मानव सभ्यता के इतिहास में सबसे बड़ा परिवर्तन वह क्षण था जब लोगों ने शिकार करके और जंगल से भोजन बीनकर अपना जीवन चलाना छोड़ दिया और स्वयं भोजन उगाना आरंभ किया। यह अध्याय हमें बताता है कि मनुष्य ने 'आखेट (शिकार) और खाद्य संग्रह' से कैसे 'भोजन उत्पादन' की ओर कदम बढ़ाया और यह परिवर्तन क्यों 'क्रांति' के समान महत्वपूर्ण था।
इस अध्याय में हम प्राचीन काल के उन औज़ारों, स्थलों और वैज्ञानिक प्रमाणों का अध्ययन करेंगे जिनसे पता चलता है कि मनुष्य धीरे-धीरे घुमंतू जीवन से स्थायी जीवन की ओर कैसे बढ़ा। भीमबेटका की गुफाएँ, मेहरगढ़ की खुदाई और पत्थर के औज़ारों का अध्ययन इस यात्रा की कहानी कहते हैं।
पुरातत्वविदों ने मनुष्य के इतिहास को उपयोग किए गए औज़ारों के आधार पर कई युगों में बाँटा है। जब मनुष्य पत्थर के औज़ार बनाता था, उस काल को 'पाषाण युग' कहते हैं। पाषाण युग को तीन भागों में बाँटा गया है।
यह सबसे प्रारंभिक युग है, जो लगभग 20 लाख वर्ष पूर्व आरंभ हुआ। 'पुरा पाषाण' का अर्थ है 'प्राचीन पत्थर'। इस युग में लोग आखेट और खाद्य संग्रह से जीवन यापन करते थे। वे घुमंतू थे और मौसम के अनुसार अपना स्थान बदलते रहते थे। उनके औज़ार खुरदरे पत्थरों से बने होते थे। इस युग का विभाजन आरंभिक, मध्य और अंतिम चरणों में किया गया है। इस युग के लोग आग का उपयोग भी करने लगे थे।
'मेसो' का अर्थ है 'मध्य'। यह युग लगभग 12,000 वर्ष पूर्व आरंभ हुआ। इस युग के औज़ार छोटे और महीन पत्थरों के बने होते थे, जिन्हें 'सूक्ष्म पाषाण' या 'माइक्रोलिथ' कहते हैं। इसी युग में पत्थर के अलावा हड्डी और सींग के औज़ार भी बनाए गए। लोग कुत्ते का पालन भी करने लगे थे।
'नियो' का अर्थ है 'नया'। यह युग लगभग 10,000 वर्ष पूर्व आरंभ हुआ। इसी युग में भोजन उत्पादन (खेती) और पशुपालन का आरंभ हुआ, जिसे 'नव पाषाण क्रांति' कहते हैं। लोग पॉलिश किए हुए पत्थरों के औज़ार बनाने लगे और मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करने लगे।
पुरा पाषाण युग में लोग शिकार करके तथा जंगल से फल, जड़ें, कंद, बीज और शहद बीनकर अपना भोजन प्राप्त करते थे। वे मछली पकड़ते थे और जंगली जानवरों का मांस खाते थे। इन लोगों के लिए भोजन उपलब्ध कराने के लिए जंगलों का ज्ञान आवश्यक था। उन्हें पता रहता था कि किस मौसम में कौन से फल मिलते हैं और कौन से पौधे विषैले हैं।
इन घुमंतू लोगों के समूह को 'शिकारी-संग्राहक' (Hunter-Gatherers) कहा जाता था। वे वर्ष भर एक स्थान पर नहीं रहते थे, बल्कि भोजन की उपलब्धता के अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते थे। उनकी यह यात्रा 'मौसमी गतिशीलता' कहलाती थी। वे जानवरों को शिकार के लिए सादी गुफाओं और चट्टानों के आश्रयों में रहते थे।
लगभग 10,000 वर्ष पूर्व, जलवायु में परिवर्तन आया और यह अधिक गर्म तथा आर्द्र हो गई। जंगली घासों और अनाज के पौधे अधिक पैदा होने लगे। मनुष्य ने देखा कि अनाज के दानों को बोने से नए पौधे उगते हैं। इस प्रकार खेती का आरंभ हुआ। इसके साथ ही लोगों ने जंगली जानवरों को पालतू बनाना शुरू किया, जिससे उन्हें दूध, मांस, ऊन और श्रम की प्राप्ति होने लगी।
यह परिवर्तन इतना बड़ा था कि इसे 'नव पाषाण क्रांति' (Neolithic Revolution) का नाम दिया गया। खेती और पशुपालन के कारण लोग स्थायी रूप से एक स्थान पर बसने लगे। उन्होंने झोपड़ियाँ और पक्के मकान बनाए, मिट्टी के बर्तन बनाए तथा अनाज को सुरक्षित रखने के तरीके विकसित किए।
इस युग के अध्ययन के लिए कई स्थलों की खुदाई की गई है, जिनमें कुछ प्रमुख स्थल निम्नलिखित हैं।
मेहरगढ़ वर्तमान पाकिस्तान में बलूचिस्तान क्षेत्र के पश्चिम में स्थित है। यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे प्राचीन कृषि स्थल माना जाता है। यहाँ कई पीढ़ियों तक लोग बसते रहे। सबसे पुरानी परतों से पता चलता है कि यहाँ लोग जौ उगाते थे और बकरी, भेड़ जैसे पशुओं को पालते थे। बाद की परतों में गेहूँ, खजूर, मवेशी, भैंस और बैलगाड़ी के प्रमाण मिले हैं। यहाँ पत्थरों की कुछ कब्रें भी मिली हैं।
यह स्थल उत्तर-पूर्व भारत में असम राज्य में स्थित है। यहाँ से लोगों के भोजन उत्पादन का प्रमाण नहीं, बल्कि चावल के दाने, बर्तन तथा पत्थर के औज़ार मिले हैं। यहाँ से 'बुरा' नामक पत्थर भी मिला है, जिसका उपयोग अनाज पीसने के लिए किया जाता था। यह स्थल भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के संबंध का संकेत देता है।
भीमबेटका मध्य प्रदेश में भोपाल से दक्षिण में स्थित है। यहाँ की चट्टानों और गुफाओं की दीवारों पर प्राचीन चित्र मिले हैं। इन चित्रों में शिकार के दृश्य, जानवर, नाचते-गाते लोग तथा विभिन्न जीवन गतिविधियाँ दर्शाई गई हैं। ये चित्र विभिन्न कालों में बनाए गए थे और इनसे हमें प्राचीन लोगों के जीवन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
पुरा पाषाण युग में औज़ार बड़े, खुरदरे पत्थरों से बनाए जाते थे, जिनका उपयोग काटने, खोदने और मांस काटने के लिए होता था। मध्य पाषाण युग में सूक्ष्म पाषाण औज़ार (माइक्रोलिथ) बने, जिन्हें तीर और भाले के अग्रभाग के रूप में लकड़ी या हड्डी पर जोड़ा जाता था। नव पाषाण युग में पत्थरों को पॉलिश करके बेहतर औज़ार बनाए गए और पत्थर के कुल्हाड़े, हथौड़े तथा कुदालियाँ बनाई गईं। इन औज़ारों से कृषि और बर्तन बनाने में सहायता मिली।
भोजन उत्पादन के आरंभ से कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। पहला, लोग घुमंतू जीवन छोड़कर स्थायी रूप से बस गए। दूसरा, भोजन की अधिकता के कारण जनसंख्या बढ़ी और बस्तियाँ बड़ी होने लगीं। तीसरा, अधिशेष भोजन को सुरक्षित रखने के लिए बर्तन, खलिहान और भंडारगृह बनाए गए। चौथा, कुछ लोग कारीगर बन गए और मिट्टी के बर्तन, कपड़ा, औज़ार आदि बनाने लगे। पाँचवाँ, समाज में भोजन के वितरण की नई व्यवस्था विकसित हुई।
| युग | काल | मुख्य विशेषताएँ |
|---|---|---|
| पुरा पाषाण (Palaeolithic) | लगभग 20 लाख वर्ष पूर्व से | खुरदरे पत्थर के औज़ार, शिकार और खाद्य संग्रह, घुमंतू जीवन |
| मध्य पाषाण (Mesolithic) | लगभग 12,000 वर्ष पूर्व से | सूक्ष्म पाषाण (माइक्रोलिथ), कुत्ते का पालन, हड्डी के औज़ार |
| नव पाषाण (Neolithic) | लगभग 10,000 वर्ष पूर्व से | खेती, पशुपालन, पॉलिश किए पत्थर, मिट्टी के बर्तन |
| स्थल | राज्य/क्षेत्र | मुख्य खोज |
|---|---|---|
| मेहरगढ़ | बलूचिस्तान (पाकिस्तान) | जौ, गेहूँ, पशुपालन, कब्रें, बैलगाड़ी |
| दाओजाली हड्डी | असम (उत्तर-पूर्व भारत) | चावल, बुरा पत्थर, बर्तन |
| भीमबेटका | मध्य प्रदेश | गुफाओं में प्राचीन चित्र |
| तरीका | युग | विवरण |
|---|---|---|
| आखेट (शिकार) | पुरा पाषाण | जानवरों का शिकार करके मांस प्राप्त करना |
| खाद्य संग्रह | पुरा पाषाण | जंगल से फल, जड़ें, शहद बीनना |
| भोजन उत्पादन | नव पाषाण | अनाज बोकर खेती करना, पशुपालन |
आखेट-खाद्य संग्रह से भोजन उत्पादन तक की यात्रा मानव इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है। पुरा पाषाण युग का घुमंतू शिकारी धीरे-धीरे नव पाषाण युग का स्थायी किसान बना। इस परिवर्तन ने बस्तियों, नगरों और अंततः सभ्यताओं की नींव रखी। मेहरगढ़, दाओजाली हड्डी और भीमबेटका जैसे स्थलों की खुदाई हमें यह समझने में सहायता करती है कि मनुष्य ने प्रकृति के साथ अपने संबंध किस प्रकार बदले। यह अध्याय यह भी सिखाता है कि आधुनिक जीवन की नींव प्राचीन किसानों के अथक प्रयासों पर टिकी है।