लगभग 4,500 वर्ष पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप में पहली बार नगरों का विकास हुआ। ये नगर सिंधु नदी की घाटी के किनारे बसे थे, इसलिए इस सभ्यता को 'सिंधु घाटी सभ्यता' कहा जाता है। इसका दूसरा नाम 'हड़प्पा सभ्यता' भी है, क्योंकि इसका सबसे पहला नगर हड़प्पा में खोजा गया था। यह विश्व की चार प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक है।
हड़प्पा सभ्यता के लोग अत्यंत सुनियोजित नगरों में रहते थे। उनकी सड़कें सीधी और आड़ी-तिरछी नियमित व्यवस्था में बनी होती थीं। मकान पक्की ईंटों के बने होते थे और नालियों की व्यवस्था अद्भुत थी। यह सभ्यता लगभग 700 वर्षों तक विकसित रही और लगभग 3,900 वर्ष पूर्व (1900 ई.पू.) इसका पतन होने लगा।
सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में सबसे पहले 19वीं शताब्दी में जानकारी मिलनी शुरू हुई, जब रेलवे लाइन बिछाते समय श्रमिकों को प्राचीन ईंटें मिलीं। 1921 में हड़प्पा की खुदाई हुई और 1922 में मोहनजोदड़ो की। हड़प्पा वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित है, जबकि मोहनजोदड़ो सिंध प्रांत में। मोहनजोदड़ो का अर्थ है 'मृतकों का टीला'।
आज तक इस सभ्यता के 1,000 से अधिक स्थल खोजे जा चुके हैं, जो पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, राजस्थान, गुजरात तथा उत्तर भारत के कुछ भागों में फैले हुए हैं। इस सभ्यता का विस्तार पश्चिम में मकरान तट से लेकर पूर्व में यमुना नदी तक था। सबसे बड़ा विस्तार क्षेत्र होने के कारण इसे सबसे बड़ी प्राचीन सभ्यता कहा गया।
हड़प्पा के नगरों की योजना अत्यंत वैज्ञानिक थी। नगर दो भागों में बँटा होता था - एक छोटा और ऊँचा भाग जिसे 'दुर्ग' (Citadel) कहते थे, तथा एक बड़ा निचला भाग। दुर्ग में प्रमुख इमारतें होती थीं, जबकि निचले भाग में आम लोगों के घर। दोनों भागों में अलग-अलग सड़कें थीं।
सड़कों की योजना ग्रिड (जाली) के समान थी, जहाँ पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण की सड़कें समकोण पर एक-दूसरे को काटती थीं। घर सड़कों के किनारे बने होते थे और इनकी बनावट ऐसी थी कि घर के द्वार सीधे मुख्य सड़कों पर नहीं खुलते थे। यह नगर नियोजन अपने समय से बहुत आगे का था।
हड़प्पा के मकान पक्की ईंटों (Baked Bricks) से बने होते थे, जो सुखी और पकी दोनों प्रकार की होती थीं। घरों में कई कमरे, रसोईघर और आँगन होते थे। प्रत्येक घर में नहाने का स्थान होता था, जिसका पानी सीधे नाली में बह जाता था। घरों की दीवारें मोटी और मजबूत होती थीं।
हड़प्पा की जल निकासी व्यवस्था विश्व में अपनी तरह की सबसे बेहतरीन मानी जाती है। प्रत्येक सड़क के किनारे ढकी हुई नालियाँ बनी होती थीं, जो ईंटों से बनी होती थीं। प्रत्येक घर से एक नाली जुड़ी होती थी जो सड़क की मुख्य नाली में पानी छोड़ती थी। नालियों में कूड़ा फँसने से रोकने के लिए ढक्कन और जालीदार मुँह होते थे।
मोहनजोदड़ो में 'महान स्नानागार' (Great Bath) नामक विशाल इमारत मिली है। यह एक बड़ा आयताकार टैंक था, जिसमें सीढ़ियों से उतरा जा सकता था। इसका उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों के स्नान के लिए होता था। इसका फर्श पक्की ईंटों और मोटे डामर (bitumen) से बना था, जिससे पानी रिसता नहीं था।
हड़प्पा के लोग विभिन्न व्यवसाय करते थे। कुछ किसान थे जो गेहूँ, जौ, खजूर आदि उगाते थे। कुछ बढ़ई, कुम्हार, बुनकर, धातु कारीगर और मनके बनाने वाले थे। वे ताँबे (कॉपर) और ब्रॉन्ज़ (काँसा) के औज़ार बनाते थे। लोग दूर-दराज के प्रदेशों से वस्तुएँ लाते थे, जिससे उनका व्यापार फलता-फूलता था।
हड़प्पा से हजारों सीलें मिली हैं, जो मुख्यतः स्टीटाइट (Steatite) नामक मुलायम पत्थर से बनी होती थीं। इन सीलों पर जानवरों के चित्र उकेरे जाते थे, जैसे एक सींग वाला गैंडा, बैल, हाथी आदि। सीलों पर लेख भी होते थे, जिन्हें अब तक पढ़ा नहीं जा सका है। सीलों का उपयोग संपत्ति पर मालिकाना हक और व्यापार में मुहर लगाने के लिए होता था।
हड़प्पा के लोग पत्थर के बाटों (weights) का उपयोग करते थे, जो विभिन्न आकारों में होते थे। ये बाट चुंबकीय पत्थर (लोडस्टोन) से बनाए जाते थे। इनके मानक निश्चित अनुपात में होते थे, जैसे 1, 2, 4, 8, 16, 32 आदि। मापने के लिए लकड़ी या हाथीदाँत की स्केल (फुटकी) का उपयोग होता था। मापने की इकाई थी लगभग 1.32 इंच।
लगभग 3,900 वर्ष पूर्व (1900 ई.पू.) से हड़प्पा के नगर धीरे-धीरे समाप्त होने लगे। इस पतन के कई कारण हो सकते हैं। कुछ विद्वान मानते हैं कि नदियों का जल-स्तर बदलने या बाढ़ आने से खेती प्रभावित हुई। कुछ का मानना है कि जलवायु में परिवर्तन, सूखा या व्यापार मार्गों में बाधा इसका कारण बना। नगरों के विनाश से नगरवासी गाँवों में चले गए। हालाँकि, हड़प्पा के स्थलों से कोई युद्ध या सामूहिक विनाश का प्रमाण नहीं मिला है।
हड़प्पा सभ्यता ने हमें अनेक चीजें दीं, जिनमें गेहूँ-जौ की खेती, चावल, पकी ईंटें, बेलनाकार बाट, पशु-पालन, मापने की विधियाँ तथा ताँबे की चीज़ें शामिल हैं। यह सभ्यता हमें सिखाती है कि सुनियोजित नगर, स्वच्छ जल निकासी और संगठित व्यापार किस प्रकार सभ्यता की नींव होते हैं। हड़प्पा की सीलों और चित्रों से यह भी पता चलता है कि यहाँ के लोग कलाप्रिय और समृद्ध थे।
| नगर | स्थान (वर्तमान) | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| हड़प्पा | पाकिस्तान (पंजाब) | पहला खोजा गया नगर, अन्नागार |
| मोहनजोदड़ो | पाकिस्तान (सिंध) | महान स्नानागार, 'मृतकों का टीला' |
| लोथल | गुजरात (भारत) | बंदरगाह, जलपोत |
| धोलावीरा | गुजरात (भारत) | विशाल जलाशय |
| कालीबंगा | राजस्थान (भारत) | पूर्व-हड़प्पा स्थल |
| उपलब्धि | विवरण |
|---|---|
| नगर नियोजन | ग्रिड पैटर्न में सड़कें, दो भागों में बँटा नगर (दुर्ग और निचला भाग) |
| जल निकासी | ढकी हुई ईंटों की नालियाँ, घरों से जुड़ी नालियाँ |
| निर्माण सामग्री | पक्की ईंटों से मकान, मोटे डामर से टैंक |
| मापतौल | पत्थर के बाट, स्केल (1.32 इंच की इकाई) |
| लेखन | सीलों पर लिपियाँ (अब तक अपठित) |
| वस्तु | क्षेत्र |
|---|---|
| ताँबा | राजस्थान, ओमान |
| मोती/सीप | दक्षिण भारत, खंभात |
| सोना | उत्तर कर्नाटक (हत्ती स्वर्ण खदान) |
| स्टीटाइट | लोथल, बालाकोट |
आरंभिक नगर या हड़प्पा सभ्यता मानव इतिहास में शहरीकरण की पहली महान उपलब्धि थी। सुनियोजित सड़कें, वैज्ञानिक जल निकासी, पक्के मकान और संगठित व्यापार बताते हैं कि उस युग का समाज कितना उन्नत था। यद्यपि इस सभ्यता का पतन हो गया, परंतु इसकी विरासत हमारे दैनिक जीवन में अभी भी जीवित है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि नगर केवल भवनों का समूह नहीं, बल्कि उन्नत व्यवस्था, स्वच्छता और सामाजिक संगठन का प्रतीक होता है।