहारा और गति तंत्र चाहिए। इस अध्याय में हम जानेंगे कि हमारे शरीर में गति कैसे होती है और इसके लिए कौन से अंग जिम्मेदार होते हैं।
मानव शरीर में गति कंकाल तंत्र (हड्डियाँ), संधियाँ (जोड़), और पेशियाँ (मांसपेशियाँ) मिलकर करती हैं। हड्डियाँ शरीर को आकृति और मजबूती देती हैं, संधियाँ हड्डियों को जोड़ती हैं और उन्हें गति प्रदान करती हैं, तथा पेशियाँ हड्डियों को खींचकर गति उत्पन्न करती हैं। इन तीनों तंत्रों का सही समन्वय ही हमारी गतियों को संभव बनाता है।
हमें यह भी जानना होगा कि सभी जीव एक जैसी गति नहीं करते। कुछ जीवों में बाहरी कंकाल होता है (जैसे कछुआ, घोंघा), कुछ में आंतरिक कंकाल (जैसे मछली, पक्षी, मनुष्य), और कुछ में कंकाल ही नहीं होता (जैसे केंचुआ, तितली)। इस अध्याय में इन सभी विषयों पर विस्तार से चर्चा होगी।
मानव कंकाल तंत्र हड्डियों से बना होता है। एक वयस्क मानव के शरीर में लगभग 206 हड्डियाँ होती हैं। कंकाल तंत्र के मुख्य कार्य हैं: शरीर को आकृति और ठोस संरचना देना, नाजुक अंगों की सुरक्षा करना (जैसे खोपड़ी मस्तिष्क की और पसलियाँ हृदय-फेफड़ों की रक्षा करती हैं), पेशियों को सहारा देना, तथा गति में सहायता करना।
मानव कंकाल को निम्नलिखित भागों में बाँटा गया है:
खोपड़ी (Skull): सिर की हड्डियाँ, जो मस्तिष्क की रक्षा करती हैं। खोपड़ी में 22 हड्डियाँ होती हैं, जिनमें से केवल जबड़े की हड्डी चल सकती है।
रीढ़ (Vertebral Column): पीठ के मध्य में स्थित 33 छोटी हड्डियों की श्रृंखला, जिन्हें कशेरुकाएँ कहते हैं। यह शरीर को झुकने, मुड़ने और लचीलापन देती है तथा मेरुदंड की रक्षा करती है।
पसलियाँ और उरोस्थि (Ribs and Sternum): छाती में 12 जोड़ी पसलियाँ होती हैं, जो हृदय और फेफड़ों की रक्षा करती हैं।
अंगों की हड्डियाँ: हाथों में ह्यूमरस (बाजू), रेडियस और अलना (अग्रबाहु), तथा उँगलियों की छोटी हड्डियाँ होती हैं। पैरों में फीमर (जाँघ की सबसे लंबी हड्डी), टिबिया और फिबुला (निचली टाँग) होती हैं।
जहाँ दो या दो से अधिक हड्डियाँ आपस में जुड़ती हैं, वहाँ संधि (जोड़) बनती है। संधियों के कारण ही हम अपने शरीर के विभिन्न भागों को मोड़ पाते हैं। संधियाँ मुख्यतः निम्नलिखित प्रकार की होती हैं:
धुराग्र संधि (Pivot Joint): इसमें हड्डी दूसरी हड्डी के चारों ओर घूमती है। गर्दन की संधि धुराग्र संधि है, जो सिर को घुमाने में सहायता करती है। यह हमें सिर को बाएँ-दाएँ घुमाने की अनुमति देती है।
कब्जा संधि (Hinge Joint): यह दरवाजे की कब्जे की तरह काम करती है, जो केवल एक दिशा में मुड़ने की अनुमति देती है। कोहनी, घुटना, टखना और उँगलियों की संधियाँ कब्जा संधि हैं।
गेंद और खोल संधि (Ball and Socket Joint): इसमें एक हड्डी का गोल सिरा दूसरी हड्डी के कटोरे जैसे खोल में फिट होता है। यह सभी दिशाओं में गति की अनुमति देती है। कंधा और कूल्हे की संधि गेंद और खोल संधि हैं।
ग्लाइडिंग संधि (Gliding Joint): इसमें हड्डियाँ एक-दूसरे के ऊपर फिसलती हैं। कलाई और टखने की हड्डियों के बीच ग्लाइडिंग संधि होती है।
पेशियाँ मांसपेशियाँ होती हैं, जो हड्डियों से जुड़ी होती हैं और सिकुड़कर (contract) हड्डियों को खींचती हैं, जिससे गति उत्पन्न होती है। शरीर में लगभग 600 से अधिक पेशियाँ होती हैं। पेशियों का कार्य सिद्धांत सरल है: पेशियाँ खींचती हैं, धकेलती नहीं। जब एक पेशी सिकुड़ती है, तो उसके साथ जुड़ी हड्डी खिंचती है, और जब दूसरी पेशी सिकुड़ती है, तो हड्डी विपरीत दिशा में खिंचती है। इस प्रकार पेशियों के जोड़े मिलकर काम करते हैं।
उदाहरण के लिए, हाथ को ऊपर-नीचे करने के लिए बाजू की दो पेशियाँ मिलकर काम करती हैं। जब एक पेशी सिकुड़ती है, तो हाथ मुड़ता है, और जब दूसरी सिकुड़ती है, तो हाथ सीधा होता है। इसी तरह, पैर की पेशियाँ चलने, दौड़ने और कूदने में सहायता करती हैं।
गति केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है। विभिन्न जीवों में गति करने के अलग-अलग तरीके होते हैं:
केंचुआ (Earthworm): इसका शरीर खंडों में बँटा होता है। यह अपने शरीर के पेशियों को सिकोड़कर और बढ़ाकर रेंगता है। इसकी त्वचा पर छोटे-छोटे रोम (सेटा) होते हैं, जो मिट्टी पर पकड़ बनाने में सहायता करते हैं।
घोंघा (Snail): यह अपनी लोचदार (muscular) तली के सहारे धीरे-धीरे रेंगता है। इसके शरीर पर बाहरी कंकाल (खोल) होता है।
तितली, तिलचट्टा और मच्छर: ये कीट अपने पैरों और पंखों से गति करते हैं। इनके शरीर के बाहर कठोर आवरण (बाह्य कंकाल) होता है।
मछली (Fish): मछली पानी में अपनी पूँछ और पंखों की सहायता से तैरती है। इसका कंकाल आंतरिक होता है।
पक्षी (Bird): पक्षी अपने पंखों से उड़ते हैं और अपने पैरों से जमीन पर चलते हैं। इनके शरीर की हड्डियाँ हल्की होती हैं।
जीवों में कंकाल के मुख्यतः तीन प्रकार होते हैं:
आंतरिक कंकाल: यह शरीर के अंदर होता है, जैसे मनुष्य, मछली, पक्षी, साँप और बिल्ली में। इसे अंत:कंकाल कहते हैं।
बाहरी कंकाल: यह शरीर के बाहर एक कठोर आवरण के रूप में होता है, जैसे कछुआ, घोंघा, तिलचट्टा, केकड़ा और झींगा में। इसे बहि:कंकाल कहते हैं। बाहरी कंकाल शरीर की रक्षा भी करता है।
कंकाल रहित जीव: कुछ जीवों में कोई कंकाल नहीं होता, जैसे केंचुआ और तितली का लार्वा। ये अपनी पेशियों की सहायता से गति करते हैं।
| संधि का प्रकार | विशेषता | शरीर में स्थान |
|---|---|---|
| धुराग्र संधि | हड्डी दूसरी के चारों ओर घूमती है | गर्दन |
| कब्जा संधि | केवल एक दिशा में मुड़ती है | कोहनी, घुटना, उँगलियाँ |
| गेंद और खोल संधि | सभी दिशाओं में गति | कंधा, कूल्हा |
| ग्लाइडिंग संधि | हड्डियाँ फिसलती हैं | कलाई, टखना |
| कंकाल का प्रकार | विशेषता | उदाहरण |
|---|---|---|
| आंतरिक कंकाल | शरीर के अंदर | मनुष्य, मछली, पक्षी, साँप |
| बाहरी कंकाल | शरीर के बाहर कठोर आवरण | कछुआ, घोंघा, केकड़ा, तिलचट्टा |
| कंकाल रहित | कोई कंकाल नहीं | केंचुआ, तितली का लार्वा |
मानव शरीर में गति कंकाल तंत्र, संधियों और पेशियों के समन्वय से होती है। कंकाल शरीर को आकृति और सुरक्षा देता है, संधियाँ गति का स्थान होती हैं, और पेशियाँ सिकुड़कर हड्डियों को खींचती हैं। मनुष्य में आंतरिक कंकाल होता है, जबकि कछुए और केकड़े में बाहरी कंकाल तथा केंचुए में कोई कंकाल नहीं होता। जीवों की गति के तरीके उनके शरीर की संरचना के अनुसार अलग-अलग होते हैं। शरीर की संरचना को समझना स्वास्थ्य और जीवन विज्ञान के अध्ययन की नींव है।